चरमपंथी संगठन और ड्रोन का इस्तेमाल

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'ड्रोन' ये नाम तो आप ने सुना ही होगा. बहुत मुमकिन है देखा भी हो. ये हवा में उड़ने वाला एक ख़ास तरह की तकनीक से लैस खिलौने जैसा जहाज़ होता है, जिसमें कैमरा लगा होता है. जब ड्रोन को बनाया गया था, उस वक़्त कुछ ही लोगों तक इसकी पहुंच थी. लेकिन आज ये एक आम मशीन है.

शुरुआती दौर में कैमरे वाले ये छोटे ड्रोन चंद हज़ार डॉलर में मिल जाते थे. लेकिन साल 2010 तक अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में इनकी संख्या कई लाख डॉलर तक पहुंच गई.

आज ड्रोन का इस्तेमाल कई तरह से हो रहा है. कई देश इसका इस्तेमाल निगरानी के लिए और दुश्मनों के ठिकानों को निशाना बनाने के लिए करते हैं. मसलन, इराक़ में इनका इस्तेमाल लड़ाई के लिए भी किया जाने लगा है.

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2014 में चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट ने इसके ज़रिए प्रोपेगैंडा वीडियो तैयार किए और फिर ये स्काउट बन गए. जिस वक़्त सीरियन मिलिट्री बेस पर आत्मघाती हमला किया गया था उसके कुछ दिन बाद ही एक वीडियो जारी किया गया .

इस वीडियो में इस मिलिट्री बेस के उन कमज़ोर इलाक़ों को दिखाया गया था, जिन्हें निशाना बनाकर हमला किया गया था. जानकारों का कहना है कि ये ड्रोन सर्विलांस मिशन के तहत भेजे गए थे, तभी ये वीडियो बनाए गए होंगे.

ड्रोन के ज़रिए फ़िल्मों और विज्ञापनों की शूटिंग हो रही है. वहीं अमेज़न जैसी कंपनियां ड्रोन के ज़रिए सामान की डिलिवरी भी करना शुरू कर चुकी हैं.

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लेकिन ख़बर ये नहीं, ख़बर ये है कि कभी ड्रोन के निशाने पर रहे चरमपंथी और उनके संगठन भी अब ड्रोन का इस्तेमाल करने लगे हैं.

अमरीकी सेना के मुताबिक़ अब तो चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट भी ड्रोन का इस्तेमाल जंग में कर रहा है. इस्लामिक स्टेट इराक़ के मोसुल शहर की लड़ाई में ड्रोन का इस्तेमाल कर रहा है.

इन ड्रोन के ज़रिए वो ये पता लगाते हैं कि इराक़ की सेना कहां मोर्टार दाग़ने वाली है. उसके मुताबिक़ ही इस्लामिक स्टेट के लड़ाके भी अपना टारगेट तय करते हैं.

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आज सिर्फ़ इस्लामिक स्टेट नहीं, बल्कि सीरिया और इराक़ के लड़ाकों के बहुत से समूह ख़ूब धड़ल्ले से ड्रोन का इस्तेमाल कर रहे हैं. इसमें लेबनान का संगठन हिज़बुल्लाह भी शामिल है.

यहां तक कि इराक़ी फ़ौज ने भी इन ड्रोन का इस्तेमाल मोसुल की लड़ाई में किया. इस लड़ाई में ड्रोन की मदद से ही कार में बम लगाए जाते थे.

ड्रोन जो पहले जासूसी के काम आते थे, अब दुश्मनों के लिए यमराज भी बन चुके हैं. इस्लामिक स्टेट सस्ते ड्रोन में जानलेवा विस्फ़ोटक बांध कर अपना निशाना साधने लगे हैं. हालांकि इस तरह के हमले से बड़ी संख्या में लोग हताहत नहीं होते.

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लेकिन, इस तरह के हथियार आतंक और दहशत फैलाने की एक बड़ी वजह बनते जा रहे हैं. देश की फ़ौजों पर मुल्क की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी होती है. ऐसे में आसानी से मिलने वाली ऐसी किलिंग मशीनों के मुक़ाबले उन्हें खुद को ज़्यादा बेहतर तरीक़े से लैस करना होगा.

सेना में इस्तेमाल होने वाले ड्रोन आम ड्रोन से अलग होते हैं. तकनीक के लिहाज़ से वो ज़्यादा बेहतर होते हैं और उनकी क़ीमत भी ज़्यादा होती है. ब्रिटिश फ़ौज में इस्तेमाल होने वाले ड्रोन ब्लैक हॉर्नेट की क़ीमत क़रीब एक लाख डालर है.

