छुरी, कांटे और हैंगर की मदद से ऑपरेशन

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एक मरीज़ की जान बचाना डॉक्टर की ज़िम्मेदारी है. आज मेडिकल साइंस ने इतनी तरक़्क़ी कर ली है किसी मरते हुए मरीज़ को भी नई ज़िंदगी दी जा सकती है. लेकिन इसके लिए आला दर्जे की मशीनें और औज़ार चाहिए.

हालांकि बहुत से देशों ने इसपर काफ़ी पैसा ख़र्च किया है. लेकिन हरेक देश के पास इतना पैसा नहीं है. बहुत से गांव-देहातों में भी इलाज की बेहतर सहूलियतें नहीं हैं. अब सवाल ये है जहां ऐसी सुविधाएं नहीं हैं, वहां मरीज़ की जान कैसे बचाई जाए. ऐसे में एक डॉक्टर की सूझबूझ और क़ाबिलियत ही उसकी जान बचा सकती है.

दुनिया में ऐसे बहुत से डॉक्टर हैं जिन्होंने बेहद मुश्किल हालात में भी मरीज़ की जान बचाई है. वो भी तब उनके पास किसी भी तरह की कोई मेडिकल सहूलियत नहीं थी. चलिए आपको आज ऐसे ही कुछ डॉक्टरों के तजुर्बे बताते हैं.

एंगस वॉलेस, ब्रिटेन के एक जाने-माने हड्डियों के डॉक्टर हैं. 1995 में वो एक हवाई सफ़र पर थे. उनके जहाज़ में एक मुसाफिर ऐसी थी जिसका एयरपोर्ट आते वक़्त एक्सिडेंट हो गया था. जहाज़ के उड़ान भरने के साथ ही महिला को हाथ में तेज़ दर्द हुआ. महिला को लगा था कि उसे सिर्फ़ हाथ में चोट लगी है जबकि उसकी पसलियों में भी चोट लगी थी.

उस वक़्त विमान 33,000 फुट की ऊंचाई पर उड़ रहा था. जहाज़ रोक कर महिला को अस्पताल पहुंचाना भी संभव नहीं था. ऐसे में डॉक्टर वॉलेस ने उसका इलाज किया.

डॉक्टर ने देखा कि महिला की पसलियां टूट गई हैं. हादसे ने उसके फेफड़ों के पास की झिल्ली को फाड़ दिया था. जिसकी वजह से सांस लेते वक़्त उसके फेफड़ों से हवा शरीर के अंदर ही निकल रही थी. डॉक्टर वॉलेस ने अपनी सूझबूझ से जहाज के अंदर ही इस महिला का इलाज किया.

वॉलेस ने एक छुरी और कांटे की मदद से इस महिला का सीना चीरा. एक हैंगर सीधा करके उसे अल्कोहल से धोया और ऑपरेशन के लिए इस्तेमाल किया. जहाज़ में जो टेप मौजूद था उससे टांके बंद किए. ये एक कामयाब ऑपरेशन था.

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ऐसी स्थिति कभी भी आ सकती है जब आपके पास इलाज के बुनियादी औज़ार भी ना हों. जिन देशों में गरीबी ज़्यादा है वहां तो अक्सर ही ऐसे हालात से गुज़रना पड़ता है.

केनेथ इसरसन ऐसे डॉक्टर हैं जिन्होंने भूटान, घाना, ज़ाम्बिया, दक्षिण सूडान जैसे देशों में काम किया हैं, मेडिकल सुविधाएं भगवान भरोसे हैं.

उनका कहना है यहां लोगों का इलाज, मौक़े पर मौजूद चीज़ों का इस्तेमाल करते हुए ही किया जाता है. डॉक्टर बेहतर सुविधा के इंतज़ार में मरीज़ को छोड़ नहीं सकता. इसलिए हरेक डॉक्टर को ऐसी स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए.

2010 में वो घाना के एक अस्पताल में काम कर रहे थे, जब एक तीन साल की बच्ची को एक्सिडेंट के बाद इमरजेंसी रूम में लाया गया. इस बच्ची को फौरन सीटी स्कैन की ज़रूरत थी और घाना के अस्पताल में वो संभव नहीं था. बच्ची को सांस लेने में दिक़्क़त हो रही थी. उसकी नाक में एक पाइप डालकर उसे सांस देने की ज़रूरत थी. अस्पताल में इतने छोटे बच्चे के लिए कोई नली मौजूद नहीं थी जो उसकी नाक में लगाई जा सकती थी.

