लैब में बनाया जा रहा है इंसानी दिमाग़!

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हमारे बड़े बुज़ुर्ग हमेशा ये बात कहते हैं कि इंसान चाहे जितनी तरक़्की कर ले लेकिन वो खुदा नहीं बन सकता. यानि जो चीज़ें कुदरत ने अपने हाथ में रखी हैं उनमें किसी तरह का बदलाव नहीं किया जा सकता. ना ही वैसी चीज़ें वो पैदा कर सकता है.

इसमें सबसे अहम है इंसान का जन्म. यानि दुनिया में ऐसी कोई ताक़त नहीं जो इंसान को पैदा कर सके या इंसानी शरीर के किसी भी हिस्से को वो अलग से बना सके.

हालांकि आज विज्ञान ने इतनी तरक़्क़ी कर ली है कि वो टेस्ट ट्यूब बेबी पैदा कर सकता है. क्लोन की मदद से एक ही इंसान जैसे कई इंसान भी बना सकता है. आज तो लैब में ही इंसान के शरीर के अंग बनाए जा रहे हैं.

ऐसा ही एक प्रयोग किया जा रहा है कैंब्रिज यूनिवर्सिटी की मोलिक्यूलर बायोलोजी लैब में. जहां इंसान की चमड़ी से इंसान का दिमाग बनाने की कोशिश की जा रही है. यहां दिमाग का विकास उसी तरह से किया जा रहा है जैसे मां के पेट में एक बच्चे का होता है.

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फ़र्क़ सिर्फ इतना है कि मां के पेट में दिमाग का विकास खून की सप्लाई से होता है. मां जो पोषक तत्व लेती है वही बच्चे को मिलते हैं.

वहीं, इस लैब में जिस दिमाग को बनाया जा रहा है, उसे ज़रूरी चीज़ें दूसरी शक़्ल में मुहैया कराई जा रही हैं. इस बात का ख़ास ख़्याल रखा जा रहा है कि परखनली में उपज रहे दिमाग़ को इन्फेक्शन न हो जाए.

इसीलिए जिस माहौल में विकसित होते नन्हे दिमाग़ रखे जाते हैं, उस पर ख़ास निगरानी होती है. जिस चीज़ में इन नन्हे दिमाग़ों को रखा जाता है, पहले उसे अल्कोहल से साफ़ किया जाता है, ताकि कोई इन्फेक्शन न हो.

अगर आप लैब में तैयार किए जा रहे दिमाग़ को देखेंगें तो हो सकता है ये आपको उतने दिलकश ना लगें. क्योंकि अभी वो पूरी तरह से विकसित नहीं हुए हैं. आप देखेंगे कि हल्के पीले और गुलाबी रंग के लिक्विड में पानी के बुलबुले जैसे कोई चीज़ तैर रही है. लेकिन ये बिल्कुल ऐसे ही विकसित हो रहा है जैसे किसी भी इंसान का मस्तिष्क मां के गर्भ में विकसित होता है.

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जिस तरह इंसान के दिमाग के अलग अलग हिस्से होते हैं, उसी तरह लैब में विकसित हो रहे इस दिमाग के भी कई हिस्से हैं. जैसे इसमें जो सुरमई हिस्सा है वो न्यूरॉन्स से बना है. और जहां आपको थोड़े मोटे टिशू नज़र आंगे वहां उसकी एक छोटी सी दुम विकसित हो रही है. इसका सीधा ताल्लुक़ रीढ़ की हड्डी से है.

दरअसल इंसान के दिमाग में ये वो हिस्सा होता है जहां भाषा को समझने की सलाहियत होती है. और सोचने की प्रक्रिया दिमाग़ के इसी हिस्से में होती है.

दूसरा हिस्सा है हिप्पोकैंपस. ये दिमाग का वो हिस्सा है जो याददाश्त और जज़्बात को कंट्रोल करता है. ये सभी हिस्से लैब में विकसित हो रहे इस दिमाग में भी हैं. पूरी तरह से तैयार होने पर ये बिल्कुल ऐसे ही लगेगा जैसे एक नौ महीने के बच्चे का दिमाग लगता है.

सवाल ये है कि आख़िर इंसानी दिमाग़ों की ये खेती कैसे की जा रही है? तजुर्बेकारों का कहना है कि लैब में दिमाग़ बनाना कोई इतना मुश्किल काम नहीं, जितना देखने, सुनने में लगता है.

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सबसे पहले उसके लिए कुछ सेल की ज़रूरत है. कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में इन दिमाग़ों को तैयार करने वाली टीम की प्रमुख हैं मैडेलीन लैंकेस्टर.

लैंकेस्टर का कहना है इस काम के लिए नाक, जिगर, पैर के नाखून की कोशिकाएं ली जा सकती हैं. हालांकि उनमें से स्टेम सेल को अलग करना होगा. क्योंकि इन्हीं से इंसान के बदन के बाक़ी अंग विकसित किए जा सकते हैं.

