क्या कभी पायलट के बिना भी हवाई जहाज उड़ेंगे?

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आज ज़माना ऑटोमैटिक चीज़ों का है. हमारी ज़िंदगी में ऐसी मशीनों की तादाद बढ़ती जा रही है जिनके पास ख़ुद का दिमाग़ होता है. वो सिर्फ़ हमारे इशारे से काम को समझ जाती हैं और फिर उस काम को ख़ुद ब ख़ुद अंजाम देती हैं. ये सभी मशीनें आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (एआई) या मशीनी दिमाग़ या फिर बनावटी बुद्धिमानी से चलती हैं.

तमाम ऑटोमैटिक मशीनें इसी दर्जे में आती हैं. आज तो बिना ड्राइवर की कार, बिना लोको पायलट की ट्रेनें भी कई देशों में चल रही हैं. और अब तो बात बिना पायलट वाले हवाई जहाज़ों की हो रही है. जी हां, बिना पायलट वाले विमान उड़ाने की कई देशों में कोशिश हो रही है.

पर बड़ा सवाल ये है कि क्या आप बिना पायलट वाले विमान में उड़ना पसंद करेंगे? आपको जब ये पता चलेगा कि आप जिस फ्लाइट से जाने वाले हैं उसमें कोई पायलट नहीं होगा, विमान ऑटोमैटिक तरीक़े से उड़ेगा, तो क्या आप सफ़र जारी रखेंगे या टिकट कैंसिल कर देंगे?

वैसे आपके सफ़र करने से पहले ही बहुत सी उड़ने वाली चीज़ें एआई या ऑटोमैटिक तरीक़े से आसमान में कुलांचे भर रही हैं. जैसे आपने ड्रोन का नाम सुना होगा. इन्हें हवाई हमलों से लेकर ट्रैफिक की निगरानी और जासूसी तक के काम में लाया जाता है.

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ये ऐसे विमान होते हैं जिनमें कोई पायलट नहीं होता. ये ज़मीन से रिमोट कंट्रोल किए जाते हैं. ये बात और है कि इनमें कोई इंसान भी सवार नहीं होता. ऐसे में जब ये ड्रोन किसी हादसे का शिकार होते हैं तो किसी की जान जाने का डर नहीं रहता. इसी तरह कई हेलीकॉप्टर भी आज कामयाबी से उड़ाए जा रहे हैं, जिन्हें कोई पायलट नहीं चलाता. जैसे कि अमरीकी हेलीकॉप्टर K-MAX, जिससे माल ढुलाई का काम लिया जा रहा है.

ब्रिटेन की रॉयल एरोनॉटिकल सोसाइटी के टिम रॉबिंसन कहते हैं कि आज ज़्यादातर फ्लाइट 95 फ़ीसद सफ़र के दौरान ऑटो पायलट में उड़ती हैं. मतलब ये कि मशीनें ही फ्लाइट को नियंत्रित करती हैं. सिर्फ़ टेक ऑफ और लैंडिंग के वक़्त इंसानी दखल होता है. या फिर किसी इमरजेंसी की सूरत में पायलट, विमान को मशीन से अपने कंट्रोल में लेता है.

इस साल जनवरी में जब अमरीका के लास वेगास शहर में कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक शो हुआ, तो, वहां चीन की कंपनी एहांग ने पहले ऐसे यात्री विमान का मॉडल पेश किया जो बिना पाययलट के उड़ सकता है. इसका नाम है एहांग-184. हेलीकॉप्टर जैसे इस विमान में एक आदमी एक छोटा सा बैग लेकर बैठ सकता है. इसमें एसी और रौशनी की भी सुविधा है. उड़ने के लिए किसी को भी इस विमान में अपना फ्लाइट प्लान दर्ज करना होगा. फिर वो अपने टैबलेट के ज़रिए टेक ऑफ़ और लैंड करने के निर्देश विमान को दे सकेगा. बाक़ी का सफ़र विमान ख़ुद ब ख़ुद तय करेगा. एहांग-184 एक छोटी कार जैसा विमान है.

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अमरीकी कंपनी ऑरोरा फ्लाइट साइंस कॉर्प ने भी सेंटॉर नाम का ऐसा ही ऑटोमैटिक विमान बनाया है जिसमें दो मुसाफ़िरों और दो पायलट के बैठने की जगह है. इस विमान को ज़मीन से रिमोट के ज़रिए भी उड़ाया जा सकता है. इसमें पायलट की ज़रूरत नहीं होगी.

यूरोपीय कंपनी एयरबस भी 'वाहना' नाम की उड़ने वाली कार के कॉनसेप्ट पर काम कर रही है. वहीं जर्मनी में वोलोकॉप्टर के नाम से एक प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है जिसमें ख़ुद से उड़ने वाले ड्रोन में दो लोग सफ़र कर सकें. इसी तरह यूरोप की एक और कंपनी माईकॉप्टर नाम का विमान बनाने की कोशिश में जुटी है. जिसमें एक या दो लोग हवाई सफ़र कर सकें.

