वो कॉमेट विमान जिसने हवाई सफर की तस्वीर बदल दी

  • 20 अप्रैल 2017
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आज हवाई सफर बेहद आसान हो गया है. ज़मीन से मीलों ऊंचाई पर हवा से बातें करते हुए हम अपनी मंज़िल तक पहुंच जाते हैं. इस सफ़र में हमें आराम की हर वो चीज़ मुहैया कराई जाती है जिसका इस्तेमाल हम अपने घर में भी करते हैं.

लेकिन हवाई सफर का जो रूप-रंग हम आज देखते हैं, वो हमेशा से ऐसा नहीं था. इस सफर को ऐसा बनाने में ब्रिटेन के एक विमान का बड़ा रोल रहा. जिसने आरामदेह हवाई सफर की बुनियाद रखी थी.

अफ़सोस की बात बस इतनी है, कि ये जहाज़ ख़ुद कामयाबी का लंबा सफ़र नहीं तय कर सका था.

चलिए आज उसी नाकाम जहाज़ की दास्तां सुनाते हैं.

इस विमान का नाम था, हैविलैंड कॉमेट. चूंकि ये हैविलैंड स्थित फैक्ट्री में बना था, इसीलिए इसे ये नाम दिया गया था. हालांकि इसे कॉमेट कहकर ही ज़्यादा बुलाया जाता था.

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हैविलैंड के कारखाने में बने इस विमान की पहली उड़ान ब्रिटिश एयरवेज़ के विमान ने 1949 में भरी थी. कॉमेट का आना हवाई सफ़र की दुनिया में इंक़लाब का आना था.

इससे पहले दूसरे विश्व युद्ध के बाद तक हवाई सफ़र इतना आसान नहीं था. जंग के दौरान बने बमवर्षक या मालवाहक विमानों में फेरबदल करके उन्हें हवाई सफर के काम में लाया जाता था. उनमें ज़्यादा उंचाई तक उड़ान भरने की क्षमता नहीं थी. साथ ही उनमें जिस तरह के पिस्टन का इस्तेमाल किया जा रहा था वो शोर ज़्यादा करते थे. उनके नाम भी पुराने ज़माने के लगते थे. मसलन ट्यूडर, लैंकेस्ट्रियन या अर्गोनॉट.

ऐसे में कॉमेट को जिस तरह से डिज़ाइन किया गया था वो एकदम नए ज़माने का लगता था. इसमें चार जेट इंजन लगे थे. ये ज़मीन से 12 किलोमीटर की उंचाई तक उड़ान भर सकता था. इसकी खिड़कियां ऐसी थीं जिनसे मुसाफ़िर उड़ान भरते वक़्त आसमान से ज़मीन का ख़ूबसूरत नज़ारा देख सकते थे. कॉमेट में एक बार में 36 मुसाफ़िर सफ़र कर सकते थे. विमान में दो केबिन थे. बीच में चलने की जगह छोड़कर दोनों तरफ़ टेबल थे. सीटें भी बहुत आरामदेह थी. लगेज एरिया के अलावा महिलाओं और पुरूषों के लिए अलग अलग टॉयलेट भी कॉमेट में बने थे.

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द हेविलैंड एयरक्राफ़्ट म्यूज़ियम के अध्यक्ष एलेस्टेयर हॉजसन कहते हैं कि आज भी कॉमेट को देखकर ये कहना मुश्किल है कि ये सत्तर साल पुराना जहाज़ है. उस दौर में तो ये अपने वक़्त से बहुत आगे का विमान था. हॉजसन कहते हैं कि ऐसा एयरक्राफ़्ट तभी बन पाता है, जब इंजीनियर को अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ काम करने का मौक़ा मिलता है.

