क्यों कर रहे शिकवा, ये दुनिया बड़ी अच्छी है

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अगर आपको इंसानी सभ्यता के किसी भी दौर में जन्म लेने का अधिकार मिले तो आप कब पैदा होना चाहेंगे? कुछ लोग शायद उस वक़्त में पैदा होना चाहें, जब इंसान ने पहले-पहल औज़ारों को हाथ में पकड़ना सीखा था. कुछ को उस वक़्त जन्म लेना अच्छा लगे, जब इंसान ने क़लम और काग़ज़ का इस्तेमाल शुरू किया.

किसी को उस दौर को देखना अच्छा लगेगा जब माइकल एंजेलो, रोम में सिस्टीन चैपल बना रहे थे. या कुछ लोग शेक्सपियर के दौर में पैदा होना चाहेंगे. ये सब रूमानी ख़्याल आपको अच्छे लग सकते हैं. मगर हम आपको बता दें कि आपको उस दौर में पैदा होने पर भारी क़ीमत भी चुकानी होगी.

उस दौर की चुनौतियों का भी आपको सामना करना होगा. आप बीमार पड़ गए तो शायद आपको जोंक से इलाज कराना पड़े. हिंसा से भी आपकी मौत हो सकती है. और पुराने दौर में पैदा होने पर शायद आपको ताउम्र ग़रीबी और भुखमरी का सामना करना पड़े.

इंसान की सभ्यता के एक बड़े दौर में ज़िंदगी बेहद मुश्किल रही है. औसत उम्र छोटी रही है. खाने के लाले पड़े हैं. आज भले ही आपको चरमपंथ, ग्लोबल वार्मिंग, आर्थिक मंदी जैसी चीज़ें डराती हों, लेकिन यक़ीन जानिए ये दौर हमारे लिए बहुत अच्छा है. हमारी ज़िंदगी, हमारा रहन-सहन काफ़ी बेहतर हुआ है. हम और सभ्य बने हैं.

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रिसर्चर इयान गोल्डिन और क्रिस कुटार्ना ने अपनी क़िताब, 'एज ऑफ डिस्कवरी' में इस बारे में विस्तार से लिखा है.

वो कहते हैं कि इंसान की औसत उम्र जितनी पिछले पचास सालों में बढ़ी है, उतनी पिछले एक हज़ार साल में भी नहीं बढ़ी. इस साल पैदा हुए बच्चों के बारे में ये उम्मीद की जा सकती है कि वो 22वीं सदी को देख सकेंगे. हिंसा से उनकी मौत नहीं होगी.

आज पढ़ाई-लिखाई से लेकर सेहत तक के मोर्चे पर हम बेहतर ज़िंदगी जी रहे हैं. नवजातों और बच्चों की मौत का आंकड़ा कम हुआ है. दुनिया में ग़रीबी कम हुई है.

साल 1981 में आधी दुनिया ग़रीबी रेखा के नीचे थी. और साल 2012 में ये आंकड़ा घटकर 12 फ़ीसद के आस-पास रह गया था.

गोल्डिन और कुटार्ना का कहना है कि विज्ञान ने इतनी तरक़्क़ी कर ली है कि हम बहुत सी चुनौतियों से निपट सकते हैं. हालांकि, इसमें कोई दो राय नहीं कि अभी बहुत कुछ किया जाना बाक़ी है.

हमारी फिज़ूलख़र्ची, क़ुदरत पर दबाव बढ़ाती जा रही है. हर इंसान को पेट भर खाना मुहैया कराना, उसे अच्छी शिक्षा और रोज़गार देना हमारे लिए चुनौती बने हुए हैं. फिर धरती का बढ़ता तापमान, हमारे अस्तित्व के लिए ही ख़तरा बनता जा रहा है.

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कोई एक इंसान धरती को बदल दे, ऐसा तो नहीं. इसके लिए सभी को कोशिश करनी होगी. अगर हम तमाम विशेषज्ञों के साथ मिलकर चर्चा करें, तो बेहतर भविष्य के नए रास्ते निकल सकते हैं.

इसलिए बीबीसी फ्यूचर ने ऐसे लोगों के साथ 15 नवंबर को वर्ल्ड चेंज़िंग आइडियाज़ समिट किया है. ये समिट ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में संपन्न हुआ.

इसमें बीबीसी टीवी प्रेज़ेंटर माइकल मोज़ले, वैज्ञानिक हीथर हेंड्रिक्सन, यूबर के केविन कोर्टी के अलावा रिसर्चर और टीवी प्रेज़ेंटर एमा जॉन्सटन शामिल हुए. साथ ही एस्ट्रोनॉट रॉन गैरान और एंड्र्यू थॉमस भी इस समिट का हिस्सा थे.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

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