स्तनपान कराने से बिगड़ती है मां की सेहत?

  • 17 मई 2017
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हाल ही में ऑस्ट्रेलिया की एक सांसद ने पूरी दुनिया में सुर्ख़ियां बटोरीं. ग्रीन पार्टी की सांसद लारीसा वाटर्स ने संसद के भीतर ही वोटिंग के दौरान अपनी दो महीने की बेटी को स्तनपान कराया. लारीसा का अपनी बेटी को संसद में दूध पिलाना पूरी दुनिया में सुर्खियां बटोरने वाली घटना बन गई.

हालांकि ख़ुद लारीसा का कहना था कि मांएं तो आदि काल से अपने बच्चों को स्तनपान कराती आ रही हैं, इसमें इतना चौंकाने वाली बात नहीं थी. वाक़ई, मां और बच्चे का ये रिश्ता तो आदिकाल से चला आ रहा है. माएं अपने बच्चों को अपना दूध पिलाती आ रही हैं.

हम भी ये बात एक ज़माने से सुनते आ रहे हैं कि मां का दूध बच्चे के लिए वरदान है. बच्चे के विकास के लिए जितने भी पोषक तत्वों की ज़रूरत होती है, वो सभी मां के दूध में पाए जाते हैं. अक्सर लोग अंधविश्वास के चलते बच्चे की पैदाइश के बाद मां की छाती से आने वाला पहला दूध बच्चे को पीने नहीं देते.

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जबकि डॉक्टरों का कहना है वो दूध बच्चे के लिए सबसे ज़्यादा फ़ायदेमंद होता है. घर के बुज़ुर्ग भी यही कहते हैं कि बच्चे को कम से कम 6 महीने तक तो सिर्फ़ मां का ही दूध पिलाना चाहिए. सेहत के मोर्चे पर काम करने वाली वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइज़ेशन, यूनिसेफ़ और दीगर संस्थाएं भी इसी बात पर ज़ोर देती हैं.

लेकिन अब वक़्त आ गया है कि ये सोच बदली जाए. कई ऐसे नए रिसर्च किए गए हैं जो कहते हैं कि मां का दूध बच्चे के लिए फ़ायदेमंद तो है, लेकिन इतना भी ज़रूरी नहीं जितना हमें अब तक सिखाया पढ़ाया गया है.

बहुत ज़रूरी भी नहीं

कुछ रिसर्च ये दावा करते हैं कि बच्चे को मां का दूध पिलाने से मां की सेहत पर कई बार बुरा असर पड़ता है. कई बार ख़ुद बच्चे पर मां का दूध पीने से बुरा असर पड़ता है. बच्चे के जन्म के बाद मां में वैसे भी कमज़ोरी बहुत आ जाती है. ऐसे में बच्चे को दूध पिलाने से मां पर बुरा असर पड़ता है. कमज़ोरी की वजह से ही बहुत-सी माओं को दूध भी कम उतरता है. और अगर इसी हालत में मां बच्चे को दूध पिलाती रहती है तो बच्चे के शरीर में पानी की कमी हो जाती है.

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कई बार बच्चे के दिमाग़ के विकास पर भी इसका बुरा असर पड़ता है. बच्चे को मां का दूध दिया जाए या फिर फ़ॉर्मूला मिल्क दिया जाए इस से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. अहम सवाल ये है कि बच्चे के शरीर में उसके विकास के लिए ज़रूरी सभी पोषक तत्व उचित मात्रा में जाएं.

वैसे भी बच्चे की परवरिश को लेकर आज माहौल काफ़ी बदल चुका है.

लिहाज़ा बच्चों के खान-पान के अंदाज़ भी बदल गए हैं. बीसवीं सदी की शुरुआत में जब बच्चों के लिए फ़ॉर्मूला मिल्क बनाने वाली कंपनियों ने प्रचार करना शुरू किया तो इसी बात पर ज़ोर दिया गया कि उनका बनाया दूध मां के दूध से ज़्यादा बेहतर है. फ़ॉर्मूला मिल्क को लेकर विकासशील देशों की अपनी समस्या थी.

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वहां पर अक्सर ये दूध पाउडर के रूप में बिकता था. लोगों को बच्चे के दूध की बोतल पकाने और पाउडर दूध को पानी में घोलकर तैयार करने के लिए साफ़ पानी ही नहीं था. लिहाज़ा विकासशील देशों में इन कंपनियों के ख़िलाफ़ आवाज़ तेज़ी से बुलंद होने लगी. नेस्ले कंपनी के ख़िलाफ़ तो बाक़ायदा मुहिम चलाई गई.