इस विमान की पहली लंबी कॉमर्शियल उड़ान 2 मई 1952 को हुई थी. जब कॉमेट ने रोम, बेरूत, ख़रतूम से होते हुए जोहानिसबर्ग के लिए उड़ान भरी. इस सफर को कॉमेट ने 23 घंटे में पूरा किया था. जोकि ख़ुद इसके लिए एक बड़ी कामयाबी थी. इस सफर में गए मुसाफ़िरों के लिए ये तजुर्बा अद्भुत था. कुछ ही महीनों में ब्रिटिश ओवरसीज़ एयरवेज़ कॉर्पोरेशन ने कॉमेट की मदद से श्रीलंका, कराची, सिंगापुर और टोक्यो के लिए भी उड़ानें शुरू कर दी थीं. उस दौर में पांच सौ किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से हवाई सफ़र करना लोगों के लिए एक अनोखा ही तजुर्बा होता था.

कॉमेट के साथ कई कामयाब उड़ानें भरने वाले पायलट पीटर डफ़ी बताते हैं कि कॉमेट हाईड्रॉलिक फ्लाइंग कंट्रोल वाला पहला कमर्शियल एयरलाइनर था. जब पायलट कॉलम को कंट्रोल करता था तो पंप के ज़रिए ईंधन आगे बढ़ाया जाता था. ये ईंधन पाइप से आगे तक पहुंच कर विंग्स को कंट्रोल करता था. डफ़ी कहते हैं कुछ समय बाद इसमें दिक़्क़त आनी शुरू हो गई थी. प्लेन का नेवीगेशन सिस्टम ज़्यादा गर्म होने लगता था और कॉकपिट की खिड़कियों पर उड़ान के वक़्त धुंध छा जाती थी.

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कॉमेट की एक और दिक़्कत थी कि इसमें हर चार घंटे बाद ईंधन भरवाना पड़ता था. असल में इस एयरक्राफ़्ट के डिज़ाइन में ही कई ख़ामियां थीं जिन्हें कोई समझ नहीं पा रहा था.

पायलट पीटर डफ़ी को आज भी 26 अक्तूबर 1952 का वो दिन याद है जब कॉमेट-1 हादसे का शिकार हुआ था. हालांकि ग़नीमत ये रही थी कि इस हादसे में किसी की जान नहीं गई थी. इसमें सवार सभी मुसाफ़िर और क्रू मेम्बर सुरक्षित थे. डफ़ी कहते हैं इस हादसे के लिए पायलट को ज़िम्मेदार ठहराया गया था लेकिन असल में दिक़्क़त प्लेन के डिज़ाइन में थी.

कुछ ही महीनों बाद 13 मार्च 1953 में कराची से उड़ान भरते हुए भी इसी तरह की दिक़्क़त का सामना करना पड़ा. इस बार ट्रेनिंग उड़ान के दौरान कॉमेट विमान एक पुल से जा टकराया और उसमें सवार क्रू के सभी 11 सदस्यों की मौत हो गई. उसी साल जून महीने में सेनेगल की राजधानी डकार में भी ट्रेनिंग की उड़ान के दौरान कॉमेट हादसे का शिकार हुआ. इससे पहले 2 मई 1953 को दिल्ली से उड़ान भरने के कुछ वक़्त बाद ही ब्रिटिश ओवरसीज़ एयरवेज़ का कॉमेट विमान हादसे का शिकार हो गया. इसमें 43 लोगों की मौत हो गई.

पीटर डफ़ी बताते हैं कि बार बार इस तरह के हादसे होने पायलट डर गए थे. कंपनी ने कॉमेट उड़ाने वालों के लिए नई हिदायतें जारी कीं.

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हैविलैंड म्यूज़ियम के एलेस्टेयर हॉजसन कहते हैं कि एयरक्राफ़्ट के डिज़ाइन में दो बड़ी खामियां थीं. पहली तो यही की एयरक्राफ़्ट का कवर बहुत पतला था, ताकि इसका वज़न कम रखा जा सके. और दूसरी वजह थी इसकी आयताकार खिड़कियां.

10 जनवरी 1954 को कॉमेट GLYP ने जैसे ही रोम से उड़ान भरी, उसके कुछ देर बाद ही ये प्लेन क्रैश हो गया और उसमें सवार 29 मुसाफिरों के साथ साथ छह क्रू मेंबर भी मारे गए. इस हादसे के बाद ब्रिटिश ओवरसीज़ एयरक्राफ़्ट कॉर्पोरेशन और एयर फ़्रांस ने कॉमेट की ख़ामियां जांचने के लिए एक जांच कमेटी बनाई.