आप लैब में परखनली में पल रहे दिमाग़ों को देखेंगे तो आपको एक कोमा के साइज़ का सफ़ेद डॉट नज़र आएगा.

ये बिल्कुल ऐसा ही है जैसा एक भ्रूण का दिमाग़ होता है. आपने जिस स्टेम सेल का इस्तेमाल दिमाग़ विकसित करने में किया है. वो कुछ दिनों तक पोषक तत्व दिए जाने पर छोटी गेंदों जैसे दिखने लगते हैं. इन्हीं के बीच ब्रेन सेल्स या वो कोशिकाएं होती हैं जो आगे चलकर दिमाग़ के तौर पर विकसित होंगी.

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अगला पड़ाव होगा कि बाक़ी कोशिकाओं को ख़त्म करके, सिर्फ़ दिमाग़ बनाने वाली सेल्स को बचाया जाए. इसके लिए वैज्ञानिक इस गेंद जैसी चीज़ को खाना-पीना देना बंद कर देते हैं. इससे ज़्यादातर कोशिकाएं मर जाती हैं. मगर जिन सेल्स से दिमाग़ बनना होता है, उनमें मुसीबत झेलने की ताक़त ज़्यादा होती है. इसलिए वो बच जाती हैं. फिर इन्हें अलग करके दूसरी डिश में रखा जाता है.

प्रोफेसर मैडलीन लैंकेस्टर कहती हैं इन बेबी ब्रेन्स को विकसित करने वाली टीम एक फ़िक्रमंद माता पिता की तरह ही इनकी देखभाल करती है. जब एक ख़ास स्तर तक ये ब्रेन सेल विकसित हो जाते हैं तो उन्हें एक जेली जैसे लिक्विड में डाल दिया जाता है. जो इस बेबी ब्रेन के चारों तरफ़ सुरक्षा घेरा बना लेती है. इसके बाद इस दिमाग़ को ज़रूरी पोषक चीज़ें दी जाती हैं. क़रीब तीन महीने में ये बेबी ब्रेन तैयार हो जाते हैं. तीन महीनों में ये दिमाग़ करीब चार मिलीमीटर को हो जाता है और इसमें क़रीब बीस लाख तंत्रिकाएं होती हैं. आम तौर पर एक चूहे के दिमाग़ में इतने ही न्यूरॉन होते हैं.

लैंकेस्टर अपने काम को बहुत बड़ी कामयाबी नहीं मानती हैं.

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वो कहती हैं कि ऐसे ब्रेन से हम आम इंसान के दिमाग़ जैसा काम नहीं ले सकते. क्योंकि ये सोचने की क़ुव्वत नहीं रखता है. हालांकि इससे हमें ये समझने में मदद मिलती है कि हमारा दिमाग़ काम कैसे करता है.

प्रोफ़ेसर मैडलीन लैंकेस्टर कहती हैं लैब में एक पूरी तरह विकसित दिमाग़ बनाना उनका मक़सद नहीं है. बल्कि इस खोज के ज़रिए वो इंसान और बाक़ी जानवरों के दिमाग़ के काम की तुलना करना चाहती हैं. असल में एक चिंपैंज़ी और इंसान के दिमाग में जो जेनेटिक फ़र्क़ है वो बेहद कम है. फिर भी चिंपैंज़ी और इंसान के विकास में एक बहुत बड़ा फ़ासला हो गया है.

इसे समझने के लिए मैडलीन और उनकी टीम ने इंसान और चिंपैंज़ी के जीन से नया दिमाग़ विकसित किया. इस तजुर्बे में नज़र आया कि चिंपैंज़ी के जीन वाले हिस्से में जो तंत्रिकाएं विकसित हुईं वो इंसानी जीन से बनी कोशिकाओं के मुक़ाबले काफ़ी कमज़ोर थीं.

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वैसे, लैब में बनाए जा रहे इस आर्टिफ़िशियल मस्तिष्क से हमें ऑटिज़्म और शिज़ोफ्रेनिया जैसी बीमारियों से निपटने में मदद मिल सकती है. पिछले साल ही वैज्ञानिक ये पता लगाने में कामयाब रहे कि ऑटिज़्म की असल वजह दिमाग में दो तरह के न्यूरोन में ठीक तालमेल नहीं होना है. इस रिसर्च के बाद ही वैज्ञानिक ये भी जान पाए कि जब भ्रूण का दिमाग़ विकसित हो रहा हो तभी ये बीमारी पकड़ी जा सकती है.

लैंकेस्टर कहती हैं लैब में दिमाग विकसित करने के बाद इंसान के दिमाग को समझने की वैज्ञानिकों की समझ बढ़ी है. और इस दिशा में तेज़ी से काम आगे बढ़ रहा है.

वैज्ञानिकों का मक़सद अब लैब में बड़े आकार का दिमाग़ विकसित करना है. जिससे इन दिमाग़ों को प्रयोगशाला में उसी तरह काट-पीटकर समझा जा सके, जैसे वैज्ञानिक चूहों के दिमाग़ के साथ करते हैं.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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