सितारों से आगे तक का सफर कब पूरा कर पाएगा इंसान?

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अल्लामा इक़बाल ने कहा था, 'सितारों से आगे जहां और भी हैं...

जब हम चांद-तारों से भरे आसमान की ओर देखते हैं, तो उस जहां को देखने का, वहां तक जाने का दिल चाहता है. इंसान सोचता है कि इन सितारों के बीच एक नई दुनिया बसाई जाए. बहुत से लेखकों और फिल्म निर्देशकों ने तो ये काम कर भी दिखाया.

शायद इसीलिए हमें भी ये गुमान है कि जब ब्रह्मांड के बारे में इतनी फिल्में बन गई हैं, किताबें लिखी जा चुकी हैं तो कुछ तो सच होगा ही. किसी ने तो जाकर वहां तजुर्बा किया होगा ही. तभी तो हमें भी वहां के ख़्वाब दिखाए गए.

पर सवाल ये है कि ब्रह्मांड में किस तरफ़ जाएं? सितारों से आगे कहां हमें नया जहां मिलेगा? असल में ब्रह्मांड इतना बड़ा है कि इसका कोई ओर छोर नहीं. आप इसका अंदाज़ा इसी से लगा सकते हैं कि धरती पर जितने बालू के कण हैं, उससे भी ज़्यादा ब्रह्मांड में सितारे हैं. फिर इन सितारों का चक्कर लगा रहे ग्रह, उपग्रह, उल्कापिंड, धूमकेतु है.

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यानी ब्रह्मांड हमारे तसव्वुर से भी बड़ा है. ऐसे में इसके किस कोने में जाकर नई ज़िंदगी की तलाश की जाए, ये इंसान की समझ के परे है. इसीलिए अब तक हम अंधेरे में ही तीर मार रहे हैं. हमारी कुछ तकनीकी सीमाएं भी हैं. फिर भी इंसान ने सितारों के आगे के जहां की तलाश जारी रखी है.

कुछ निजी संस्थाएं भी इस दिशा में काम कर रही हैं, जैसे ताओ ज़ीरो फाउंडेशन, प्रोजेक्ट इकारस और ब्रेकथ्रू स्टारशॉट. इन संगठनों ने हालिया वर्षों में अपनी रिसर्च में बहुत सी नई जानकारियां हासिल की है. जैसे कि इसी साल अगस्त महीने में हमारे सौर मंडल के सबसे क़रीब के ट्रिपल स्टार, अल्फ़ा सेंचुरी के सूरज प्रॉक्ज़िमा सेंचुरी का चक्कर लगा रहे एक ग्रह का पता चला है.

ये ग्रह धरती के ही आकार का है. वैज्ञानिकों ने इसका नाम प्रॉक्ज़िमा बी रखा है. धरती से क़रीब सवा गुना बड़े इस ग्रह की खोज से एक बार फिर ये उम्मीद जगी है कि ब्रह्मांड में कहीं और भी जीवन है. एक और नया जहां भी है. इस ग्रह की तलाश से इंसान को एक बार फिर एलियन के वजूद के इशारे मिलने की उम्मीद जगी है.

प्रॉक्ज़िमा बी अपने सितारे की परिक्रमा पूरी करने में धरती के 11 दिन के बराबर का समय लेता है. इस पर इतनी गर्मी है जितनी पानी के पिघलने के लिए ज़रूरी है लिहाज़ा इस पर ज़िंदगी पनपने के आसार वैज्ञानिक मानते हैं. लेकिन ज़िंदगी के लिए ज़रूरी दूसरी चीज़ें जैसे हवा, पानी भी यहां मौजूद होगा या नहीं कहना मुश्किल है. फिर, प्रॉक्ज़िमा बी, अपने सूरज प्रॉक्ज़िमा सेंचुरी के इतने क़रीब है, जितना कि बुध ग्रह हमारे सूरज के. जिससे इस पर अपने सूरज की तीखी किरणे पड़ती हैं. साथ ही सूरज की तरफ़ इसका एक ही रूख रहता है. तो, ये कह पाना भी मुश्किल है कि यहां दिन और रात का भी कोई तसव्वुर है या नहीं.

प्रोक्सिमा बी पर क्या है, क्या नहीं है ये देखने के लिए हमें वहां जाना पड़ेगा. लेकिन हम वहां जाएंगे कैसे. ये 64 खरब डॉलर का सवाल है. क्योंकि वहां पहुंचने में इतना खर्च तो आएगा ही. हम अपनी तकनीक को चाहे जितना भी एडवांस क्यों ना कर लें लेकिन वहां तक पहुंचने में 18 हज़ार साल का समय तो लग ही जाएगा. क्योंकि आज हमारे पास जो सबसे तेज़ रफ़्तार का अंतरिक्ष यान है, वो भी प्रॉक्ज़िमा बी तक पहुंचने में इतना वक़्त लेगा.

