किसी के दिमाग़ में झूठ भर देना कितना नैतिक

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बचपन की बहुत सी बातें हमें ताउम्र याद रहती है. इनमें से कुछ यादें ऐसी होती हैं जो हमें एक बेहतर इंसान बनाने में मददगार होती हैं. तो, कुछ ऐसी भी होती हैं जो लोगों पर से हमारा भरोसा उठा देती हैं.

बहुत बार हमारे बड़े-बुजुर्ग हमें बताते हैं कि तुम बचपन में फलां काम करते थे, तुम ऐसा करते थे, तुम वैसा करते थे, वगैरह वगैरह. कई बार इस तरह की बातें घर के बड़े आपकी अच्छाई के लिए भी आप से करते हैं.

मसलन आपको झूठ बोलने की आदत है. आपके घर के किसी बड़े ने बताया कि बचपन में आप कभी झूठ नहीं बोलते थे, आप हमेशा एक फरमाबरदार बच्चे थे. सब आपको बहुत प्यार करते थे.

अब आप भी सोचेंगे कि अगर मैं बचपन में ऐसा था तो मुझे ये सुधार खुद में लाना चाहिए. हालांकि ये सब बातें आपको सुधारने के लिए शायद झूठ ही कही गई हों, लेकिन आपको वो सच लगेंगी.

लेकिन जब ये पता चले की आपको नेक राह पर लाने के लिए आपके ज़हन में झूठी यादें डाल दी गई हैं तो हो सकता है कि आपको बहुत गुस्सा आए.

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शोध में पाया गया हैं कि बचपन की जो यादें हमारे ज़हन में रहती हैं वो हमेशा बिल्कुल सही नहीं होती. वो ज़हन में बिखरी रहती हैं. लेकिन जब कोई दिमाग़ में उन यादों के बीज बो देता है तो लगने लगता है कि हो सकता है ऐसा ही हुआ हो. क्योंकि ये ज़रूरी नहीं कि वो बात कभी हुई ही ना हो.

मिसाल के तौर पर, हो सकता है कि आप आज किसी की पिटाई बिल्कुल ना कर पाएं. वहीं, अगर कोई आप से कहे कि आपने बचपन में बच्चों की खूब पिटाई की है, तो आप, यक़ीन करने लगेंगे. क्योंकि ये कोई ऐसी नामुमकिन बात तो है नहीं. ये और बात है कि आज आप वो सब ना कर पाएं.

इस मुद्दे पर कई तजुर्बे किए गए हैं. जैसे कि अमरीका में हुए ऐसे ही एक रिसर्च में लोगों को दो हिस्सो में बांटा गया. एक ग्रुप से उनके बचपन से जुड़े बहुत से सवालों के जवाब देने को कहा गया. ये सभी सवाल एक कंप्यूटर में डाल दिए गए.

लेकिन इस रिसर्च के नतीजे हैरान करने वाले थे. इन्हें बताया गया था कि बचपन में इन्हें दही खाना बिल्कुल पसंद नहीं था. इन्हें इनके बचपन के बारे में बहुत सी ग़लत बातें बताई गई थीं. दूसरे ग्रुप को इस रिसर्च से पूरी तरह से अलग रखा गया था.

दो हफ़्ते बाद दोनों ग्रुप में शामिल लोगों को एक ही खाना चखाया गया. पाया गया कि दोनों ग्रुप के प्रतिभागियों ने उस खाने का बराबर लुत्फ़ उठाया. हां इतना ज़रूर था कि जिन लोगों ने पहले कहा था कि उन्हें बचपन में दही खाना पसंद नहीं उन्होंने दूसरे ग्रुप के प्रतिभागियों कि अपेक्षा 25 फीसद कम दही खाई.

इससे पता चलता है कि शायद किसी खास मक़सद के तहत उनके ज़हन में झूठी यादें डाल दी गई हों.

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इस तरह की झूठी यादें ज़हन में डालकर बहुत सी बीमारियों का इलाज भी किया जाता रहा है. कई मनौविज्ञानिक भी मानते हैं कि उन्होंने अपने मरीज़ों का इलाज करने के लिए बहुत सी झूठी बातें उन्हें समझाईं, उनके ज़हन में बिठाईं.

लेकिन सवाल ये है कि क्या इस तरह से इलाज ठीक है? भले ही ये मरीज़ की भलाई के लिए किया जा रहा हो. क्योंकि वो मरीज़ इन्हीं यादों के सहारा अपना भविष्य बुनने लगता है.

