हमारा दिमाग़ आंखों से ली गई तस्वीरों का आख़िर करता क्या है?

  • 24 मई 2017
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हमें कई बार महसूस होता है कि हमें कोई देख रहा है. कोई हमें घूर रहा है. कोई हमारा पीछा कर रहा है.

कई बार पार्क में टहलते वक़्त, या अंधेरे कमरे में ऐसा फ़ील होता है.

बहुत बार तो भीड़ भरी बस या ट्रेन के कूपे में भी ऐसी फ़ीलिंग होती है कि कोई हम पर नज़रें गड़ाए हुए है. अक्सर आपका यह एहसास सच साबित होता है.

कभी आपने सोचा है कि आख़िर आपके अंदर ये महसूस करने की ताक़त कहां से आई? कैसे जो चीज़ आपकी नज़रों ने नहीं देखी, आपने उसे महसूस कर लिया?

अक्सर लोग इसे छठी इंद्री या छठी संज्ञा या अंग्रेज़ी में इन्टूइशन कहते हैं. तो क्या वाक़ई में ऐसा होता है?

कहा हम सहज ज्ञान से ये जान जाते हैं कि किसी की नज़रें हम पर टिकी हैं?

साइंस का जवाब

साइंस ने इन सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की है.

जब हमारी आंखें किसी चीज़ को देखती हैं, तो वो इस तस्वीर को हमारे दिमाग़ को भेजती हैं. ये हमें उस चीज़ के बारे में बताता है. उस चीज़ को महसूस कराता है, दिखाता है.

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अब तक ये माना जाता रहा है कि दिमाग़ का एक ख़ास हिस्सा हमारे चीज़ों को देखने-समझने के लिए ज़िम्मेदार है.

इसे विज़ुअल कॉर्टेक्स कहते हैं. जब आंखें, चीज़ों की तस्वीरें दिमाग़ के इस हिस्से को भेजती हैं, तो वो इसे समझकर हमें बताता है कि आख़िर वो है क्या.

लेकिन बात इतनी सी नहीं है. जब हमारी आंखें किसी चीज़ की तस्वीर दिमाग़ को भेजती हैं, तो वो सिर्फ़ विज़ुअल कॉर्टेक्स तक नहीं जाती.

ये तस्वीर दिमाग़ के कम से कम दस कोनों तक पहुंचती है. इसका मुख्यतौर पर इस्तेमाल तो दिमाग़ का विज़ुअल कॉर्टेक्स करता है.

मगर इस तस्वीर को हमारे ज़हन के बाक़ी हिस्से अपने-अपने तरीक़े से समझते हैं, सहेजते हैं.

वैज्ञानिक अब तक ठीक से ये नहीं समझ सके हैं कि जो तस्वीर या मंज़र हमारी आंखें देखती हैं. फिर उसे दिमाग़ के दस हिस्सों में भेजती हैं, उनका हमारे ज़हन के अलग-अलग हिस्से करते क्या हैं?

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वैज्ञानिकों ने उन लोगों के ज़रिए इस बात को समझने की कोशिश की है, जिनके दिमाग़ का विज़ुअल कॉर्टेक्स हिस्सा किसी हादसे या बीमारी की वजह से नष्ट हो गया.

जब किसी बीमारी या एक्सीडेंट के चलते विज़ुअल कॉर्टेक्स को नुक़सान पहुंचता है, तो हमारी देखने की ताक़त जाती रहती है.

इसे ही अंधापन कहते हैं. हो सकता है कि हमारी आंखों को नुक़सान न पहुंचे. मगर, चूंकि आंखों को जो दिखाई देता है, उस मंज़र को हमारा दिमाग़ प्रॉसेस नहीं कर पाता, तो हमें चीज़ें दिखाई नहीं देतीं.

वैज्ञानिक कहते हैं कि दिमाग़ के विज़ुअल कॉर्टेक्स के ख़राब होने के बाद भी हमारे ज़हन के कई हिस्से तस्वीरों को समझ सकते हैं.

फिर आख़िर हमारा दिमाग़ आंखों से ली गई तस्वीरों का करता क्या है?

मन की आंख

1974 में एक वैज्ञानिक लैरी वीसक्रांत्ज़ ने इसे ब्लाइंडसाइट का नाम दिया. हम इसे मन की आंख कह सकते हैं.

मतलब हमें आंखों से कुछ नहीं दिखता, तो भी हम चीज़ों को महसूस कर पाते हैं.

