आप वाक़ई व्यस्त हैं या दिखावा कर रहे हैं?

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Image caption व्यस्त रहना स्टेटस सिबल बन गया है.

आधुनिक जीवन की सुख सुविधाओं ने हमारी ज़िंदगी को बहुत आसान कर दिया है. ऑफ़िस के साथ साथ घर के काम करने के लिए भी तरह तरह की मशीनें आ गई हैं, जैसे कपड़े धोने के लिए, मसाला पीसने के लिए, बरतन धोने के लिए वगैरह वगैरह.

ये मशीनें हमारी ज़िंदगी को चला रही हैं, उसे आसान बना रही हैं. इनकी मदद से हम वक़्त बचाकर ज़्यादा से ज़्यादा काम कर सकते हैं. लेकिन हो रहा है इसके उलट.

हमारे पास आज वक़्त की ही सबसे बड़ी कमी है, क्योंकि हरेक के पास ढेर सारा काम है. लोगों के पास अपने परिवार तक के लिए समय नहीं. बहुत से लोग घर में भी रहते हैं तो वहां दफ़्तर का ही काम कर रहे होते हैं.

हम काम में कितने व्यस्त रहते हैं, यह जानने के लिए ब्रिटेन में 2014 में एक सर्वे कराया गया था.

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Image caption काम करने का कुल समय पहले जितना ही है.

हैरत की बात यह थी कि इस सर्वे में भी बहुत से लोग शामिल नहीं हो पाए क्योंकि उनके पास इतना वक्त ही नहीं था. सवाल उठता है कि क्या वाक़ई लोग उतने मसरूफ़ हैं जितना वो साबित करते हैं, या यह सिर्फ़ दिखावा है?

हाल में हुए कुछ शोध से पता चला है कि यह सिर्फ ढोंग है. जो लोग खुद को सबसे ज़्यादा मसरूफ़ बताते हैं, वे झूठ बोलते हैं. वे असल में उतने मसरूफ़ नहीं होते.

आप घर के काम में व्यस्त हों या ऑफिस के काम में. हाल के दशकों में आपकी मसरूफ़ियत में कोई ख़ास बदलाव नहीं आया है. बल्कि देखा तो यह गया है कि आज मां-बाप भी अपने बच्चों के साथ पहले की तुलना में ज़्यादा समय बिताते हैं.

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Image caption आराम करना भी ज़रूरी है

फिर भी आज लोग ज़्यादा व्यस्त क्यों महसूस करते हैं?

इसका सीधा सा जवाब है बदलती अर्थव्यवस्था. जैसे जैसे अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ है, लोगों की आमदनी बढ़ी है, उनका रहन-सहन बेहतर हुआ है. लोगों के लिए वक्त सबसे ज़्यादा क़ीमती हुआ है.

काम करने के जितने घंटे दिए जाते हैं, उतने में हमें काम करके देना होता है. इसलिए काम का दबाव बढ़ने लगता है. जिस ज़माने में अर्थव्यवस्था खेती-बाड़ी पर निर्भर करती थी. उस दौर में लोगों के समय की वो क़ीमत नहीं थी जो आज है.

उस अर्थव्यवस्था में लोगों पर शारीरिक मेहनत का बोझ ज़्यादा होता था. एक वक़्त के बाद दूसरे काम के लिए समय का इंतज़ार करना पड़ता था. जैसे फसल अगर उगा दी है, तो, उसके पकने तक का इंतज़ार करना ही पड़ता था.

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लेकिन सोलहवीं-सत्रहवीं सदी में यूरोप में औद्योगिक क्रांति के बाद हालात बदल गए हैं. मशीनों के ज़रिए हर काम को आज आसान और वक्त से पहले किया जा सकता है.

ब्रिटेन के मैनेजमेंट कंसलटेंट पीटर ड्रकर का कहना है कि आज काम करने का तरीक़ा बदल गया है. आज शारीरिक मेहनत से ज़्यादा दिमाग़ी मेहनत की जाती है.

बिज़नेस के लिए तरह तरह के आइडिया पर काम करना होता है, मीटिंग करनी पड़ती हैं, मेल के जवाब देने होते हैं. स्मार्टफोन आपके हाथ में हैं तो फिर आप चाहे फिर छुट्टी पर हैं या घर पर हैं या जिम में, सभी जगह ऑफिस का काम करते रहते हैं.

नतीजा यह है कि आप इस भुलावे में रहते हैं कि आपके पास बहुत काम है, और आप हर समय मसरूफ़ हैं. हमारी एक नज़र घड़ी पर तो दूसरी नज़र काम पर रहती है.

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मनोवैज्ञानिक कहते हैं इस तरह काम निपटाने से आपके काम पर असर पड़ता है. हम दिमाग़ी तौर पर हर वक़्त ख़ुद को व्यस्त महसूस करते हैं.

