यूरोप में लगातार क्यों हो रहे हैं चरमपंथी हमले?

  • 28 अप्रैल 2017
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क्या पश्चिमी सभ्यता का महान क़िला ढह रहा है? ये सवाल इसलिए क्योंकि हालात बेहद ख़तरनाक दिख रहे हैं. यूरोप में लगातार चरमपंथी हमले हो रहे हैं.

अमरीका भी निशाने पर है. पश्चिमी देशों की आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं. उन्हें पूरी दुनिया में चुनौती मिल रही है.

मध्य-पूर्व से लेकर अफ़्रीका और एशिया तक, पश्चिमी देशों को आर्थिक-सामरिक मोर्चे पर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.

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यूं तो इंसान का इतिहास ऐसी तमाम मिसालों से भरा पड़ा है जहां एक वक़्त उरूज़ पर रहे देश, कामयाबी का सफ़र तय कर रही सभ्यताएं अचानक फ़िसले और ढह गए.

रोमन साम्राज्य हो, या मिस्र की सभ्यता या फिर भारतीय उप-महाद्वीप में सिंधु घाटी सभ्यता. ये इंसान की तरक़्क़ी की मिसालें थीं. मगर इन सबका पतन हो गया.

महान मुग़ल साम्राज्य जो कभी मध्य एशिया से लेकर दक्षिण भारत तक पर राज करता था वो ख़त्म हो गया. वो ब्रिटिश साम्राज्य जहां कभी सूरज अस्त नहीं होता था, वो भी एक वक़्त ऐसा आया कि मिट गया.

आज अमरीका की अगुवाई वाले पश्चिमी देश जिस तरह की चुनौतियां झेल रहे हैं, उस वजह से अब पश्चिमी सभ्यता के क़िले के ढहने की आशंका जताई जा रही है.

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डांवाडोल आर्थिक स्थिति

एक मर्तबा, अमरीकी अर्थशास्त्री बेंजामिन फ्रीडमैन ने आधुनिक पश्चिमी समाज की तुलना एक साइकिल से की थी. फ्रीडमैन ने कहा था कि यहां आर्थिक तरक़्क़ी स्थाई होगी. लेकिन हाल की तमाम रिसर्च इस बात को नकारती हैं.

उनके मुताबिक़ पश्चिमी देशों की ना सिर्फ़ आर्थिक स्थिति डावांडोल है, बल्कि इन देशों में लोकतंत्र, नागरिकों की निजी आज़ादी और सामाजिक सहिष्णुता जैसे सिद्धांत भी कमज़ोर पड़ रहे हैं.

आज कई पश्चिमी देशों में राष्ट्रवादी पार्टियां सत्ता में आ गई हैं. इनके नेता, अपने देशों के दरवाज़े बाक़ी दुनिया के लिए बंद कर रहे हैं. खुली, पूंजीवादी अर्थव्यवस्था अब दो देशों के आपसी कारोबारी रिश्तों पर ज़्यादा यक़ीन करने लगी है.

कोई भी सभ्यता चाहे कितनी ही महान क्यों ना रही हो, वो, वक़्त आया तो ख़ुद को तबाही से नहीं बचा पाई. आगे चलकर क्या होगा, ये पक्के तौर पर तो कहना मुमकिन नहीं. मगर ऐतिहासिक तजुर्बों और साइंस के मॉडल की मदद से हम कुछ अंदाज़े तो लगा सकते हैं.

कुछ एक्सपर्ट इन पैमानों पर कसकर पश्चिमी सभ्यता को लेकर भविष्यवाणी कर रहे हैं.

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प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता बोझ

ऐसे ही एक्सपर्ट हैं अमरीका की मैरीलैंड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर सफ़ा मोतेशारी. प्रोफ़ेसर मोतेशारी और उनकी टीम ने अपनी रिसर्च को 2014 में प्रकाशित किया था. उनके मुताबिक़ किसी भी सभ्यता के पतन की दो प्रमुख वजहें होती हैं.

पहली तो क़ुदरती संसाधनों पर उस सभ्यता का दबाव और दूसरा सभ्यता को चलाने का बढ़ता आर्थिक बोझ.

प्रोफ़ेसर मोताशेरी अपनी रिसर्च कि बुनियाद पर कहते हैं कि आने वाले समय में जलवायु परिवर्तन की वजह से प्राकृतिक संसाधनों की भारी कमी हो जाएगी. ज़मीन के अंदर का पानी, मिट्टी और जंगल सिमट रहे हैं. जब क़ुदरती संसाधनों की कमी होगी तो ज़ाहिर है, इसका असर आर्थिक गतिविधियों पर भी पड़ेगा.

जब ऐसे हालात होंगे तो अमीर लोग संसाधनों पर क़ब्ज़ा करेंगे. इससे समाज में फ़ासला बढ़ेगा. अमीर लोग पैसे के बल पर अपनी ज़िंदगी को उसी तरह चलाना चाहेंगे जैसी वो जीते आए हैं. ऐसे में आम जनता के हिस्से ज़रूरी संसाधन और भी कम आएंगे. उसे हासिल करने के लिए उनमें आपस में खींचतान होगी.