बहरहाल किसी दूसरे औज़ार से पाइप काट कर बच्ची की नाक की माप वाला पाइप बनाया गया, और, बच्चे की दूध की बोतल में छोटा छेद करके उसके ज़रिए ऑक्सीजन दी गई.

डॉक्टर इसरसन कहते हैं कि बहुत मर्तबा उनके पास मरीज़ को देने के लिए दवाइयां भी नहीं होती थीं. ऐसे में वहां घरों में इस्तेमाल होने वाली देसी चीज़ों को मेडिकल सॉल्ट वाली दवाओं के साथ मिलाकर इस्तेमाल किया जाता था.

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जंगी इलाक़ों में तो अक्सर ही इस तरह की परेशानी का सामना होता है. यहां तक कि बिजली भी नसीब नहीं हो पाती और डॉक्टर को मरीज़ की जान बचाने के लिए काम करना ही पड़ता है.

इमैनुअल बमोंगो पेशे से एक दाई हैं. वो पिछले कई सालों से मध्य अफ़्रीकी गणराज्य में काम कर रही हैं. ऐसे इलाक़ो में काम करना बेहद चुनौती भरा होता है. दवाएं और डॉक्टर की कमी होती है और मरीज़ों की संख्या ज़्यादा. गर्भवती औरतों का इलाज करना, ऐसे में सबसे ज़्यादा मुश्किल होता है.

बमोंगो कहती हैं कि बहुत बार उन्होंने अपने मोबाइल की लाइट जलाकर बच्चों की डिलिवरी कराई है. बमोंगो का कहना है ऐसी स्थिति से निपटने के लिए पेशेवर डॉक्टरों का होना तो लाज़मी है ही, साथ ही जो भी डॉक्टर ऐसे इलाक़ों में भेजे जाएं उन्हें पूरी ट्रेनिंग दी जाए.

बहुत ठंडे इलाक़ों में भी डॉक्टरों को हर तरह की तकनीक से वाक़िफ़ होना ज़रूरी है. चिली के दक्षिण में 1,870 मील की ऊंचाई पर अंटार्कटिका के अस्पताल दुनिया में सबसे ज़्यादा दूरी पर स्थित अस्पताल हैं. यहां का तापमान -49 डिग्री सेल्सियस रहता है. इस तापमान में दवाएं तक जम जाती हैं. ऐसी स्थिति से निपटने के सारे गुर एक डॉक्टर को आने चाहिए.

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अंटार्कटिका में डॉक्टर कूवर ने एक पेपर का रोल बनाकर सांस के मरीज़ों को सांस दिलाने की तकनीक सीखी. इसी तरह उन्होंने चाय की पत्तियों का इस्तेमाल करके ज़ख्म ठीक करने का तरीक़ा भी जाना. ये तकनीक यमन में ज़ख्म ठीक करने का घरेलू नुस्खा है.

इसरसन कहते हैं कि सिर्फ़ ठंडे इलाक़ों में ही मुश्किल का सामना नहीं करना पड़ता. बिना संसाधनों का इलाज करने की चुनौती गर्म इलाक़ों भी आ सकती है.

ऐसे बहुत से देश हैं जहां डॉक्टरों को पहनने के लिए दस्ताने तक नसीब नहीं होते. भला हो पश्चिमी देशों का जिन्होंने इन देशों को दान में आधुनिक उपकरण और मशीनें दी हैं. लेकिन मुश्किल ये है जब इन मशीनों में कोई खराबी आती है, तो, उसे ठीक करने वाला कोई नहीं मिलता.

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ऐसे में ये महंगी मशीनें कबाड़ बन जाती हैं. फिर या तो उन्हें स्टोर में डाल दिया जाता है या फर्नीचर की तरह इस्तेमाल किया जाने लगता है. जबकि थोड़ी सी मेहनत के बाद इन मशीनों को ठीक किया जा सकता है. इसरसन कहते हैं कि देसी चीज़ों का इस्तेमाल इलाज के लिए करना आना चाहिए. जैसे उन्होंने अल्ट्रासाउंड के लिए इस्तेमाल होने वाले जेल की जगह चावल के मांड का इस्तेमाल किया था.

सिर्फ़ डॉक्टर ही नहीं, एक आम इंसान को भी इलाज की बुनियादी समझ और देसी तरीक़ों से इलाज करना आना चाहिए. ये जरूरी नहीं कि ज़रूरत पर हमेशा डॉक्टर मिल ही जाए. किसी की भी जान बहुत क़ीमती है. उसे बचाने के तरीक़े सभी को आने चाहिए.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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