इस आपाधापी में जो काम ज़रूरी हैं वे भी नज़रअंदाज़ होने लगते हैं. घर और ऑफिस, दोनों जगह कामयाबी से सारे काम निपटाने का हम पर सामाजिक दबाव होता है. यह एक मुश्किल काम है.

हर समय खुद को मसरूफ़ महसूस करना एक तरह की सोच है. इस सोच को अर्थशास्त्री सेंधी मुल्लैनाथन और वैज्ञानिक एल्दार शफ़ीर 'कॉग्निटिव बैंडविड्थ' का नाम देते हैं.

यह एक ऐसी हालत होती है, जब इंसान को किसी खास तरह की कमी का एहसास होने लगता है, फिर चाहे वो पैसे की कमी हो या फिर वक़्त की कमी.

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इस भाव की वजह से आपको फ़ैसले लेने में भी दिक़्क़त होती है. आप अपने समय का सही इस्तेमाल नहीं कर पाते. नतीजा यह होता है कि आपके ज़रूरी काम भी छूटने लगते हैं. आपकी यह सोच और पुख्ता होती चली जाती है कि आप हर वक्त व्यस्त हैं.

इसका एक और ख़राब असर यह होता है कि आपको काम से कभी निजात नहीं मिलती. जब फुरसत के कुछ पल नसीब होते भी हैं, तो, उसमें भी आप सोचते हैं कि चलो इस समय का कुछ सदुपयोग किया जाए औऱ कुछ काम कर लिया जाए.

आप यह भूल ही जाते हैं कि ज़्यादा प्रोडक्टिव होने के लिए ज़रूरी है कि खुद के लिए भी थोड़ा वक़्त निकाला जाए.

कुछ जानकार मानते हैं कि ख़ुद को हर वक़्त व्यस्त रखना और ख़ुद को व्यस्त बताना एक तरह की बीमारी है. यह एक महामारी का रूप लेकर सारी दुनिया में फैलती जा रही है.

इससे पार पाने के लिए सारी दुनिया में काम के घंटे की सीमित कर दिए गए है. फिर भी लोग हर वक़्त मसरूफ़ हैं.

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इतिहास गवाह है जिन लोगों ने भी खूब धन-संपत्ति जमा की, कामयाबी हासिल की या समाज में अपना अलग मक़ाम बनाया, उसकी वजह आज़ादी थी, फुर्सत से बिताए कुछ पल थे. जब लोग खुद से बात करने, अपने हुनर को पहचानने के लिए वक़्त निकाल लिया करते थे. वे लोग हर वक्त काम में मसरूफ़ नहीं रहते थे.

उन्नीसवीं सदी के अर्थशास्त्री थॉ़र्नस्टीन वर्बलेन ने कहा था, "सच्चा सम्मान, आराम से काम करने की आज़ादी है'. मगर आज बड़ा आदमी होने की परिभाषा बदल गई है."

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के जोनाथन गर्शने कहते हैं कि आज किसी से भी पूछेंगे तो यही कहेगा कि वह बहुत व्यस्त है. यह नया फ़ैशन है, नया स्टेटस सिंबल है.

आज ख़ुद को सबसे ज़्यादा मसरूफ बताना बड़ा आदमी होने की निशानी बन गया है. माना जाता है जो लोग समाज में ऊंचा मक़ाम हासिल करते हैं वो हर वक्त मसरूफ रहते हैं. हालांकि यह बेहद ग़लत सोच है.

अर्थशास्त्री डैन एराइली इस बारे में एक ताला खोलने वाले की मिसाल देते हैं.

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वे कहते हैं कि शुरू में ये ताले खोलने वाला इंसान धीरे काम करता था. अक्सर ताले तोड़ डालता था. लेकिन उसके पास आने वालों की लाइन लगी रहती थी. जैसे-जैसे उसका काम बेहतर होता गया, उसके ग्राहक कम हो गए.

वजह यह थी कि लोग उसकी क़ाबिलियत से ज़्यादा उसके वक़्त लगाकर काम करने को अहमियत देते थे. आज यही सोच लोगों पर हावी हो गई है. लोग समझते हैं कि जो ज़्यादा वक़्त देता है, वही अच्छा काम करने वाला है.

हम किस काम को कितने बेहतर तरीक़े से निपटाते हैं, अहम यह है ना कि यह कि हमने इसके लिए कितना वक़्त लिया.

मगर, आज हो यही रहा है कि हम अपने काम को इसी बात से मापने लगते हैं कि हमने कितना वक़्त लगाया. इस बात पर तवज्जो नहीं होती कि वो काम कितना सही हुआ है.

काम की क्वालिटी पर ग़ौर करने के लिए हमें टाइम चाहिए. और वक़्त तभी मिल पाएगा जब आप सोचने के लिए वक़्त निकालेंगे.

तो, आप निकालेंगे न, कुछ देर ठहरकर, अपने लिए, सोचने के लिए थोड़ा वक़्त?

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी पर उपलब्ध है.)

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