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लेकिन वैज्ञानिकों ने हार नहीं मानी है. वो आज भी यहां जल्दी से जल्दी पहुचंने के तरीक़े खोज रहे हैं. एक बहुत हल्के वज़न वाला स्पेसक्राफ्ट बनाने की सोच रहे हैं. जिसे लेज़र लाइट के ज़रिए अंतरिक्ष के सफ़र पर भेजा जाएगा. हालांकि ये रौशनी की रफ़्तार के साथ तो चल नहीं पाएगा. अलबत्ता रोशनी की रफ़्तार का पांचवां हिस्सा ज़रूर पकड़ लेगा और 20 साल के अर्से में अल्फ़ा सेंचुरी के पास पहुंच जाएगा. इस स्पेसक्राफ्ट में एक बहुच छोटा कैमरा होगा, संवाद के सारे उपकरण इसमें लगाए जाएंगे. ताकि जब ये प्रॉक्ज़िमा बी के पास से गुज़रे तो ये वहां जो कुछ देख पाए उसकी जानकारी धरती तक पहुंचा सके.

रूस के अमीर दंपति यूरी और जूलिया मिलनर इसके लिए दस करोड़ डॉलर का दांव खेलने को तैयार हैं. मगर इसके लिए ज़रूरी तकनीक अभी मौजूद नहीं. इतने छोटे यान में लगाने के लिए छोटे मगर ताक़तवर सेंसर और कैमरे अभी ईजाद किए जाने बाक़ी हैं.

ब्रह्मांड के किसी दूसरे कोने तक पहुंचकर इंसान अपनी ही ज़िंदगी में वापस आ सके, इसके लिए तेज़ रफ़्तार ज़रूरी है. फिलहाल जो सबसे तेज़ रफ़्तार हम जानते हैं वो है रौशनी की. फिजिक्स के नियम कहते हैं कि इंसान इस रफ़्तार के बराबर चलने वाली कोई चीज़ बना ही नहीं सकता. ऐसे में ब्रह्मांड में लंबे सफ़र पर निकला इंसान अपनी ज़िंदगी में सफ़र पूरा करके लौट आए, ये मुमकिन नहीं दिखता.

फिलहाल जो सबसे तेज़ रफ़्तार या स्पेसक्राफ्ट इंसान बनाने में जुटा है, वो नासा के ज़ीनॉन प्रोजेक्ट का हिस्सा है. इसमें आयन इंजन की मदद से एक लाख पैंतालीस हज़ार किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार हासिल करने की कोशिश की जा रही है. इसमें ईंधन भी बहुत कम लगेगा. इसके बावजूद ये कहना मुश्किल ही है कि ब्रह्मांड की यात्रा इंसान आसानी से कर पाएगा.

इसकी सबसे बड़ी वजह है, ब्रह्मांड की लंबी दूरी तय करने में लगने वाला वक़्त. अगर किसी यान में दो चार लोगों को सवार करके बीस-तीस या चालीस साल के लिए अंतरिक्ष में भेज भी दिया जाए, तो वो ऊब जाएंगे. या स्पेसक्राफ्ट में रहते-रहते घुटन होने लगेगी. अंतरिक्ष में लंबे सफ़र पर भेजे गए इंसानों की अगर इस दौरान मौत हो गई, तो ऐसे मिशन का मक़सद ही नहीं पूरा होगा.

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इस चुनौती से निपटने के लिए वैज्ञानिक अलग-अलग नुस्खे आज़माने की सलाह दे रहे हैं. ब्रिटेन की न्यूकैसल यूनिवर्सिटी की रैशेल आर्मस्ट्रॉन्ग इससे निपटने के लिए एक सलाह देती हैं.

वो कहती हैं कि अभी जो अंतरिक्ष यान या स्पेस स्टेशन हैं, वो फैक्ट्री की तरह हैं. जहां पर सिर्फ़ मशीनें लगी हैं. हमें ऐसा यान विकसित करना चाहिए, जिसके भीतर धरती जैसा माहौल हो. जिसमें सवार लोग अपने इस्तेमाल की चीज़ें, जैसे सब्ज़ियां, अनाज और फल वग़ैरह उसी में उगा सकें. ऐसे में अंतरिक्ष में लंबी दूरी का सफ़र आसान हो जाएगा.

कुछ वैज्ञानिकों और उपन्यासकारों ने अंतरिक्ष में लंबे सफ़र से पार पाने के लिए एक और नुस्खा सुझाया है.

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वो कहते हैं कि इंसान के भ्रूणों को जमाकर, अंतरिक्ष में भेजा जाए. जिससे पूरे सफ़र के दौरान वो फ्रोजेन हालत में रहें. और जब ज़रूरत हो, तभी उनका विकास किया जाए और बच्चे पैदा किए जाएं. मगर तब सवाल ये होगा कि उन भ्रूणों की देख-रेख कौन करेगा? फिर जो बच्चे पैदा होंगे उनकी परवरिश कौन करेगा? उन्हें सिखाएगा-पढ़ाएगा कौन? तो, ये नुस्खा भी फिलहाल प्रॉक्ज़िमा बी तक इंसान को एक ज़िंदगी में नहीं पहुंचा सकेगा.ज

यानी, ब्रह्मांड में सितारों की सैर करने का इंसान का सपना कब पूरा होगा कहना मुश्किल है. काम आसान नहीं है. लेकिन कोशिशें जारी हैं. लिहाज़ा कहा जा सकता है कि हमारी-आपकी पीढ़ी में ये ख़्वाब शायद अधूरा ही रहे. लेकिन हमारी आने वालें नस्लें सितारों के आगे मौजूद जहान तक पहुंचने में कामयाब होंगी, वैज्ञानिको को ऐसी उम्मीद है.

तब तक तो हमें अल्लामा इक़बाल की शायरी पर यक़ीन बनाए रखना होगा कि,

सितारों के आगे जहां और भी हैं...

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

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