जनाब, नाम में बहुत कुछ रखा है!

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बुज़ुर्ग कहते हैं कि जब बच्चा पैदा हो तो मां-बाप की पहली ज़िम्मेदारी है वो बच्चे का अच्छा सा नाम रखें. अच्छे नाम से मतलब, ऐसा नाम जिसका अच्छा मतलब हो. क्योंकि किसी इंसान की पहली पहचान उसका नाम होता है.

कुछ लोगों के लिए तो बच्चे का नाम रखना इतना अहम मौक़ा होता है कि वो बाक़ायदा नामकरण समारोह करते हैं. इसमें रिश्तेदार, मिलने-जुलने वाले और दोस्त सभी शामिल होते हैं. बच्चे का नाम रखने के लिए धर्मगुरुओं से भी मशविरा किया जाता है.

एक चलन और भी है. अक्सर लोगों के दो नाम होते हैं. एक वो नाम जो सरकारी रिकॉर्ड में रहता है यानी हमारा असली नाम. दूसरा नाम वो होता है जो घरवाले प्यार से रख देते हैं. बुज़ुर्ग कहते हैं मोहब्बत में भी बच्चे को ऐसे नाम से पुकारो, जिसका कोई माक़ूल मतलब हो.

आपने देखा होगा कि बहुत से लोग कुछ वक़्त के बाद अपने बच्चे का नाम बदल देते हैं. अगर उनका बच्चा बीमार होने लगता है तो कहते हैं, इसके नाम का इस पर गहरा असर पड़ रहा है. या ये कि ये नाम हमारे बच्चे को रास नहीं आ रहा है.

माना जाता है जिस नाम से इंसान को सबसे ज़्यादा पुकारा जाता है, उसकी ज़िंदगी पर उसी नाम का असर सबसे ज़्यादा होता है. लेकिन क्या हमारे नाम का हमारी क़िस्मत से कोई रिश्ता है.

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कुछ रिसर्च में पाया गया है कि नाम का बहुत हद तक हमारे मिजाज़ पर असर पड़ता है. यहां तक कि नाम से हमारा पेशा भी तय हो जाता है. बहुत बार हम से मिले बना सिर्फ हमारे नाम से ही लोग हमारे बारे में राय क़ायम कर लेते हैं. ब्रिटेन की एक स्तंभकार केटी हॉपकिंस मानती हैं कि नाम का ताल्लुक़ बच्चे की सामाजिक और आर्थिक स्थिति से भी होता है. वो ओल्ड फैशन विक्टोरियन नामों की हिमायत करती हैं. केटी ने अपने बच्चों के ऐसे ही नाम रखे हैं. क्योंकि ऐसे नामों से बच्चे के आला तबक़े से ताल्लुक़ रखने का गुमान होता है.

हमारा नाम हमारी ज़िंदगी पर कैसा असर डालता है, ये जानने के लिए नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च के डायरेक्टर डेविड फिग्लियो ने गहरी रिसर्च की है. उन्होंने पहली रिसर्च अफ़्रीका और अमरीका के ऐसे लोगों पर की, जिनका ताल्लुक़ मज़दूर वर्ग से था. जिन लोगों के नाम के आख़िर में 'इशा' जुड़ा था, उनका ताल्लुक़ ग़रीब घरानों से था.

यही रिसर्च उन्होंने ऐसे भाई-बहनों के साथ की, जिनमें से एक का नाम मज़दूरों जैसा लगता था. वहीं, दूसरे का नाम मध्यम वर्ग से ताल्लुक़ रखने वाले लोगों के नाम के जैसा था. पाया गया कि जिस बच्चे का नाम मज़दूरों जैसा था, स्कूल में उनकी परफॉर्मेंस बहुत अच्छी नहीं थी.

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इसके अलावा कितने लोग आपको, आपके सही नाम से पुकारते हैं, इसका असर भी आपको ज़िंदगी में मिलने वाले मौक़ों पर पड़ता है. बहुत बार जब नाम से ही नस्ली भेदभाव शुरू हो जाता है तो मुश्किल और बढ़ जाती है. एक रिसर्च में दो अलग-अलग बायोडेटा एक नौकरी के लिए बोस्टन और शिकागो भेजे गए.

एक सीवी ऐसा था, जिसमें अंग्रेज़ों के नामों से मेल खाता नाम था. जैसे एमिली वाल्श, ग्रेग बेकर. दूसरे सीवी में ऐसा नाम था जो अफ़्रीक़ी-अमरीकियों के नाम से मेल खाता था. जैसे लकिशा वाशिंगटन, जमाल जोन्स. पाया गया कि इंटरव्यू के लिए एमली और ग्रेग को ज्यादा जगह से कॉल आई.