कंपनियों का विरोध बनी वजह

इन कंपनियों के विरोध में मां के दूध पिलाने पर ज़्यादा ज़ोर दिया जाने लगा. मां के दूध के फ़ायदे गिनाए जाने लगे. यहां तक कि स्वास्थ्य कर्मचारी भी मां को दूध पिलाने पर ज़ोर देने लगे.

मां का दूध बच्चे का हक़ है और हर मां चाहती है कि वो अपने बच्चे को अपना दूध पिलाए. लेकिन बच्चे को जन्म देने के बाद मां में इतनी कमज़ोरी आ जाती है कि हरेक मां उस कमज़ोरी से आसानी से उबर नहीं पाती. सबसे ज़्यादा बुरा असर तो उसकी नींद पर पड़ता है और नींद पूरी ना होने से तनाव बढ़ने लगता है. तनाव बढ़ता है तो मां को दूध भी कम उतरता है. एक स्टडी के मुताबिक़ हर सात में से एक मां को तनाव और कमज़ोरी के चलते दूध कम उतरता है.

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बच्चों में पानी की कमी मां का दूध ही पूरी करती है. ऐसे में जब मां को दूध कम आता है तो बच्चे में पानी की कमी हो जाती है और कई बार तो बच्चा पीलिया जैसे मर्ज़ का शिकार हो जाता है. कई मामलों में तो बच्चे डीहाइड्रेशन की वजह से दिमागी मरीज़ हो जाते हैं, तो कई की मौत तक हो जाती है. लिहाज़ा कई बार बच्चे को फ़ॉर्मूला मिल्क देना वक़्त की ज़रूरत हो जाती है. ऐसे में बच्चे के लिए फ़ॉर्मूला दूध एक अच्छा विकल्प होता है.

अब से दस साल पहले तक बच्चे को बाहर का दूध पिलाना बुराई नहीं समझा जाता था. यहां तक कि अस्पतालों की नर्सें भी बोतल से दूध पिलाने की सलाह देती थीं.लेकिन कुछ देशों में जब से मां के दूध को लेकर नए दिशा-निर्देश बने, तब से उन्होंने भी मां के दूध पिलाने पर ही ज़ोर देना शुरू कर दिया. ख़ास तौर से जहां यूनिसेफ़ की जारी की गई गाइड लाइंस का पालन होता है वहां तो बाहर का दूध बच्चे को दिया ही नहीं जाता.

रिसर्च पर भी सवाल

बच्चे के लिए मां के दूध की हिमायत करने वालों का कहना है कि जब बच्चे को शुरू में ही बोतल से दूध पिलाया जाने लगता है, तो फिर बच्चा मां का दूध कम पीता है. और इसी वजह से मां को दूध भी कम उतरने लगता है. लेकिन कुछ रिसर्चर इस दावे को खोखला मानते हैं. उनके अनुसार बच्चे को बोतल से दूध पिलाना इतना बुरा भी नहीं है. अगर मां बच्चे को ख़ुद दूध नहीं पिलाती है, बल्कि अपना दूध निकालकर फ़ॉर्मूला मल्क के साथ मिलाकर उसे देती है तो भी बच्चे को सभी ज़रूरी पोषक तत्व मिल जाते हैं.

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मां का दूध बच्चे को सभी तरह की बीमारियों से बचाता है- बहुत से रिसर्चर इस दावे को भी सही नहीं मानते. अलबत्ता इस बात से किसी को इनकार नहीं कि मां का दूध पीने से बच्चे की सेहत निश्चित तौर पर बेहतर रहती है. लेकिन अगर मां को कोई घातक बीमारी है, और वो बच्चे को अपना दूध पिलाती है तो उसका असर भी बच्चे पर पड़ता है.

इसमें कोई शक नहीं कि मां का दूध बच्चे के लिए अच्छा होता है. लेकिन उसके फ़ायदे को इतना भी बढ़ा चढ़ा कर पेश ना किया जाए कि हर मां उसे अपनी ज़िम्मेदारी समझने लगे. बच्चे को अपना दूध न चाहते हुए भी पिलाने का दबाव महसूस करे. अगर वो ऐसा ना कर पाए तो उसे गुनाह का एहसास हो.

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मां के दूध के साथ फ़ॉर्मूला मिल्क के इस्तेमाल पर भी ज़ोर दिया जाना चाहिए. इससे बच्चा सिर्फ़ मां के दूध पर ही निर्भर नहीं रहेगा. ये मां की इच्छा पर निर्भर होना चाहिए कि वो अपने बच्चे को दूध पिलाए या नहीं. वैसे तो हर मां यही चाहेगी कि वो अपने बच्चे को अपना ही दूध पिलाए. लेकिन अगर किसी कारण से वो ऐसा नहीं कर पाती है तो उसके पास अपने बच्चे के लिए दूसरे विकल्प भी मौजूद होने चाहिए.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

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