जर्मनी के मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट के हेनरिख बुल्थॉफ़, इस ऑटोमैटिक विमान के प्रोजेक्ट से जुड़े हैं. हेनरिख कहते हैं कि हमारी कोशिश ये है कि हेलीकॉप्टर उड़ाना, कार चलाने जैसा आसान हो जाए. आप उसे रिमोट या अपने मोबाइल के ज़रिए कंट्रोल कर सकें.

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ब्रिटेन में भी कुछ कंपनियों ने मिलकर साल 2013 में ऐस्ट्रिया नाम से ऐसा ही एक प्रोजेक्ट शुरू किया था जिसमें बिना पायलट वाले यात्री जहाज़ की संभावना तलाशने की कोशिश की गई थी.

अब चाहे रिमोट के ज़रिए उड़ने वाला जहाज़ हो, या फिर, कोई मुसाफ़िर अपने मोबाइल से हेलीकॉप्टर की उड़ान नियंत्रित करे, सवाल ये है कि क्या हम ऐसे सफ़र में ख़ुद को सुरक्षित महसूस करेंगे? क्या हमें इस बात से ज़्यादा तसल्ली होगी कि हमारे हवाई सफ़र की कमान दो वर्दीधारी पायलटों के हाथ में हो, या फिर मशीनी दिमाग़ के हाथ में होने से हम ज़्यादा सुरक्षित महसूस करेंगे?

विमानों की दुनिया के अमरीकी जानकार स्टीफ़न राइस कहते हैं कि लोगों को फिलहाल पायलट पर ज़्यादा भरोसा है. राइस के मुताबिक़ जिन लोगों ने रिमोट कंट्रोल के ज़रिए कार चलाई है या विमान उड़ाया है, वो इसे मुश्किल तजुर्बा मानते हैं.

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लेकिन किसी भी ऑटोमैटिक मशीन को लेकर शुरुआत में इंसान फिक्रमंद होता है. बरसों पहले जब लिफ्ट की शुरुआत हुई थी, तो उस वक़्त लिफ्ट चलाने के लिए एक इंसान को ड्यूटी पर लगाया जाता था. आज हम बड़े आराम से ऑटोमैटिक लिफ्ट में सवार हो जाते हैं. यही हाल बिना ड्राइवर वाली रेलगाड़ियों का है.

ब्रिटेन की रॉयल एरोनॉटिकल सोसाइटी के टिम रॉबिंसन कहते हैं कि आगे चलकर लोग बिना पायलट वाले विमान में भी आराम से सफर करेंगे. हालांकि स्टीफ़न राइस कहते हैं कि ये भविष्य की बात है. आज किसी इंसान को बिना पायलट वाले विमान में उड़ने के लिए राज़ी कर पाना मुश्किल है. वजह ये कि बिना ड्राइवर वाली ट्रेन का ऑटोपायलट जब ख़राब होता है तो वो हमेशा टकराती नहीं. मगर विमान का ऑटोपायलट काम करना बंद करेगा तो विमान तो ज़मीन पर आ गिरेगा.

वैसे, जिस तरह पायलटों के तनाव में विमान हादसे कराने की घटनाएं हुई हैं. वैसे में कंप्यूटर पर भरोसा करना ज़्यादा ठीक लगता है. क्योंकि पायलट को नींद आ सकती है. वो थककर बेहोश हो सकते हैं. तनाव में कोई ग़लत क़दम उठा सकते हैं. ऐसा ऑटोमैटिक विमान में होने का डर नहीं रहेगा.

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लेकिन ये भी एक सच है कि ऑटोमैटिक तरीक़े से उड़ने वाला विमान किसी इमरजेंसी की सूरत में इंसानी सूझ-बूझ का इस्तेमाल करके विमान को बस्ती से दूर या किसी सड़क या फिर नदी में नहीं उतारेगा. वो तो उसी मशीनी आंकड़े के आधार पर काम करेगा, जो उसके बनावटी दिमाग़ में फीड किया गया होगा.

अमरीकी एविएशन एक्सपर्ट माइकल क्लेमन मानते हैं कि दोनों ही सूरतों में सुरक्षा का स्तर कमोबेश बराबर रहेगा. हादसे का ख़तरा भी उतना ही रहेगा. विमान चाहे पायलट उड़ाएं या फिर मशीन.

जानकार एक और डर की तरफ़ भी इशारा करते हैं. ये है ऑटोमैटिक विमान यात्रा के डेटा में सेंध का. हैकर या चरमपंथी किसी भी विमान के फ्लाइट प्लान में सेंध लगाकर विमान को क्रैश कराने की साज़िश रच सकते हैं. ऐसी सूरत में सफर के दौरान पायलट का होना मुसाफ़िरों की जान बचा सकता है.

तो अगले कुछ दशकों में ऐसा हो सकता है कि आप ऐसे विमान में सफ़र कर रहे हों जहां कॉकपिट की जगह लाउंज हो. जहां आप आराम से बैठकर बादलों के बीच से गुज़रते हुए दिलचस्प नज़ारे देख सकें. फिलहाल तो पायलट को ही विमान की बेस्ट सीट मिलती रहेगी.

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