यूं धीरे-धीरे चढ़ा था टैटू का नशा

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Image caption दिलचस्प है टैटू का इतिहास

बदन पर टैटू गुदवाने का चलन सदियों पुराना है. ब्रिटेन में उस वक़्त के राजकुमार जॉर्ज पंचम ने जब 1881 में जापान दौरे में अपनी बांह पर नीले और लाल रंग का ड्रैगन गुदवाया तो उसकी बड़ी चर्चा हुई थी. हालांकि ब्रिटिश राजकुमार उस दौर के फैशन को ही अपना रहे थे. उस दौर में चेहरे पर टैटू बनवाने का चलन नहीं था. लेकिन जॉर्ज के टैटू गुदवाने के साथ ही इस आर्ट पर शाही मुहर लग गई थी.

1868 में जापान में मेजी राजशाही की स्थापना के साथ ही पश्चिमी देशों के साथ जापान का कारोबार तेज़ी से बढ़ा था. उसके बाद जापानी कला और चीज़ों की मांग पश्चिमी देशों में तेज़ी से बढ़ने लगी. जिस्म पर टैटू बनाने की कला असल में जापान में पनपी थी. और धीरे धीरे पश्चिमी देशों में भी फैलनी शुरू हो गई.

यूरोप के रईस लोगों ने इस चलन को ख़ूब बढ़ावा दिया. बीसवीं सदी की शुरुआत में तो फ़्रांस और अमरीका में तो टैटू गुदवाना, लोगों के अच्छे सामाजिक दर्जे का प्रतीक बन चुका था. ब्रिटेन की एसेक्स यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर मैट लॉडर कहते हैं कि 1881 में जब प्रिंस जॉर्ज ने टैटू गुदवाया था तो इसकी ख़ूब चर्चा हुई थी.

हालांकि जॉर्ज ने टैटू गुदवाकर ब्रिटेन की सदियों से चली आ रही परंपरा को ही निभाया था. ब्रिटेन में टैटू का चलन जूलियस सीज़र के वक़्त से ही चला आ रहा था. ब्रिटेन के लोगों ने इसे बाक़ी दुनिया में भी सोहरत दिला दी.

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Image caption पहले टैटू के सबूत अब से क़रीब पांच हज़ार साल पहले के मिलते हैं.

पहले टैटू के सबूत अब से क़रीब पांच हज़ार साल पहले के मिलते हैं. यूरोप में ऑस्ट्रिया और इटली के बीच स्थित आल्प्स पर्वतों में मिली एक ममी के बदन पर टैटू के निशान मिले थे. लेकिन यूरोप में ब्रिटेन के लोगों ने ही इस कला को शोहरत दिलाई.

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ईसा से 55 साल पहले जब सीज़र ने ब्रिटेन पर चढ़ाई की थी तो यहां उसने ब्रिटेन के सैनिकों को नीले रंग में रंगा देखा था. सीज़र ने लिखा था कि, अपने इसी हुलिए की वजह से ये सभी जंग के मैदान में ख़ौफ़नाक नजर आते थे. पूरे यूरोप में इन्हें 'प्रेटानी' नाम से जाना जाने लगा. जिसका मतलब होता है रंगा हुआ या टैटू बना हुआ. बाद में इसी प्रेटानी लफ़्ज़ से ब्रिटेन नाम निकला.

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शरीर पर टैटू: नौकरी मिलने में बाधा

जानकारों के बीच काफ़ी दिनों तक बहस छिड़ी रही कि पुराने ब्रिटेन में लोग ख़ुद को रंगते थे या फिर टैटू गुदवाते थे. कुछ का मानना था कि सीज़र ने जो देखा था वो बदन की रंगाई ही थी.

हालांकि कुछ लोगों का मानना था कि ब्रिटेन के लोग टैटू भी गुदवाते थे. असल में इस इलाक़े पर बहुत से बर्बर लोगों का क़ब्ज़ा था जो बचपन से ही अपने शरीर पर जानवरों की तस्वीरें अंकित कराते थे. ईसा के बाद की ग्यारहवीं सदी में जब नॉरमन लोग ब्रिटेन पहुंचे तो उन्होंने भी लोगों में टैटू का चलन देखा था.

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Image caption अंग्रेज़ी में भले ही टैटू शब्द को आज जगह मिली हो, लेकिन, इसकी विरासत बहुत पुरानी है

मॉडर्न टैटू की कहानी तब शुरू हूई जब ब्रिटेन के लोगों ने अमरीकी महाद्वीप में अपनी बस्तियां बसानी शुरू की थीं. 1576 से 1578 में मार्टिन फ़्रोबिशर के जहाज़ी बेड़े जब अमरीकी महाद्वीप के नए इलाक़ो में पहुंचे तो पाया कि वहां के मूल क़बाइली इलाक़ो में टैटू का चलन एक आम बात है. 1577 में फ़्रोबिशर उत्तरी कनाडा और अलास्का के तीन बंधक अपने साथ लेकर आए जिनके शरीर पर बड़े-बड़े और अजीबो ग़रीब टैटू बने हुए थे.

