मासूम चेहरे वाले होते हैं भरोसे के लायक?

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कहते हैं चेहरा इंसान की आत्मा का अक्स होता है. वो जो सोचता है, जैसे विचार रखता है, सब कुछ उसका चेहरा बयान करता है. कुछ लोगों का चहरा बड़ा होता है. कुछ चेहरे से अपनी उम्र से बड़े लगते हैं तो कुछ बहुत ही मासूम लगते हैं. और मासूम चेहरा होने के तो बहुत से फ़ायदे हैं.

उन्हें ज़्यादातर लोग प्यार की नज़र से देखते हैं. मां बाप भी ऐसे बच्चों को लेकर ज़्यादा फ़िक्रमंद ज़्यादा रहते हैं कि कहीं कोई उनकी मासूमियत का ग़लत फ़ायदा ना उठा ले. और प्यार भी उन्हें ही ज़्यादा करते हैं.

ये ख़्याल बहुत आम है कि बच्चों जैसे मासूम दिखने वाले लोग भरोसे के लायक़, ईमानदार, हमदर्द और सबको साथ लेकर चलने वाले होते हैं. लेकिन ये सब सिर्फ एक ख़्याल ही है सच्चाई इससे जुदा है. रिसर्च बताते हैं ऐसे लोगों में जुर्म की तरफ़ झुकाव होने का ज़्यादा डर होता है. ऐसे लोग अपनी भोली सूरत होने का फ़ायदा उठाते हुए आसानी से जुर्म कर बैठते हैं और इन पर आसानी से शक़ नहीं होता.

मासूम और भोला चेहरा होने का फ़ायदा सिर्फ मर्दों को ही नहीं मिलता बल्कि औरतों को भी मिलता है. न्यूयॉर्क की कोलगेट यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर, कैरोलिन कीटिंग कहती हैं कि अलग-अलग संस्कृतियों में हर तरह के चेहरे की अलग-अलग परिभाषा दी गई है लेकिन बड़ी हिरण जैसी आंखों, लंबी पलकें, उभार वाली भौंहों, गोल चेहरा, गुदाज़ उभार वाले होंठ, हरेक संस्कृति में बिला शर्त खूबरसूरती की निशानी मानी जाती हैं. चेहरे कि बुनियाद पर किसी के बारे में कोई ख़याल बनाने वाली सोच हज़ारों साल पुरानी है.

प्राचीन ग्रीस में भी ऐसा ही होता था. उन्होंने तो चेहरा पढ़ने को अलग विज्ञान 'फिसियोग्नोमी' का ही नाम दे दिया था. ईसा पूर्व 500 साल पहले गणितज्ञ पायथोगरिस ने अपने मुताबिक़ चेहरों को पढ़ा.

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अरस्तू ने भी कुछ ऐसा ही माना कि बड़े सिर वाले लोग नीच स्वभाव के होते हैं. तमाम ग्रीक जानकारों ने नैन-नक्श को अलग-अलग तरह से परिभाषित किया. जैसे जिन लोगों की नाक ऊपर की तरफ़ मुड़ी होती थी उनके लिए ये माना जाता था कि उनमें खुद को दूसरों से अलग समझने की भावना है. ऊंचा माथा, ऊंची भंवें, रईस घरानों के लोगों की अलामत माने जाते थे.

ये सारी बातें पुराने ज़माने की हैं. मगर सदियां बीतने के बावजूद आज भी इंसान के ख़याल नहीं बदले. आज भी लोगों के चेहरे के बारे में लोगों की राय कमोबेश वही है. जैसे कि जिन लोगों की क़द-काठी ऊंची होती है, वो मिलनसार स्वाभाव के माने जाते हैं. ऐसे ही जो लोग शेर से मिलती जुलती क़द-काठी के होते हैं वो दबदबा रखने वाले होते हैं. कहने का तलब ये है कि हम सेकेंड के हज़ारवें हिस्से में ही उसका चेहरा देखकर उसके बारे में 50 मिली सैकेंड के अंदर ही राय क़ायम कर लेते हैं.

असल में विकास की प्रक्रिया में इंसान सबसे सुस्त प्राणी है. इसके बच्चों के बड़े होने में काफ़ी वक़्त लगता है. जब बच्चा पैदा होता है तो उसके सिर के अनुपात में उसका बाक़ी शरीर बेहद छोटा होता है. इसीलिए बच्चे गोल-मटोल लगते हैं. बच्चे जो प्यारे और मासूम होते हैं उन्हें देखकर भी कई बार अंदाज़ा लगा लिया जाता है कि वो बड़े होकर कैसे दिखेंगे. बड़े होने के साथ साथ शरीर में भी बहुत से बदलाव आते हैं. हां इतना ज़रूर है कि कुछ के चेहरे की बनावट में बड़े होने तक बहुत अंतर नहीं आता. जबकि कुछ बच्चों के चेहरे बड़े होने के साथ साथ काफ़ी हद तक बदल जाते हैं.