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अमीरी-ग़रीबी की खाई

वहीं निचले तबक़े के लोगों के आपसी झगड़े की वजह से अमीरों को कामगार नहीं मिलेंगे. उनकी ज़िंदगी की मुश्किलें भी बढ़ेंगी.

आज अमीर और ग़रीब के बीच पूरी दुनिया में बढ़ती खाई, मोताशेरी के दावों को दमदार बनाती है. मिसाल के लिए आज दुनिया भर में जितनी ग्रीनहाउस गैसें बन रही हैं, उसका 90 फ़ीसद हिस्सा, दस फ़ीसद अमीरों की वजह से होता है.

इसी तरह दुनिया की क़रीब आधी आबादी तीन डॉलर प्रति दिन पर ज़िंदगी गुज़ार रही है.

अगर समाज में इतनी आर्थिक असमानता होगी, तो किसी भी सभ्यता का ख़ात्मा तय है. धरती पर जो क़ुदरती संसाधन हैं, वो इंसान की आबादी का एक हद तक ही बोझ उठा सकते हैं.

हमें हमारी ज़रूरतों को मौजूद क़ुदरती संसाधनों के हिसाब से ढालना होगा. ज़रूरी है कि हम क़ुदरती संसाधनों का समझदारी से इस्तेमाल करें. आबादी को बढ़ने से रोकें, तो, इस विनाश से बचा जा सकता है.

लेकिन इस सोच को अमल में लाने के लिए लंबा इंतज़ार नहीं किया जा सकता. एहतियाती क़दम फ़ौरन उठाने होंगे.

कुछ जानकारों का कहना है मौजूदा सूरते हाल में दुनिया की आबो-हवा को बचाने का फ़ैसला करना राजनीतिक रूप से से मुश्किल है. जिस तरह के पर्यावरण का वादा पेरिस समझौते में किया गया था उसे अमल में लाने को लेकर संजीदगी नहीं दिखती.

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सीरिया एक नज़ीर है

आज इंसान के पास इतना वक़्त नहीं है कि वो एहतियाती क़दम को कुछ और साल के लिए टाल सके.

जब भी कभी ऐसी सूरतेहाल पैदा होगी तो समाज का ग़रीब तबक़ा सबसे पहले इसका शिकार बनेगा. कई देशों में इसकी मिसाल देखी गई है.

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मसलन, ज़्यादा पुरानी बात नहीं, जब सीरिया एक ख़ुशहाल देश था. लेकिन साल 2000 के आख़िर में वहां भयानक सूखा पड़ा. पानी की कमी की वजह से फ़सलें सूख गईं, लोग बेरोज़गार हो गए.

बेरोज़गारी की वजह से लोगों ने शहरों की तरफ़ कूच करना शुरू किया. शहर पहले से ही संसाधनों पर दबाव महसूस कर रहे थे. बढ़ती आबादी ने माहौल को और बिगाड़ दिया.

कई हिस्सों में बंटा समाज हिंसक हो गया. बिगड़ते हालात में सरकार की ग़लत नीतियों ने आग को और हवा दी. आज सीरिया गृह युद्ध में जल रहा है. ये एक सभ्यता, एक ख़ुशहाल देश के बहुत कम वक़्त में बर्बाद होने की मिसाल है.

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कनाडा के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स के प्रोफ़ेसर थॉमस होमर-डिक्सन का कहना है कि सभ्यताओं के विनाश के लिए वैश्विक पटल पर अचानक होने वाले बदलाव भी ज़िम्मेदार हैं.

जैसे 2008 की आर्थिक मंदी, आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठनों का वजूद में आना, ब्रेक्सिट या अमरीका में डॉनल्ड ट्रंप का राष्ट्रपति बनना.

रोमन साम्राज्य का पतन

भविष्य के सुधार के लिए कई बार इतिहास की घटनाओं से भी सबक़ लिया जा सकता है. पश्चिमी देश, रोमन साम्राज्य से सबक़ ले सकते हैं.

ईसा से एक सदी पहले तक रोमन साम्राज्य बेहद ताक़तवर था. इसका राज पूरे भूमध्य सागर के इलाक़े पर था. इन इलाक़ों तक आने जाने के लिए समंदर से होकर गुज़रना पड़ता था. जोकि आवाजाही का सस्ता ज़रिया था.

मगर साम्राज्य के विस्तार के साथ-साथ इसका ख़र्च बढ़ता गया. लेकिन वो अपनी ताक़त का मुज़ाहिरा करने के लिए आगे बढ़ते चले गए. कई सदियों तक तो ये साम्राज्य अपने ख़र्च का बोझ ढोता रहा.

मगर जब तीसरी शताब्दी में यहां भी गृह युद्ध छिड़ गया और पास के राज्यों ने हमला करना शुरू कर दिया, तो जंगों की वजह से ख़र्च और बढ़ गया. साम्राज्य का विस्तार हो चुका था. इसकी रखवाली, प्रशासन को चलाने के लिए ख़र्च बढ़ता ही जा रहा था.