इन बंधकों के टैटू के साथ ही यूरोप और ब्रिटेन में टैटू बनाने का काम एक पेशे में तब्दील हो गया. साथ ही तीर्थयात्रियों में भी टैटू के लिए दीवानगी बढ़ने लगी. पश्चिमी देशों का कोई भी शख़्स अगर यरूशलम से होकर आता था, तो, उसके शरीर पर टैटू ज़रूर बना होता था. और ये चलन 19वीं सदी तक खूब चला. यहां तक कि 1862 में प्रिंस ऑफ वेल्स जो बात में शाह एडवर्ड सप्तम बने, ने भी यरूशलम में अपने शरीर पर टैटू बनवाया था.

अंग्रेज़ी शब्दकोश में भले ही टैटू शब्द को आज जगह मिली हो, लेकिन, इसकी विरासत बहुत पुरानी है. 18वीं शताब्दी में जब ब्रिटिश अन्वेषक कैप्टन कुक प्रशांत महासागर के ताहिती द्वीप पर पहुंचे तो वहां उन्होंने लोगों को गुदने गुदवाते देखा.

वहां के लोग इसे टटाउ कहते थे. ताहिती में लोगों के बीच अपने बदन पर चित्रकारी करने का चलन था. जिसमें छोटी छोटी कीलों से शरीर में बहुत छोटे छोटे छेद किए जाते थे. फिर उसमें रंग भरे जाते थे. ताहिती का टटाउ ही आगे चलकर अंग्रेज़ी में टैटू बन गया.

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Image caption धीरे धीरे टैटू का चलन इतना ज़्यादा बढ़ा कि अख़बारों के ज़रिए लोगों को सलाह दी जाने लगी

धीरे धीरे टैटू का चलन इतना ज़्यादा बढ़ा कि अख़बारों के ज़रिए लोगों को सलाह दी जाने लगी की अपने बच्चों के शरीर पर टैटू गुदवा लें, ताकि अगर कभी कोई बच्चा खो जाए तो उस टैटू के ज़रिए उसे तलाश किया जा सके.

टैटू का चलन इतना ज़्यादा बढ़ा कि बाक़ायदा टैटू पार्लर खुलने लगे और ये अच्छी कमाई वाला बिज़नेस बन गया. ब्रिटेन के कारोबारी सदरलैंड मैक्डोनल्ड ने उन्नीसवीं सदी के आख़िर में ब्रिटेन का पहला टैटू पार्लर खोला था. वो खुद भी एक अच्छे टैटू आर्टिस्ट थे.

उन्होंने बड़ी-बड़ी हस्तियों के शरीर पर भी टैटू बनाए थे जिसमें राजकुमार जॉर्ज, पटियाला के महाराज और डेनमार्क के शाह तक शामिल हैं. मैक्डोनल्ड के टैटू पार्लर की शोहरत इतनी बढ़ी कि पोलैंड, फ़्रांस, जर्मनी और न्यूज़ीलैंड के अख़बारों में इसका ज़िक्र होने लगा. टैटू के दीवानों की भारी मांग को देखते हुए टैटू बनाने के विषय भी बदलने लगे. मैक्डोनाल्ड ने ही सबसे पहले 1890 में ऑटोमेटिक टैटू मशीन बनाई.

ब्रिटिश समाज के रईसों के बीच टैटू के लिए पागलपन इस क़दर बढ़ा कि पूरे अटलांटिक में फैल गया. 1897 में न्यूयॉर्क हेरल्ड ने लिखा कि टैटू का फ़ैशन लंदन के रास्ते न्यूयॉर्क पहुंचा है. अमरीका के मध्यम वर्ग के लोगों ने भी ब्रिटेन के रईसों का शौक़ पालना शुरू कर दिया था. लेकिन लोगों के इस शौक़ और जुनून ने न्यूयॉर्क में टैटू बनाने वालों को रातों-रात माला-माल कर दिया. सर्वे बताते हैं कि ब्रिटेन में हर तीसरा नौजवान अपने शरीर पर टैटू गुदवाता है. आज हम जानते हैं कि ये शौक़ नया नहीं है बल्कि इसकी जड़ें सीज़र के वक़्त से जुड़ी हैं.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्ल्कि करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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