19 तरह की मुस्कुराहटें, पर सब ख़ुशी वाली नहीं...

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इंसान का चेहरा उसके दिल का आईना होता है. जो दिल में है वो चेहरे पर नुमाया हुए बग़ैर नहीं रह पाता.

और अगर उस चेहरे पर मुस्कुराहट आ जाए तो कहने ही क्या. किसी ने ख़ूब कहा है 'मुस्कुराहट चेहरे का नूर है.'

कभी-कभी इंसान का दर्द भी मुस्कुराहट बन कर चेहरे पर आ जाता है, तो कभी यही मुस्कुराहट किसी की खुशी की वजह बन जाती है. एक बच्चे की मुस्कुराहट हमारी सारी चिंताओं को कुछ पलों के लिए दूर कर देती है.

और एक आशिक़ के लिए उसके महबूब की मुस्कान क्या होती है इसका एसहास तो सिर्फ उन दोनों को ही हो सकता है. जैसे इस शेर को ही लीजिए...

वहां सलाम को आती हैं नंगे पांव बहार

खिले थे फूल जहां तेरे मुस्कुराने से

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मुस्कुराहट में धोखा

मुस्कुराहट की अहमियत तो हमने आपको बता दी. चलिए अब आपको मुस्कान की किस्में भी बता दें. इसकी 19 क़िस्में हैं. हर मुस्कुराहट का अपना अलग अंदाज़ और मतलब होता है. मुस्कुराहट में छिपे इन मायनों को भी समझना बहुत ज़रूरी है. क्योंकि कई बार हम मुस्कुराहट में धोखा भी खा जाते हैं.

अक्सर मुस्कान के मानी ये निकाले जाते हैं कि सामने वाला ख़ुशदिल है. आपकी बात उसे अच्छी लगी है, या वो मौजूदा मंज़र में अच्छा महसूस करता है. पर हक़ीक़त ये है कि अक्सर तबस्सुम एक पर्दा होती है, कभी दर्द, कभी ग़ुस्से और खीझ या कभी बेचैनी को छुपाने के लिए.

मुस्कान पर धोखा न खा जाएं आप, इसके लिए ज़रूरी है कि इसकी हर क़िस्म को अच्छे से समझ लें. 19 क़िस्म की मुस्कुराहटों में सिर्फ छह ऐसी हैं, जो इंसान के अच्छे वक़्त में उसके चेहरे पर नुमायां होती हैं. उसकी खुशी को ज़ाहिर करती हैं.

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'डचेन मुस्कान'

बाक़ी तेरह तरह की मुस्कुराहटें या तो दर्द, डर या शर्मिंदगी की वजह से आती हैं या बेचैनी की कैफ़ियत में चेहरे पर नज़र आती हैं. चलिए सबसे पहले बात करके हैं 'डचेन मुस्कान' की. उन्नीसवीं सदी में फ्रांस के न्यूरोलॉजिस्ट डचेन द बोलोन ने मुस्कान पर रिसर्च की थी.

अपनी रिसर्च में उन्होंने क़रीब 60 प्रकार के चेहरे के भावों पर अध्ययन किया. और पाया कि हर तरह का भाव पैदा करने में चेहरे की अलग अलग मांसपेशियां अपना काम करती हैं. जिन लोगों पर वो तजुर्बा कर रहे थे, उन्हीं में से एक ऐसा शख्स था जिसके दांत नहीं थे और चेहरा चौड़ा था.

जिसकी वजह से वो शख्स बेवक़ूफ़ी की हद तक मुस्कुराता हुआ महसूस होता था. इस शख्स के चेहरे की बनावट के आधार पर ही डॉक्टर डचेन ने इसे 'डचेन मुस्कान' का नाम दिया. इस तरह की मुस्कुराहट में आंख के आसपास और गाल की मांसपेशियां अहम रोल निभाती हैं और आंखें थोड़ी सी बंद हो जाती हैं.