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बाद में हुए तमाम तजुर्बों ने बताया कि जो लोग आंखों से नहीं देख पाते, वो भी आस-पास की चीज़ों को महसूस करते हैं.

उन्हें भी लोगों की निगाहों का, उनके चेहरे पर आ रहे भावों का एहसास हो जाता है. इसे ही लोग मन की आंखें या छठी संज्ञा कहने लगते हैं.

असल में ये हमारे दिमाग़ के उन हिस्सों की वजह से होता है, जो किसी मंज़र को अपने तरीक़े से प्रॉसेस कर रहे होते हैं.

वो रौशनी का एहसास आपको कराते हैं. वो किसी खटके का भी आपको एहसास कराते हैं. भले ही लोगों की आंखें बहुत सी चीज़ें न देख पाएं, मगर वो आस-पास की चीज़ों को महसूस कर लेते हैं.

इन लोगों का विज़ुअल कॉर्टेक्स ख़राब होने से इन्हें कोई चीज़ साफ़ तौर से तो नहीं दिखती, मगर एहसास होता रहता है.

स्विटज़रलैंड के जेनेवा यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल में इस बारे में एक दिलचस्प तजुर्बा हुआ था.

वहां टीडी नाम के एक डॉक्टर पर वैज्ञानिकों ने कई प्रयोग किए थे. बीमारी की वजह से टीडी नाम के इस शख़्स की देखने की ताक़त चली गई थी. इसके बाद डॉक्टरों ने टीडी की इजाज़त से उस पर कुछ तजुर्बे किए.

टीडी को कुछ लोगों की तस्वीरें दिखाई गईं. कुछ चेहरे दिखाए गए. कुछ लोग सामने बैठाए गए.

इस दौरान एक एमआरआई मशीन के ज़रिए टीडी के दिमाग़ की हलचलों पर भी नज़र रखी गई.

वैज्ञानिक यह देखकर हैरान रह गए कि टीडी ने कई तस्वीरों के भावों को बखूबी पहचान लिया. उसे घूरती हुई आंखों का एहसास हुआ. कई बार उसने मुस्कुराते चेहरे वाली तस्वीर का भी सही-सही अंदाज़ा लगाया.

नज़रें हमें घूर रही हैं

एमआरआई के ज़रिए पता चला कि जब टीडी इस तजुर्बे से गुज़र रहा था, उस वक़्त उसके ज़हन के कई हिस्से बेहद एक्टिव थे.

इनमें से एक को हम एमिग्डाला कहते हैं. यहां पर काफ़ी हलचल देखी गई. अब तक ये कहा जाता था कि एमिग्डाला हमारे दिमाग़ का वो हिस्सा है, जो जज़्बात महसूस कराता है. जो हमें लोगों की पहचान याद रखने में मदद करता है.

लेकिन इस नए तजुर्बे से ये मालूम हुआ कि ये तो हमारी छठी इंद्री जैसा काम भी करता है.

देखने की क़ुव्वत न होने पर भी हम दिमाग़ के एमिग्डाला नाम के हिस्से की मदद से चीज़ों को महसूस कर सकते हैं. घूरती या मुस्कुराती नज़रों का हमें एहसास हो जाता है.

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नज़रों की ताक़त का कोई जवाब नहीं, हम इनके ज़रिए ही दुनिया देख सकते हैं. फ़िल्में देख सकते हैं, या क़िताबें पढ़ने का लुत्फ़ ले सकते हैं. लेकिन ख़ुदा न करे, अगर हमारे विज़ुअल कॉर्टेक्स को कुछ हो जाए और हमारी देखने की ताक़त चली जाए, तो एमिग्डाला नाम का हमारे ज़हन का हिस्सा हमारे काफ़ी काम आ सकता है.

शायद यही वो हिस्सा है जिसकी मदद से कई बार हमें एहसास होता है कि कुछ नज़रें हमें घूर रही हैं.

या कोई हमारा पीछा कर रहा है. उस शख़्स को हमारी आंखें भले न देख पाएं, मगर एमिग्डाला की मदद से हमें उनकी मौजूदगी का एहसास हो जाता है.

साफ़ है कि किसी की मौजूदगी का बिना देखे एहसास होना कोई दूसरी दुनिया की ताक़त नहीं, बल्कि हमारे दिमाग़ की ही ख़ूबी है.

अभी भी इंसान के दिमाग़ के भीतर बहुत से ऐसे राज़ हैं, जिनका सामने आना बाक़ी है.

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