पायलेट डफ़ी का कहना है उनकी बहुत सी मीटिंग हुई. लेकिन कोई भी हादसों की सही वजह नहीं बता पाया. जब एक बार फिर से कॉमेट हादसे का शिकार हुआ तो उसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी उड़ाने बंद कर दी गईं. विमानन कारोबार की दुनिया में इस फैसले से सन्नाटा पसर गया था.

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एयरक्राफ़्ट हादसों की जांच के लिए इंग्लैंड के फ़ार्नबोरो में जानकारों की एक टीम बैठी. यहीं से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विमान हादसों की जांच का सिलसिला शुरू हुआ था. जांच के लिए इन जानकारों ने एयरक्राफ़्ट को पानी के एक बड़े से टैंक में डूबाया और उसका प्रेशर और स्ट्रेस दोनों टेस्ट किए. क़रीब नौ हज़ार घंटे की उड़ान के बराबर इसमें प्रेशर पैदा किया. क़रीब 6 हफ़्ते बाद ये प्रेशर अचानक निकला गया. तब कॉमेट एयरक्राफ़्ट की ख़िड़कियों के पास का कांच चटख गया. इससे साफ़ ज़ाहिर हो गया कि विमान की खिड़कियां हवा का दबाव नहीं सह पा रही थीं.

कॉमेट की नाकाम, दूसरी विमान कंपनियों के लिए सबक बन गई. उस वक्त अमरीका की बोइंग कंपनी ज़ोर-शोर से कॉमेट के मुकाबले का विमान बनाने की जुगत में लगी थी. कॉमेट की नाकामी के दौर में बोइंग के सिएटल के कारखाने में बोइंग 707 विमान का डिज़ाइन तैयार किया जा रहा था. इसमें कॉमेट की नाकामी से सीखे गए सबक़ का ध्यान रखा गया.

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बोइंग 707 ने हवाई सफर को पूरी तरह बदलकर रख दिया था. आज हम ये कह सकते हैं कि इसमें ब्रिटेन के कॉमेट विमान का बड़ा योगदान था. अगर वो नाकाम न हुआ होता, तो आज हवाई सफर इतना बेहतरीन तजुर्बा नहीं होता.

बाद में हैविलैंड ने डिज़ाइन में सुधार करके कॉमेट-2, 3 और 4 को मार्केट में उतारा. कॉमेट-4 की तारीफ़ तो बड़े बड़े इंजीनियर और पायलट भी करते हैं. कॉमेट-4 ने साल 1997 तक उड़ान भरी थी.

पायलट पीटर डफ़ी ने दो भयानक हादसों से ठीक पहले कॉमेट में उड़ान भरी थी. बाद में उन्होंने आवाज़ से भी तेज़ उड़ने वाले ब्रिटिश जहाज़ कॉनकार्ड को भी उड़ाया था और वो ब्रिटिश एयरवेज़ के पहले कोनकोर्ड पायलट बने.

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डफी कहते हैं कि ब्रिटेन की विमान इंडस्ट्री, कॉमेट की नाकामी से कभी उबर नहीं सकी. द हैविलैंड फैक्ट्री आज एक इंडस्ट्रियल पार्क बना दी गई है. इसका एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफ़िस अब एक पुलिस स्टेशन बन चुका है. और बिल्डिंग की शुरूआत में के.एफ़.सी रेस्टोरेंट खुल गया है. जहां कभी कोमेट-1 खड़ा होता था वहां एक जिम बन चुका है. और फ़ैक्ट्री का फ्लोर टेनिस कोर्ट में बदल चुका है.

हैविलैंड म्यूज़ियम में आज सिर्फ़ कोमेट-1 को का रंग रोगन करके इसे लोगों की नुमाइश के लिए रख दिया गया है. अगर आप भी इस अद्भुत प्लेन को देखने के ख़्वाहिशमंद हैं, तो, इस म्यूज़ियम में तशरीफ़ ला सकते हैं.

याद रखिएगा कि ये वही विमान है, जिसने हवाई सफर का तौर-तरीक़ा पूरी तरह से बदल दिया था. ये अपने वक़्त से बहुत आगे की चीज़ थी.

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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