जब इश्क में इंसान बोलने लगता है परिंदे की भाषा

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सीटी बजाना एक कला है. बहुत से लोग इसके ज़रिए धुनें निकाल लेते हैं.

वैसे हमारे यहां कई इलाक़ों में सीटी बजाने को बहुत बुरा माना जाता है. मगर, दुनिया में बहुत से ऐसे भी लोग हैं, जो सीटी के ज़रिए बातें करते हैं.

सीटी भी इंसान के संवाद का एक ज़रिया है. कई इलाक़ों में सीटी तो एक ज़बान है. मसलन, दक्षिणी चीन में रहने वाले हमॉन्ग जनजाति के लोग ख़ास तरह की सीटी बजाकर एक दूसरे से बात करते हैं.

दूर-दराज़ के खेतों में काम कर रहे हमॉन्ग किसान भी सीटी के ज़रिए एक दूसरे से बातें करते हैं.

लेकिन सीटी का सबसे बेहतरीन इस्तेमाल तो मोहब्बत करने वाले जोड़े करते हैं. रात के अंधेरे में जब आशिक़ गांव की गलियों से गुज़रते हैं, तो सीटी बजाकर तो कोई नज़्म या कविता गाते हुए निकलते हैं.

अगर लड़की भी उसी अंदाज़ में जवाब देती है, तो फिर बातचीत का सिलसिला शुरू हो जाता है. सबसे दिलचस्प बात ये है कि ऐसे प्रेमी जोड़े सीटी की इस धुन पर भी ख़ुफ़िया ज़ुबान में बातें करते हैं.

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इसे सिर्फ़ वही दो लोग समझ सकते हैं, जो आपस में बात करना चाहते हैं. अलग अलग तरह की ये सीटियां आम लोगों की समझ से परे होती हैं. फ्रांस की गोर्नोबल यूनिवर्सिटी के युलियां मायर को बचपन से ही सीटी बजाने में दिलचस्पी थी. आज वो इस पर लंबी चौड़ी रिसर्च कर चुके हैं.

युलियां बताते हैं कि पूरी दुनिया में ऐसे क़रीब सत्तर समुदाय हैं जो सीटी के ज़रिए संवाद करते हैं.

इंसान ने जब बोलना शुरू किया...

हैरत की बात तो ये भी है कि हमारा दिमाग़ इतनी तरह की भाषाओं को समझता है. भाषा के क्षेत्र में हो रही नई तरह की रिसर्च ने न्यूरो साइंटिस्टों को एक बार फिर से ये सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर इंसानी दिमाग़ की बनावट और उसके विकास में ज़बान को समझने की कुव्वत कब और कहां से शुरू हुई.

बहुत से जानकार तो ये भी मानते हैं कि इंसान ने जब बोलना शुरू किया तो उसके मुंह से निकलने वाले पहले शब्द सीटीनुमा ही रहे होंगे.

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युलियां मायर बताते हैं कि सीटी वाली ज़बान इस्तेमाल करने वाले इंसानों का ज़िक्र इतिहास में भी मिलता है.

ईसा से पांच सदी पहले के ग्रीक इतिहासकार हेरोडोटस ने अफ़्रीकी देश इथियोपिया की गुफाओं में रहने वाली जातियों का ज़िक्र किया था. ये लोग सीटी के ज़रिए बातें करते थे.

हेरोडोटस ने लिखा था कि इस क़बीले के लोग चमगादड़ों जैसी बोलियां निकालते हैं. प्रोफेसर मायर कहते हैं कि आज भी इथियोपिया की ओमो घाटी में इन आवाज़ों को आज भी सुना जा सकता है.

प्रोफेसर मायर के मुताबिक़ खुले पहाड़ी इलाकों में सीटी की आवाज़ क़रीब पांच मील दूर तक सुनाई देती है. पहले पहाड़ों या घाटियों में अक्सर चरवाहे और किसान एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी पर मौजूद अपने साथियों से अक्सर सीटी की भाषा में बात करते थे.

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यही नहीं अमेज़न के घने जंगलों में भी शिकारी अक्सर सीटी संवाद के ज़रिए ही एक दूसरे से बात करते हैं.

मायर कहते हैं कि सीटी की भाषा में बात करने से एक तो शिकारियों को भी सहूलियत रहती है और दूसरे जंगल में रहने वाले जानवरों को भी इंसानी आवाज़ों का सामना नहीं करना पड़ता. बियाबान में इंसानी आवाज़ें अक्सर जानवरों को डराती हैं.

आर्कटिक महासागर में व्हेल का शिकार करने वाले इनुइट समुदाय के लोग भी शिकार करते वक्त इसी तरह की भाषा का इस्तेमाल करते हैं.

कोड संदेश का इस्तेमाल

इस बात में कोई शक नहीं कि इस तरह की कोडेड या ख़ुफ़िया ज़बान लड़ाई के मैदान में भी हथियार की तरह से काम करती रही हों.

प्रोफेसर मायर के मुताबिक पश्चिमी अफ्रिका में एटलस पहाड़ों के बीच रहने वाले बरबर क़बीले के लोगों ने जब फ्रांस के ख़िलाफ़ बग़ावत की थी, तो वो सीटी के ज़रिए एक दूसरे से संदेश लेते और देते थे. ताकि उनकी बातें कोई समझ न सके.

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जापान की जासूसी से बचने के लिए ऑस्ट्रेलिया ने तो अपनी फौज में पापुआ न्यू गिनी के वाम समुदाय के लोगों को इसी मक़सद से भर्ती किया था. इन लोगों को सीटी भाषा पर अच्छी महारत हासिल थी.