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चिम्पैंजियों की मुस्कुराहट

लेकिन इस तरह के चेहरे की बनावट वाले लोग सारी दुनिया में ऐसे ही मुस्कुराते होंगे ये ज़रूरी नहीं है. हमारे चेहरे के भाव सारी दुनिया में एक जैसे होते हैं या फिर अलग अलग संस्कृति और देश के मुताबिक़ एक दूसरे से जुदा होते हैं? ये ऐसा सवाल है जिसकी खोज डार्विन से लेकर मनोवैज्ञानिक सिग्मंड फ्रायड तक ने की है.

कभी कभी हम डर में भी मुस्कुराते हैं. अब आप कहेंगे वो कैसे? वैज्ञानिकों ने इसके लिए चिम्पैंजियों की मुस्कुराहट पर तजुर्बे किए. इसी तरह बोनोबो की मुस्कान पर भी कुछ वैज्ञानिकों ने लंबी-चौड़ी पड़ताल की. उनका कहना है कि जब बोनोबो डरे हुए होते हैं, तो, वो अपना जबड़ा मज़बूती से जकड़ लेते हैं.

उनके होंठ इस तरह से फैल जाते हैं कि उनके मसूड़े दिखाई देने लगते हैं. अगर कभी इंसान इस तरह से मुस्कुराता है तो लगता है वो खुश है. लेकिन चिम्पैंजियों और बोनोबो में ये मुस्कान डर का प्रतीक है. जब वो अपने से ज़्यादा ताक़तवर के आगे ख़ुद को समर्पित करते हैं, तब भी ऐसी मुस्कान उनके चेहरे पर होती है.

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बनावटी मुस्कान

हालांकि आम राय यही है कि इंसान डर के माहौल में मुस्कुराता नहीं है. फिर भी कई बार ऐसी मुस्कान इंसान के चेहरे पर दिख जाती है. डार्विन का मानना था कि चेहरे पर किसी तरह का भाव आना स्वाभाविक है. ये इंसान की उत्पत्ति के साथ ही आया है. जैसे जब हम हैरान होते हैं तो हमारी भौंहें अपने आप ही ऊपर चढ़ जाती हैं.

और आंखे फैल जाती हैं. अपनी बात को साबित करने के लिए डार्विन ने डचेन की खींची गई 20 अलग-अलग तस्वीरों को एक गांव के लोगों को दिखाया. इन लोगों की राय के बाद ही डार्विन इस नतीजे पर पहुंचे के कुछ भाव सारी दुनिया में एक जैसे ही होते हैं. बहुत बार हमारे चेहरे पर एक दुखभरी सी मुस्कान आती है.

ऐसा अक्सर तब होता है जब हम दुखी और लाचार होते हैं. यानी ऐसी स्थिति हम चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते. ये मुस्कान बड़ी बनावटी सी होती है. दशकों तक रिसर्चर यही समझते रहे कि ये मुस्कान स्वाभाविक नहीं होती. इसे इंसान हालात के मुताबिक़ सीख लेता है. लेकिन 2009 में हुई रिसर्च में पता चला कि ये तो इंसान के डीएनए में शामिल है.

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आंखों से मुस्कुराना

सत्रहवीं सदी तक यूरोप में खिलखिलाकर हंसना तहजीब के ख़िलाफ़ माना जाता था. रूसी भाषा में तो एक मुहावरा भी है कि बेवजह मुस्कुराना बेवक़ूफ़ी की अलामत है. क़रीब एक सदी बाद फ़्रांस में एक कॉफ़ी हाउस खुला. यहां खिलखिलाकर हंसने और अपने जज़्बात का खुल कर इज़हार करने की आज़ादी थी.

तहज़ीब या सलीक़े के मैदान में आया ये इंक़लाबी बदलाव था. चेहरे पर हल्की सी मुस्कान को अंग्रेजी में 'डेम्पेंड स्माइल' कहा जाता है. ये ऐसी मुस्कान होती है जिसमें हम अपनी हंसी को अंदर ही अंदर रोकने की कोशिश करते हैं. गाल थोड़े से उठ जाते हैं लेकिन होंठ सख्ती से बंद होते हैं.

