पुरानी बातों को याद करके ख़ुशी क्यों मिलती है?

इमेज कॉपीरइट iStock

इंसान और जानवर दोनों सांस लेते हैं, खाना खाते हैं, दोनों को भूख लगती है. लेकिन इंसान और जानवर की भूख में फ़र्क़ है. जानवर को सिर्फ़ पेट की भूख लगती है लेकिन इंसान को दिमाग़ की भूख भी लगती है. इंसान में सोचने समझने की ख़ूबी है जो जानवर में नहीं हैं.

इंसान अपनी इसी ख़ूबी की वजह से सोच समझ सकता है, वो दूरअंदेशी होता है. अपने ख़यालों की दुनिया में उस जगह तक चला जाता है जहां वो शायद ख़ुद कभी ना पहुंच पाए. या जो काम अभी हुआ ही नहीं, वो उसके बारे में भी सोच सकता है. कहने का मतलब ये है कि इंसान सफ़र करे या ना करे लेकिन उसका दिमाग़ सफ़र करता रहता है.

दुनिया बदलने वाले वो 11 आइडिया, पोस्टकार्ड पर

'समंदर के ग़ुस्से से बचने के लिए उससे दोस्ती करनी होगी'

फ़र्ज़ कीजिए गर्मी का मौसम अभी आया भी नहीं है और आपके दिमाग़ ने पहले ही सोचना शुरू कर दिया कि कैसे आप गर्मी में पसीनों से बेहाल हैं. धूप से बचने के लिए तरह तरह के उपाय कर रहे हैं. या मान लीजिए कल आपको किसी पार्टी में जाना है और आपके ज़हन ने पहले ही वहां की तस्वीर बनानी शुरू कर दी. मतलब आपके ज़हन ने सफ़र शुरू कर दिया और वो उस जगह तक आपसे पहले ही पहुंच गया.

इमेज कॉपीरइट iStock

मनोवैज्ञानिक एंडेल टलविंग इस दिमाग़ी सफ़र को ऑटोनोटिक चेतना का नाम देते हैं. इंसान के दिमाग़ का एक हिस्सा किसी घटना के होने से पहले और घटना हो जाने के बाद भी उस जगह पहुंच कर उसका एहसास कर सकता है.

ईश्वर ने इंसान को वो ख़ूबी दी है कि बीती हुई घटनाओं और यादों को एक जुट करके भविष्य की संभावनाओं का बोध भी करा सकता है. अपने तजुर्बे की बुनियाद पर इंसान आने वाले कल की प्लानिंग पहले ही कर सकता है. इंसान की यही ख़ूबी से दूसरे जानवरों से अलग करती है. जबकि जानवर इस नेमत से महरूम हैं.

इंसान में भी सोचने समझने की क़ाबिलियत एक उम्र के बाद ही आती है. इंसान के छोटे बच्चे भी एक उम्र तक ना तो अपनी पुरानी बातें याद रख पाते हैं और ना ही मुस्तक़बिल के लिए कोई योजना बना पाते हैं. वो जिस पल में होते हैं बस उसी पल को जीते हैं. 3 से 4 साल की उम्र में बहुत कम बच्चे ऐसे होंगे जो ये भी बता पाएं की वो कल क्या करने वाले हैं.

सि़डनी की वैज्ञानिक हेलेन क्रिस्टेनसेन का कहना है कि पुरानी बातें याद करके खुश होना, आने वाले कल के लिए पहले से ही सोच लेना इंसान को खुशी देता है. लेकिन कई मर्तबा ज़िंदगी की बुरी यादें इंसान को उदास भी कर जाती हैं. लेकिन अब घबराने की बात नहीं है क्योंकि आपकी इस भावना को नियंत्रित करने के लिए नई तकनीक आ गई है.

इमेज कॉपीरइट iStock

अब से 15 साल पहले प्रोफ़ेसर हेलेन और उनकी टीम ने एक ऑन लाइन 'मूड जिम' खोला था. जिसमें कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी का कोर्स कराया गया था. वो अब इसी तरह की एक नई एप तैयार कर रही हैं. और सोशल मीडिया के ज़रिए ऐसे लोगों को तलाश कर रही है जो अपनी दिक़्क़त उनसे बांट सकें.

इस खास एप के लिए अलग तरह के विषय और भाषा भी तैयार की जा रही है जिससे ये समझा जा सके कि परेशानी क्या और कहां है. जब परेशानी का पता चल जाएगा तो फिर विज्ञापन और कुछ शब्दों के माध्यम से ऑन लाइन ही उसे दूसरों तक पहुंचाया जाएगा.

इमेज कॉपीरइट iStock

प्रोफ़ेसर हेलेन का कहना है कि ये सुनने में थोड़ा अजीब ज़रूर लगता है लेकिन उनके इस एप के ज़रिए बहुत से लोगों को आत्महत्या करने से रोकने में मदद मिली है. जो लोग डिप्रेशन में चले गए थे, उन्हें उस उदासी से बाहर निकालने में काफ़ी मदद मिली है.

ऑस्ट्रेलिया के ही लेखर प्रोफ़ेसर सडनडोर्फ़ का कहना है कि फ़िक्र और निराशा में अंतर है. जब हमें निराशा होती है तो हमारे सामने जीवन के वो अनुभव होते हैं जिनकी वजह से हमें कामयाबी नहीं मिली होती. जिसकी वजह से हमारा दिमाग़ हमें मुस्तक़बिल के लिए भी नकारात्मकता ही दिखाता है. ऐसे में ज़रूरत होती है काउंसलिंग की जो हमें उस उदासी से निकाल सके.

इमेज कॉपीरइट iStock

फ़िक्र नकारात्मक और सकारात्मक दोनों ही तरह की होती है. बहुत बार हमें बेवजह की फ़िक्र होती है. लेकिन कई बार हमारी फ़िक्र हम से बहुत से अच्छे काम करा लेती है. जब किसी बात की फ़िक्र होती है तो दिमाग़ उसी परेशानी की तरफ़ केंद्रित होकर सोचता है. लेकिन अगर हरेक बात की फ़िक्र होने लगे तो फिर इसमें मनोवैज्ञानिक की ज़रूरत पड़ती है.

अब तो इस परेशानी के हल के लिए बहुत से एप तैयार हैं. अगर आपको भी ऐसी ही कोई परेशानी है तो नेट सर्फ़ कीजिए और ढूंढ़ लीजिए अपनी परेशानी का हल.

अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. यह बीबीसी पर उपलब्ध है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)