ब्रिटेन के वेलकम ट्रस्ट के ज़रिए एक रिसर्च कराई गई. इस रिसर्च में लोगों को फॉल्स मेमोरी थेरपी के बारे में बताया गया. ये तजुर्बा ब्रिटेन और अमरीका के लोगों के बीच किया गया था. जो लोग रिसर्च में शामिल हुए थे, वो मोटापे का शिकार थे.

पेशेवर लोगों की मदद से वे अपना वज़न कम करना चाहते थे. इन पेशेवर लोगों ने अपने ग्राहकों की मोटापा बढ़ाने वाले खाना खाने की आदत छुड़ाने के लिए, उनके दिमाग में बहुत सी झूठी बातें डाल दीं. हालांकि थेरेपी पूरी होने के बाद उन्हें सच बता दिया गया था.

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लेकिन जब इस तजुर्बे के बारे में लोगों से पूछा गया तो लोगों की राय बंटी हुई दिखी. 41 फ़ीसद को इस तरह झूठ के ज़रिए इलाज करना मुनासिब लगा. वहीं 48 फ़ीसद को ये तरीक़ा ग़लत लगा.

एक स्टडी के मुताबिक़ बहुत से ऐसे लोग हैं जो अपनी ज़हनी परेशानी से निजात पाने के लिए ऐसी दवाओं का सेवन करने के लिए तैयार हैं, जो उनकी तकलीफ़ को कम कर सके.

इसी साल छपी एक और रिसर्च के मुताबिक 23 फीसद अमरीकी नौजवान कहते हैं अगर उन्हें अपने सोचने समझने की क्षमता बढ़ाने वाली कोई मशीन मिल जाए तो वो उसे अपने दिमाग में फिट कराने के लिए तैयार हैं. उन्हें ये बिल्कुल सही लगता है.

दिमाग़ में ग़लत बात बैठाकर, किसी का इलाज करना कहां तक ठीक है? इस सवाल का जवाब जानने के लिए क़रीब दो सौ लोगों से उनकी राय मांगी गई. ज्यादातर का कहना था कि भारी भरकम मेडिकल इलाज करने से बेहतर है कि ऐसी कोई थेरेपी हो.

इसके समर्थकों का तर्क है कि आख़िर हम इलाज के लिए तमाम तरह की दवाएं खाते हैं. टेस्ट कराते हैं. ये बाहरी चीज़ें भी हमारे शरीर में जाकर नुक़सान पहुंचा सकती हैं. इन दवाओं के मुक़ाबले कोई झूठा ख़्याल हमें ठीक कर दे तो इसमें बुराई क्या है?

हालांकि झूठी बातों से किसी का इलाज करने के तरीके के विरोधियों की भी कमी नहीं.

ब्रिटेन की एक महिला ने तर्क दिया कि सरकारें इसका ग़लत इस्तेमाल कर सकती हैं. मान लीजिए कि कल समलैंगिकों के ज़हन में ये बात बैठा दी जाए कि वो बाक़ी इंसानों जैसे ही हैं. तो ये तो उनके साथ धोखा ही होगा न? भले ही अभी ऐसा नहीं होने वाला हो. लेकिन अगर जनता इसके लिए राज़ी हो गई, तो कल को ये भी हो सकता है.

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विरोधी झूठी यादों से इलाज को धोखा और निजता पर हमला मानते हैं. उनका कहना है कि अगर इलाज करने वाला ही मरीज़ से झूठ बोलने लगेगा तो मरीज़ का उस पर से भरोसा उठ जाएगा. ऐसा नहीं होना चाहिए.

हालांकि ऐसे इलाज के समर्थकों की एक जमात मानती है कि ये मरीज़ की इच्छा पर छोड़ दिया जाना चाहिए कि वो किस तरीक़े को अपनाना चाहता है.

बहरहाल, हमें ख़ुद से ये सवाल पूछना चाहिए कि क्या हमें अपनी यादों के साथ किसी को खिलवाड़ करने का मौक़ा देना चाहिए? क्योंकि ये यादें चाहे झूठी हैं या सच्ची, हैं तो हमारी यादें. और कुछ यादें हमें जीने का मक़सद देती हैं.

यादें खट्टी हों, मीठी हों या कड़वी हों, किसी भी इंसान का सरमाया होती हैं.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी पर उपलब्ध है.)

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