बहुत से नाम ऐसे होते हैं जिनको पुकारने में ज़रा मुश्किल होती है. ऐसे लोगों के लिए अलग ही तरह की धारणा बन जाती है. जैसे कीकी, ऐसा नाम है जिसकी अदायगी में ज़बान को खास तरह से महनत करनी पड़ रही है.

वहीं बाउबा ऐसा नाम है जो आसानी से अदा हो रहा है. जिनका नाम लेना आसान होता है, लोग ये मान लेते हैं कि अपने नाम की तरह वो शख़्स भी आसान मिज़ाज का होगा. एक रिसर्च में ये बात सामने आई कि जिन लोगों के नाम लेने में ज़बान गोल घूमती है, ऐसे लोग ज़्यादा दोस्ताना और खुले मिज़ाज के होते हैं, माहौल के मुताबिक़ खुद को आसानी से ढाल लेते हैं. कुछ हद तक अंतर्मुखी भी होते हैं.

दूसरी ओर, जिन नामों की अदायगी में खास तरह की धार होती है, उनमें मर्दाना ख़ासियत ज़्यादा होती है. उन्हें गुस्सा भी जल्दी आता है, ज़्यादा आक्रामक होते हैं. चिड़चिड़ापन उनके मिजाज़ का हिस्सा होता है. व्यंग करना उन्हें पसंद होता है. सबसे बड़ी बात ये कि अपने इरादे के पक्के होते हैं. इस रिसर्च में करीब 32 लोगों ने हिस्सा लिया था, जिनमें से 24 लोग इस रिसर्च के नतीजों से सहमत थे.

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सरनेम भी आपकी पहचान बनाने में अहम रोल निभाता है. दरअसल सरनेम हमारे पुरखों से हमारा रिश्ता बताता है. स्पेन और ब्रिटेन में एक रिसर्च की गई.

पाया गया कि ब्रिटेन में करीब पांच हज़ार लोग एक ही सरनेम वाले थे. लेकिन उनके पूर्वज एक दूसरे से अलग थे. जबकि आयरलैंड में इसके उलट था. यहां की कम आबादी, इतिहास और भौगोलिक परिस्थितयां इसके लिए ज़िम्मेदार हो सकती हैं, जो कि स्पेन और ब्रिटेन से अलग हैं.

हमारे सरनेम से हमारी कद-काठी के बारे में भी पता चल सकता है. हमारा उपनाम हमारे पेशे को तो दर्शाता ही है. चूंकि उपनाम अपने बुज़ुर्गों से ले लेते हैं तो इसी से अंदाज़ा लगा लिया जाता है कि बंदा फ़लां खानदान या ज़ाति-बिरादरी से है तो कैसा होगा.

मिसाल के तौर पर एक तजुर्बे में टेलर औऱ स्मिथ उपनाम वाले दो सौ आदमियों को उनकी उम्र, लंबाई और वज़न के मुताबिक खेल में ख़ुद को ढालने को कहा गया.

एक साल तक ब्रिटेन, जर्मनी, और ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ियों के साथ इन पर भी नज़र रखी गई. पाया गया कि टेलर उपनाम के मर्द, स्मिथ उपनाम के मर्दों के मुक़ाबले ज़्यादा छोटे क़द के और दुबले पतले थे. जबकि स्मिथ उपनाम वालों ने ख़ुद को ऐसे पेशे के लिए तैयार किया, जिसमें ताक़त की ज़रूरत थी. पैदाइश के वक़्त बच्चे को चाहे जो नाम दिया जाए.

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अहम बात ये है कि हम अपने नाम के साथ तालमेल बैठाते हैं. डेविड फिग्लियो की रिसर्च साबित करती है कि जिन लड़कों के नाम लड़कियों के नाम से मिलते जुलते होते हैं, उन्हें परेशानी ज़्यादा होती है. इसी तरह जिन लड़कियों के नाम लड़कों जैसे होते हैं, उन्हें भी इसी परेशानी का सामना करना पड़ता है.

बहरहाल, आपका नाम आपकी पहचान है, हो सकता है कुछ हद तक ये आपकी क़िस्मत पर असर डाले. लेकिन आपको अपनी क़िस्मत ख़ुद ही बनानी होगी. इसलिए नाम के सहारे रहने के बजाए मेहनत और लगन से अपना हाल और मुस्तक़बिल संवारने की कोशिश करें.

अलबत्ता किसी को अपने नाम के साथ खिलवाड़ मत करने दीजिए. अगर कोई आपको ग़लत नाम से पुकारता है, तो उसे तुरंत टोकिए.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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