कभी झांका है स्मार्टफ़ोन से चिपके लोगों की दुनिया में

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स्मार्टफ़ोन ने हमारी दुनिया और ज़िंदगी दोनों को बदल दिया है. एक छोटे से फ़ोन में सारी दुनिया सिमटी हुई है.

हर कोई सिर झुकाए अपने फ़ोन के साथ मसरूफ़ रहता है. स्मार्टफ़ोन ने अपने साथ एक नई भाषा को भी जन्म दे दिया है. और ये भाषा ऐसी है जिसके बिना हमें अपना वजूद अधूरा लगता है.

स्मार्ट फ़ोन की दुनिया में इस्तेमाल होने वाले ये शब्द हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बनने लगते हैं. ऐसे लोग जो हर वक़्त अपने फ़ोन पर सिर झुकाए मसरूफ़ रहते हैं, उनके लिए कुछ सालों पहले चीनी भाषा में एक मुहावरे का चलन ख़ूब बढ़ा.

'दी-ताउ-ज़ू' जिसका अंग्रेज़ी में मतलब है 'bowed head tribes,' और हिंदी में इसका मतलब है 'सिर झुकाए हुए क़बीले'.

हम सभी जो स्मार्टफ़ोन का इस्तेमाल करते हैं, वो इसी क़बीले का हिस्सा हैं. हम अपने आस-पास देखते हैं, हर कोई सिर झुकाए अपने फ़ोन पर लगा हुआ है. अगर आप सिर झुकाए क़बीले के सदस्य हैं, तो, यक़ीनन फिर आप 'मू-ज़ी-ज़ु' क़बीले के भी मेम्बर हैं.

इसका अंग्रेज़ी में मतलब है- 'Thumb Tribe.' ये शब्द जापान में सबसे पहले इस्तेमाल किया गया..जापान में बच्चे बहुत तेज़ी से मोबाइल पर मैसेज टाइप कर लेते थे इसीलिए ये शब्द चलन में आया.

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स्मार्टफ़ोन की दुनिया में इस्तेमाल होने वाली भाषा के साथ ही एक बहस और छिड़ गई है. अच्छे और बुरे बर्ताव की बहस. बहुत मर्तबा अगर किसी शख़्स को किसी दूसरे से कन्नी काटनी होती है तो वो उसे देखकर नज़र अंदाज़ करने लगता है और बेवजह ही अपने फ़ोन पर सिर झुकाकर कर ख़ुद को मसरूफ़ साबित करने लगता है.

ऐसे लोगों के लिए 'फाबिंग' शब्द का इस्तेमाल होता है. यानि जानबूझ कर सामने वाले को नज़रअंदाज़ करना. ये अच्छे बर्ताव में शामिल नहीं होता. इसीलिए इस बर्ताव के ख़िलाफ़ आवाज़ भी उठाई जा रही है.

इसी तरह एक और शब्द स्मार्टफ़ोन इस्तेमाल करने वालों के लिए गढ़ा गया है, 'स्मोम्बी' ये शब्द ऐसे लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाता है जो चलते फिरते आस-पास की दुनिया से बेख़र हर वक़्त सिर झुकाए फ़ोन पर लगे रहते हैं. स्मोम्बी भी 'स्मार्टफ़ोन ज़ोम्बी' का छोटा रूप है.

पोकेमोन गो क्रेज़ के आने के बाद तो नौजवान पीढ़ी को इसकी लत पागलपन की हद तक लग गई थी. जिसे जर्मनी के बुज़ुर्गों ने अपनी नौजवान नस्ल के लिए ख़राब माना था. जर्मनी दुनिया का पहला ऐसा देश बना जिसने फुटपाथ पर भी ऐसे लोगों को रोकने के लिए ख़ास तरह की ट्रैफ़िक लाइट लगाई गईं.

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हालांकि इसमें नया कुछ भी नहीं था. जब भी कोई नई तकनीक आती है, तो, कुछ लोग उसे पसंद करते हैं, कुछ ना पसंद करते हैं. उन्नीसवीं सदी के आख़िर में जब अमरीका में जब टेलीफ़ोन आया था तब भी इसी तरह का रद्देअमल देखने को मिला था.

लोगों का इस तरह फ़ोन पर लगे रहना हो सकता है अभी सबको अजीब लगे लेकिन कुछ साल बाद लोगों को इसकी आदत पड़ जाएगी क्योंकि उस वक़्त तक वो सभी की ज़िंदगी का हिस्सा बन चुका होगा.

हालांकि कुछ लोग इस बात को लेकर फ़िक्रमंद हैं कि संवाद के नए उपकरण के इस्तेमाल से लोगों को ना सिर्फ़ लत लग रही है, बल्कि नए-नए एप के ज़रिए वो बेकार की बातें करने में अपना वक़्त ज़ाए करते रहते हैं. ऐसे लोगों के लिए एक और नया शब्द निकाल लिया गया- 'मैनिया' यानि किसी चीज़ के लिए पागलपन की हद तक दीवानगी.

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1897 में शिकागो के 'वेस्टर्न इलेक्ट्रिशियन' जरनल में एक लेख छपा था. जिसमें इस बात पर ज़ोर दिया गया था कि लोग फ़ोन पर किस तरह से बेफ़िक्र बातें करते रहते हैं. उन्हें इस बात का अंदाज़ा ही नहीं होता कि उनके पास करने के लिए कितने काम बाक़ी हैं. उन्हें ना दिन का एहसास होता है और ना रात का.

इस पूरे मामले में सबसे ख़राब बात तो ये है कि फ़ोन पर बात करने वाले को इस बात का एहसास ही नहीं हो पाता कि वो ख़ुद अपना कितना नुक़सान कर रहा है. लेकिन अब फ़ेसबुक का ज़माना है. आपको किसी बात के लिए घंटों अपनी दलीलें नहीं देनी हैं. बल्कि एक लाइक से ही आपका काम बन जाता है.

तकनीक रात दिन बदल रही है. और बदलती रहेगी. शायद आने वाले समय में ऐसे लेंस बना लिए जाएं जिन्हें पहनने के बाद आपको अपना सिर झुकाने की ज़रूरत नहीं रहेगी. और ना ही कोई ये जान पाएगा कि आप किसी से नज़र बचा रहे हैं.

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आपको फिर ये बताने की ज़रूरत नहीं होगी कि आप बिज़ी हैं बल्कि आपको ये बताना पड़ेगा कि आप फ़्री कब हैं. आप कब बात कर सकते हैं.

अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. यह बीबीसी पर उपलब्ध है.

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