जैसे हम ये कहने की कोशिश कर रहे हों कि हम नहीं हंसेंगे. जापान में तो आंखों से मुस्कुराने को कहा जाता है. लिहाज़ा कहा जा सकता है कि मुस्कुराने की ख्वाहिश सारी दुनिया में एक जैसी है. लेकिन अलग अलग संस्कृतियों में इसे अलग अलग पैमानों पर रखा गया है. इस बात में कोई शक नहीं कि मुस्कान संवाद का एक ज़रिया भी है.

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Image caption रूसी भाषा में तो एक मुहावरा है कि बेवजह मुस्कुराना बेवक़ूफ़ी की अलामत है

'कंटेंप्ट स्माइल'

क्वालिफायर मुस्कान बड़ी अजीब तरह की मुस्कान होती है इसमें अक्सर बेदिल मुस्कान के साथ सिर हल्का सा झुक जाता है. मुस्कान की जितनी क़िस्में हैं उनमें ये शायद सबसे ज़्यादा चिड़चिड़ापन दिलाने वाली मुस्कान है. एक मुस्कान सामने वाले का अपमान करने वाली होती है. इसे अंग्रेज़ी में 'कंटेंप्ट स्माइल' कहा जाता है.

पूर्वी एशियाई संस्कृति में नकारात्मक भाव अक्सर मुस्कान के पीछे छिपाने का चलन है. इसे सामाजिक सद्भाव के लिए ज़रूरी माना जाता है. जबकि इंडोनेशिया में खुलेआम गुस्से का इज़हार करना बुरा माना जाता है. इसीलिए वहां के लोग अक्सर अपने गुस्से को मुस्कान के पीछे छिपाए घूमते हैं.

एक मुस्कान ऐसी भी होती है जो शरारतभरी होती है. इसमें इंसान मुस्कुराता भी है लेकिन कोशिश करता है कि उसके दिल की कैफ़ियत किसी को पता ना चले. इसीलिए वो सबके सामने अपनी हंसी क़ाबू में करता है. लेकिन जब अकेला होता है तो शरारत पर दिल खोलकर हंसता है.

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मोनालिसा की मुस्कान

हरेक मुस्कान को पढ़ना आसान नहीं. लेकिन झूठी मुस्कान को बहुत आसानी से पढ़ा जा सकता है. कहते हैं जब हम दिल से मुस्कुराते हैं तो हमारी आंखें भी मुस्कुराती हैं. लेकिन जब हम झूठ मूठ का मुस्कुराते हैं, तो, आंखें हमारा साथ नहीं देती.

हम जिन लोगों से हर रोज़ मिलते हैं, उनके चेहरे का आकार और हावभाव हमारे ज़हन में एक गहरी छाप छोड़ देते हैं. जब उस चेहरे पर झूठी मुस्कान तारी होती है तो हम उसे भांप लेते हैं. मुस्कान की बात हो और मोनालिसा का ज़िक्र ना हो, ऐसा हो नहीं सकता.

लिओनार्दो दा विंची के इस मास्टरपीस में ऐसी रहस्यमयी मुस्कान है जिसकी व्याख्या हरेक शख्स अपने मुताबिक़ करता है. जिस तरफ़ से भी इसे देखो तो लगता है जैसे आपको ही देख कर मुस्कुरा रही है. लेकिन आज तक कोई इस मुस्कान का सही राज़ नहीं पता लगा सका है.

बहरहाल मुस्कुराना जिंदा दिली की अलामत है. लिहाज़ा जब भी मुस्कुराहट आए तो उसे रोकिए नहीं. बल्कि दिल खोलकर हंसिए मुस्कुराइए.

(बीबीसी फ़्यूचर पर अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)

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