वहीं आम लोगों के इस्तेमाल वाले ऐसे ड्रोन जिनमें अच्छी क़िस्म का कैमरा लगा होता है, जो क़रीब डेढ़ घंटे तक उड़ान भर सकते हैं, उनकी क़ीमत महज़ एक हज़ार डॉलर होती है.

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किसी हथियार के साथ ड्रोन को फिट करना आसान काम नहीं है. इसके लिए खास तकनीक का होना लाज़मी है. ड्रोन बनाने के शौक़ीन लोग सस्ती तकनीक का इस्तेमाल करते हुए ऐसी किट बना रहे हैं, जिसके ज़रिए सौ ग्राम के पाउडर वाले बम लगाए जा सकते हैं.

हिज़बुल्लाह ने हाल ही में एक वीडियो जारी किया है जिसमें इसी तरह के बम को ड्रोन के ज़रिए फैंकते हुए दिखाया गया है. वक़्त के साथ साथ ड्रोन भी तकनीकी रूप से बेहतर होते जा रहे हैं. अब ये ड्रोन अपने रास्ते में आने वाली अड़चनों को ख़ुद ही ख़त्म कर लेते हैं.

मसलन अगर किसी ड्रोन के रास्ते में कोई पेड़ आ रहा है तो वो खुद को बचाते हुए अपना रास्ता ख़ुद बना लेगा. इन्हें चलाने के लिए किसी शख्स की ज़रूरत नहीं होती बल्कि सैटेलाइट की कमांड से ही चलने लगता है.

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ड्रोन का इस्तेमाल चूंकि ख़तरनाक तरीक़े से किया जाने लगा है, लिहाज़ा इसे मार गिराने की तकनीक से वाक़िफ़ होना भी ज़रूरी है. हालांकि इसे मार गिराना आसान नहीं होता है इसलिए ऐसी तकनीक तैयार की जा रही हैं जिससे ये मुश्किल काम आसान हो जाए.

हाल के दिनों में अमरीकी सेना ने वीडियो जारी किया था जिसमें सैनिक एक उपकरण का इस्तेमाल करते हुए दिखाए गए थे. ये उपकरण एक राइफ़ल की तरह था और उस पर टीवी के एंटीना जैसी चीज़ लगी थी.

इसका काम था ड्रोन के रास्ते और उसके जीपीएस सिस्टम को जाम करना. इस उपकरण की मदद से ड्रोन को नीचे उतारा जा रहा था. इसी तरह के दूसरे विकल्प भी तलाशे जा रहे हैं. रबर बॉल और नेट का इस्तेमाल भी किया जा रहा है. साथ ही ड्रोन पकड़ने के लिए परिंदों को भी ट्रेनिंग दी जा रही है.

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हालांकि ड्रोन बनाने वालों ने इस बात का ख़्याल रखा है कि इसका ग़लत इस्तेमाल ना हो सके. आम लोगों के इस्तेमाल वाले ड्रोन ऐसे इलाक़ों में दाख़िल नहीं हो सकते, जहां इनकी मनाही है. जैसे हवाई अड्डे. इसके लिए उन्हों ने जियोफेंसिंग नाम की तकनीक बनाई है.

लेकिन ये तकनीक पूरी तरह से सुरक्षित नहीं है. कोई भी इस सुरक्षा घेरे को भेद सकता है. इसी साल फरवरी महीने में एक रिसर्च ग्रुप ने इराक़ के रमादी में इस्लामिक स्टेट की एक वर्कशॉप का जायज़ा लिया था. वहां बड़ी ही आसानी से ड्रोन बनाए जा रहे थे.

इनके पास जो भी सामान मौजूद था उसका इस्तेमाल करके ये लोग ड्रोन बना रहे थे. वैसे ड्रोन बनाने के लिए बुनियादी साज़ो सामान इन्हें कोरिया, जापान और तुर्की से मिल जाता है. इसी वर्कशॉप में ज़मीन से आसमान तक मार करने वाली मिसाइल भी मिली थी.

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माना जा रहा है कि इस्लामिक स्टेट इसके वार हेड को ड्रोन में लगाने की फ़िराक़ में थे. चिंता इस बात की भी है कि हिज़बुल्लाह इस ड्रोन का इस्तेमाल करके हेलिकॉप्टर पर हमला करने की तैयारी में हैं.

अगर मिसाइल से हमला किया जाता है तो पता चल जाता है कि कितनी देर में मिसाइल हमला कर सकती है. लेकिन अगर ड्रोन से हमला होता है तो उसे रोक पाना आसान नहीं होता. इसलिए ड्रोन के इस खतरे से बचने के लिए ज़्यादा एडवांस तकनीक की ज़रूरत है.

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