'समंदर के ग़ुस्से से बचने के लिए उससे दोस्ती करनी होगी'

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इंसान को समंदर से बेपनाह मोहब्बत है. इसका अंदाज़ा इसी बात से लगा सकते हैं कि दुनिया के सत्तर फ़ीसद बड़े शहर समंदर किनारे बसे हैं.

हम समंदर की लहरों से खेलते हैं. इसके पानी में अठखेलियां करते हैं. समंदर इंसान के वजूद के लिए ज़रूरी है. दुनिया भर की प्रोटीन की ज़रूरत का 16 फ़ीसद हमें समंदर से ही मिलता है. मछलियों, झींगों और दूसरे जानवरों की शक्ल में.

समंदर किनारे बसे शहर अपना दायरा बढ़ाने के लिए समुद्र की सीमा में दख़ल दे रहे हैं. इसका ख़ामियाज़ा समुद्री जीवों को उठाना पड़ रहा है.

चीन, अमरीका, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया से लेकर भारत और संयुक्त अरब अमीरात तक, बहुत से देशों में समुद्र के सीने में कुछ न कुछ बनाने के प्रोजेक्ट चल रहे हैं.

इसके अलावा दुनिया भर में समुद्र में हज़ारों तेल के कुएं खोदे गए हैं. पुल के लिए खंभे बनाए गए हैं. सुरंगें और सड़कें बनाई गई हैं. इन सभी की वजह से समुद्री जीवों की ज़िंदगी में ख़लल पड़ता है.

मिसाल के तौर पर खंभों की वजह से समंदर के बड़े हिस्से पर साया पड़ने लगता है. वहां पर समुद्री शैवाल या काई नहीं पनप पाती. फिर उन पर पलने वाले समुद्री जानवरों पर असर पड़ता है.

इसी तरह समुद्री कुओं को जंग लगने से बचाने के लिए उन पर केमिकल का लेप किया जाता है, जो आस-पास रहने वाले जीवों पर असर डालता है. बहुत जगह समुद्र किनारे लगी लाइट्स की चकाचौंध, कछुओं जैसे जीवों को भरमा देती है, जो चांदनी की मदद से अपना रास्ता तलाशते हैं.

तो क्या ऐसा कोई तरीक़ा नहीं जिससे, हम समंदर की दुनिया में ख़लल डाले बग़ैर हंसी-ख़ुशी साथ रह सकें? ऑस्ट्रेलिया की न्यूसाउथ वेल्स यूनिवर्सिटी की एमा जॉन्सटन कहती हैं कि ऐसा बिल्कुल मुमकिन है.

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वो कहती हैं कि समंदर हमें लुभाता भी है और डराता भी है. इसकी ख़तरनाक लहरें इंसान को फटकार लगाती सी मालूम होती हैं. समुद्री तूफ़ान इंसान को भारी नुक़सान पहुंचाते हैं. समुद्र से मचने वाली तबाही पर बहुत सी फ़िल्में बन चुकी हैं.

एमा कहती हैं कि समुद्र से बचने के लिए इंसान दीवार बना रहा है, खाईयां खोद रहा है. ताकि लहरें इंसानी बस्तियों को नुक़सान न पहुंचा सकें.

जैसे इंडोनेशिया, अपनी राजधानी जकार्ता को बचाने के लिए समुद्र किनारे बड़ी दीवार बनाने की तैयारी में है. इसी तरह चीन के साठ फ़ीसद समुद्री किनारे, इंसान के बनाए हुए हैं. इन सब से समुद्री जीवन में खलल पड़ता है.

एमा कहती हैं कि इससे बचने के लिए इंसान को अपनी सोच बदलनी होगी. उसे समुद्र को जीतने के बजाय उससे दोस्ताना ताल्लुक़ात के बारे में सोचना होगा.

इसके लिए वो सिडनी बंदरगाह के पास बरंगारू प्रोजेक्ट की मिसाल देती हैं. जहां पर समुद्र के किनारे पत्थर लगाए गए हैं, जो समुद्री जानवरों को उनके जैसा माहौल ही देते हैं. और इंसानों की आंखों को भी लुभाते हैं. इसके अलावा, थ्री डी तकनीक की मदद से ऐसी समुद्री टाइल्स बनाई जा रही हैं, जो, समुद्री जीवों को उनके आस-पास के माहौल का एहसास दिलाती हैं.

एमा कहती हैं कि बाक़ी दुनिया को भी ऐसे प्रोजेक्ट से सबक़ लेना चाहिए. पूरी दुनिया में अभी बारह बंदरगाहों के पास ऐसे प्रोजेक्ट्स पर काम चलन रहा है, जहां थ्री डी की मदद से समुद्री टाइल्स बनाकर, समुद्री जीवों के लिए उनके घर जैसा माहौल तैयार किया जा रहा है.

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एमा के मुताबिक़, ऐसा नहीं है कि इंसान ने पहले समुद्री जीवन को फिर से पहले जैसा करने की कोशिश नहीं की. वो बताती हैं कि पहले मूंगे की चट्टानों को फिर से विकसित करने के लिए समुद्र में बेकार टायर फेंके गए थे.

लोगों को लगा था कि इनके इर्द-गिर्द मूंगे की बनावटी चट्टानें विकसित होंगी. मगर ऐसा हुआ नहीं. अब इन टायरों को समुद्र से निकालने में अच्छा ख़ासा पैसा ख़र्च हो रहा है.

एमा कहती हैं कि समुद्र से दोस्ताना रिश्ता, इंसानियत के हक़ में है. वरना जिस तरह से इंसान क़ुदरत को नुक़सान पहुंचा रहा है, वैसे में समुद्र के पलटवार का ख़तरा है. क्योंकि समंदर जो देता है, वो वापस भी ले लेता है.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी पर उपलब्ध है.)

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