प्रशासकों ने करेंसी के अवमूल्यन से लेकर कई तरह के नुस्खे आज़माए, मगर वो साम्राज्य को पतन से नहीं रोक सके. इसकी वजह यही थी कि रोमन साम्राज्य अपने ख़र्च का बोझ नहीं उठा सके. वक़्त पर बर्बादी रोकने के लिए ज़रूरी क़दम नहीं उठा सका.

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अमरीका की यूटा स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेस जोसेफ़ टेंटर कहते हैं कि जैसे-जैसे किसी सभ्यता या साम्राज्य का विस्तार होता है, उसकी पेचीदगियां बढ़ती जाती हैं. किसी भी सिस्टम में जब पेंच-ओ-ख़म बढ़ते जाते हैं, तो, उसे चलाना मुश्किल भी होता जाता है और ख़र्चीला भी.

प्रोफ़ेसर टेंटर रोम की ही मिसाल देते हैं. वो कहते हैं कि तीसरी सदी तक रोम में कई नए सूबे बन गए थे. सबकी अपनी सेनाएं थीं, अफसरशाही थी, अदालतें थीं. जिनका ख़र्च पूरी व्यवस्था पर भारी बोझ की तरह पड़ रहा था.

प्रोफ़ेसर थॉमस होमर-डिक्सन कहते हैं कि पश्चिमी समाज का विनाश भी कुछ इसी तरह होगा. ग़रीब देशों के क़ुदरती संसाधनों पर पश्चिम के देश अपना कब्ज़ा करेंगे तो बड़ी संख्या में इन ग़रीब देशों के लोग पश्चिमी देशों में शरणार्थी बनकर आएंगे.

जिस पर पश्चिमी देश प्रतिबंध लगाएंगे. ऐसा हो भी रहा है. जिन पश्चिमी देशों में लोग पनाह ले रहे हैं, वो अब शरणार्थियों पर पाबंदी लगा रहे हैं. सरहदों की सुरक्षा बढ़ाने के लिए मोटी रक़म ख़र्च की जा रही है. लोकतांत्रिक देश भी तानाशाही तरीक़े अपना रहे हैं.

फिलहाल तो पश्चिमी देश, इस हालात को टालने की कोशिश कर रहे हैं. पश्चिमी सभ्यता को चलाने के लिए ज़रूरी तेल और गैस का नया ज़रिया तलाश लिया गया है. अब फ्रैकिंग के ज़रिए तेल के नए स्रोत खोजे जा रहे हैं.

आर्कटिक महासागर में तेल के संसाधनों के दोहन की तैयारी है, ताकि पश्चिमी सभ्यता को चलाने के लिए ईंधन की निर्बाध सप्लाई होती रहे.

मगर, पश्चिमी देशों के भीतर भी अमीर और ग़रीब की खाई बढ़ रही है. जानकार कहते हैं कि 2050 तक अमरीका और ब्रिटेन में सिर्फ़ दो वर्ग होंगे, अमीर और ग़रीब.

प्रोफ़ेसर थॉमस होमर-डिक्सन कहते हैं कि यूरोप के लिए चुनौती बड़ी है. क्योंकि ये मध्य-पूर्व और अफ्रीका के अस्थिर इलाक़ों के क़रीब है. यहां की उठा-पटक और आबादी की भगदड़ का सीधा असर पहले यूरोप पर पड़ेगा.

हम आतंकी हमलों की शक्ल में ऐसा होता देख भी रहे हैं. अमरीका, बाक़ी दुनिया से समंदर की वजह से दूर है. इसलिए वहां इस उठा-पटक का असर देर से होगा.

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जब अलग-अलग धर्मों, समुदायों, जातियों और नस्लों के लोग एक देश में एक-दूसरे के आमने-सामने होंगे, तो झगड़े बढ़ेंगे. पश्चिमी देशों में शरणार्थियों की बाढ़ आने के बाद यही होता दिख रहा है.

वहीं कुछ जानकारों का ये भी कहना है कि हो सकता है पश्चिमी सभ्यताएं ख़त्म ना हों लेकिन उनका रंग-रूप ज़रूर बदलेगा. लोकतंत्र, उदार समाज जैसे फलसफ़े मिट्टी में मिल जाएंगे. चीन जैसे अलोकतांत्रिक देश, इस मौक़े का फ़ायदा उठाएंगे.

ऐसा होना भी एक तरह से सभ्यता का पतन ही कहलाएगा. किसी भी सभ्यता की पहचान वहां के जीवन मूल्य और सिद्धांत होते हैं. अगर वही नहीं रहेंगे, तो सभ्यता को ज़िंदा कैसे कहा जा सकता है?

जब भी कोई मुश्किल आती है, हम अपने दरवाज़े बंद कर लेते हैं. ऐसे में उस चुनौती का सीधा सामना करना मुश्किल होता है. मगर इंसान हमेशा से अपनी अक़्लमंदी से तमाम चुनौतियों से पार पाता रहा है.

प्रोफ़ेसर थॉमस होमर-डिक्सन मानते हैं कि पश्चिमी सभ्यता भी अपने आपको पतन से बचाने के तरीक़े तलाश लेगी.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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