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लेकिन, होता ये है कि बच्चे जब बड़े होते हैं तो उनका सिर तो उतना नहीं बढ़ता, जिस अनुपात में शरीर के दूसरे हिस्से बढ़ते हैं. इसीलिए बच्चे बहुत ''क्यूट'' लगते हैं. कुछ लोगों के चेहरे का ये भोलापन ताउम्र क़ायम रहता है. भोलापन हर इंसान को अपनी तरफ़ खींचता है. जैसे कि बच्चों को देखकर उन्हें नुक़सान पहुंचाने का ख़याल दिल से निकल जाता है. वैसे ही, मासूम चेहरे वालों को देखकर लगता है कि उनका चेहरा चीखकर ये कह रहा है कि मैं बच्चा हूं, मुझे तकलीफ़ मत देना.

मासूम चेहरे का कारोबार दुनिया में काफ़ी चमका है. मिकी माउस, बेटी बूप और बाम्बी जैसे किरदार बेहद लोकप्रिय हुए. 2012 में लंदन की सड़कों पर बच्चों के चेहरे पेंट कर दिए गए थे, ताकि लोग अपराध कम करें.

मासूम चेहरों के हवाले से कैरोलिन कीटिंग ने कई तजुर्बे किए हैं. उन्होंने हर तजुर्बे में पाया कि भोले चेहरों को देखकर लोगों के दिल में दया का भाव जाग जाता है.

कैरोलिन ने राजनेताओं के बारे में भी एक तजुर्बा किया था. मासूम चेहरों वाले नेताओं पर लोग सहज ही भरोसा कर लेते हैं. पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की ही मिसाल लीजिए. तमाम सेक्स स्कैंडल्स से घिरे होने के बावजूद, उनकी लोकप्रियता में कभी कमी नहीं आई. कैरोलिन इसे बिल के बच्चों जैसा चेहरा होने का कमाल बताती हैं.

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हालांकि कई बार मासूम चेहरे होने का ख़ामियाज़ा भी नेताओं को उठाना पड़ता है. जैसे कि ब्रिटेन में टोरी पार्टी के नेता विलियम हेग, जो, टोनी ब्लेयर से 2001 का चुनाव हार गए थे. इसी तरह ब्रिटेन के मौजूदा विदेश मंत्री बोरिस जॉनसन, जिन्हें कुछ महीनों पहले तक कहा जाता था कि वो नेता बनने लायक़ नहीं.

महिला नेताओं के लिए ये और भी चुनौतीभरा हो सकता है. उन्हें पहले तो महिला होने और फिर भोले चेहरे वाला होने की दोहरी चुनौती से जूझना पड़ता है.

मासूम चेहरे के साथ कई नेगेटिव बातें भी जुड़ी होती हैं. लोग ऐसे चेहरे वालों को कमज़ोर, कम क़ाबिल मानते हैं. जबकि सच ये है कि ये लोग ज़्यादा आक्रामक होते हैं. अपने चेहरे की कमी से पार पाने के लिए ज़्यादा मेहनत करते हैं.

सवाल ये है कि धरती पर इतने लोग भोले-भाले चेहरे वाले कैसे हैं?

असल में अपने बाक़ी रिश्तेदारों जैसे बंदरों और चिंपैंज़ियों के मुक़ाबले इंसान का चेहरा ज़्यादा मासूमियत लिए होता है. हमारे चेहरे पर बाल भी कम होते हैं. शायद ये हमारे और चिंपैंज़ी के बीच जीन के फ़र्क़ का कमाल है. हालांकि हम दोनों के बीच सिर्फ़ साठ लाख साल की विकास प्रक्रिया का फ़र्क़ है, जोकि क़ुदरती विकास के लिहाज़ से इतना ही दौर है जैसे कि कोई पलकें झपकाए.

इंसानों में भोले चेहरे वालों के ज़्यादा होने की वजह ये भी हो सकती है कि इंसान को हमेशा ही ऐसे चेहरों वाले लोग लुभाते हैं. तो विपरीत सेक्स का साथी अगर दिखने में भोला है तो उसमें मानव ज़्यादा दिलचस्पी लेता है. ये हज़ारों साल से चला आ रहा सिलसिला है, जो अब हमारे ज़हन में गहरे बैठ गया है.

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महिलाओं का मासूम चेहरा, मर्दों को शायद ये यक़ीन दिलाता है कि दोनों के मेल से होने वाले बच्चे को ऐसी महिलाएं बेहतर परवरिश दे सकेगी. वहीं मर्दों में बच्चों जैसे चेहरे को साथी के तौर पर महिलाएं भी पसंद करती हैं. वैसे अब तक के कई तजुर्बे ये कहते हैं कि बच्चों जैसे चेहरे वाले मर्द भी काफ़ी लोकप्रिय होते हैं. शायद औरतों को ऐसे चेहरे देखकर ये लगता है कि ये मर्द, बच्चों की परवरिश में उनके काफ़ी मददगार होंगे.

मासूम चेहरे वालों को और भी कई फ़ायदे होते हैं. जैसे मुश्किल वक़्त में वो ज़्यादा मदद जुटा पाते हैं. उनकी मासूमियत पर फ़िदा लोग उनकी मदद बेझिझक कर देते हैं. इसी तरह ऐसे चेहरों वाले भीख मांगने के पेशे में भी काफ़ी कामयाब होते हैं.

तो, अगली बार आप किसी भोले चेहरे वाले को ख़ुद को प्यार से देखते पाएं, तो ये जानिएगा कि ये हमारे जीन की वजह से है, जो मासूमियत पर फ़िदा है.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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