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सीटी भाषा का इस्तेमाल अक्सर धार्मिक मक़सद से किया जाता था. चीन के प्राचीन ताओ धर्म की क़िताबों में भी सीटी वाली बोली के इस्तेमाल के सबूत मिलते हैं.

बल्कि प्रोफेसर मायर का तो ये भी कहना है कि चीन में हमॉन्ग और अखा समुदाय के अलावा और भी ऐसे बहुत से कबीले हैं जो सीटी भाषा की परंपरा को कायम रखे हुए हैं.

सीटी बजाने में भी कहीं कम ज़ोर दिया जाता है, तो, कहीं ज़्यादा. ये ठीक उसी तरह है जिस तरह हम शब्दों की अदायगी में करते हैं. कुछ देशों की भाषाओं में ख़ास तौर से एशियाई देशों की भाषा में एक खास तरह की मिठास और तरंग है.

मिठास और तरंग की भाषा

एक ही शब्द को अलग-अलग अंदाज़ में अदा करने पर उसका मतलब बदल जाता है. लिहाज़ा कहा जा सकता है कि इन देशों की भाषाओं में वही मिठास है जो सीटी भाषा में है.

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जबकि स्पेन या तुर्की की भाषाओं के साथ ऐसा नहीं है. तमाम ख़ूबियों के बावजूद सीटी भाषा की एक कमज़ोरी है. इसके ज़रिए भीड़-भाड़ वाली जगह और हल्की आवाज़ में बात नहीं हो सकती.

अगर शब्दों की भाषा बोलते या लिखते समय कोई शब्द गलत या छूट जाता है तो दिमाग ख़ुद बा ख़ुद उसे सही समझ लेता है. जबकि सीटी भाषा के साथ ऐसा मुमकिन नहीं है.

दिमाग के काम करने के तरीके पर अभी तक जितनी रिसर्च की गई हैं उनकी बुनियाद पर कहा जाता रहा है कि दिमाग़ का एक खास हिस्सा ही भाषा को समझने का काम करता है. अगर दाएं और बाएं कान में कोई बात एक ही समय पर कही जाती है तो दाएं कान में कहे गए शब्दों को दिमाग ज़्यादा जल्दी समझता है.

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सीटी भाषा के बारे में यही कहा जाता रहा कि अगर कोई इससे वाक़िफ़ नहीं है, तो, वो इस भाषा को समझ नहीं सकता. लेकिन हाल में की गई रिसर्च बताती हैं कि अगर ध्यान से सीटी को सुना जाए तो कुछ हद तक उसे समझा जा सकता है. और उसे दायां कान सुने या बायां, सबको हमारा दिमाग़ एक वक़्त पर ही समझता है.

सीटी भाषा ने न्यूरो साइंटिस्टों की दिलचस्पी इस बात में भी बढ़ा दी है कि संगीत सीखने में इंसान का दिमाग कितनी तेज़ी से काम करता है. 2014 में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक संगीत की ट्रेनिंग से बच्चों में सीखने की सलाहियत को बेहतर कर सकती है.

भाषा और संगीत में बदलाव

जब से इंसान ने बोलना सीखा है तब से लेकर आज तक भाषा और संगीत दोनों में बहुत तरह के बदलाव हुए हैं.

चार्ल्स डार्विन की थ्योरी के मुताबिक इंसान ने बोलने से पहले गाना ही सीखा था. और ये शायद एक खास तरह के प्रेम संबंध को मज़बूत करने के लिए ही था. इससे सामाजिक रिश्तों को मज़बूती देने में भी मदद मिली होगी. बाद में इंसान ने अपनी बोलने की कला विकसित की होगी.

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बंदर से इंसान बनने का सफ़र जितना लंबा रहा है, उतना ही लंबा वक्त ज़बान को एक ठोस रूप लेने में लगा है. लेकिन अखा और हमॉन्ग जैसे समुदाय जो आज भी आदिवासी जीवन जीते हैं, और एक खास भाषा का इस्तेमाल करते हैं, उससे यही लगता है कि इंसान ने पहले सीटी या आवाज़ को ख़ास तरह से निकालकर ही संवाद करना सीखा होगा. बाद में इंसानों ने बोलने की कला विकसित की होगी.

प्रोफेसर मायर का कहान है कि इंसान को छोड़कर बहुत सी जानवरों ने भाषा नहीं सीखी. लेकिन उन्हों ने सीटी के ज़रिए संवाद करना सीख लिया था. ओरंगउटांन और बोनाई जैसे प्राइमेट्स यानी वानर जातियां, सीटी जैसी आवाज़ निकालते हैं.

इससे यही लगता है कि इंसानों ने पहले ऐसे ही आवाज़ें निकालना सीखा होगा. ओरांगउटान तो इंसान की तरह से चीख भी सकते हैं.

इतिहास को समझने में मदद

जिन समुदायों तक तरक़्क़ी की रोशनी नहीं पहुंच सकी, वो आज भी संवाद के शुरुआती तरीक़े यानी सीटी बजाकर एक दूसरे को संदेश देते हैं.

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इंसान की दुनिया में आज सीटी का इस्तेमाल भले ही बहुत कम हो गया हो लेकिन इसमें कोई शक़ नहीं जब तक इंसान का अपने वोकल कॉर्ड पर क़ाबू नहीं था, तब तक जंगली जानवरों के बीच इंसान ने सीटी भाषा का प्रयोग करके ही ख़ुद को महफ़ूज़ रखा था.

आज तरक़्क़ी की रौशनी दुनिया के अंधेरे कोनों में पहुंच रही है. हो सकता है कि हमॉन्ग जैसे समुदाय भी सीटी बजाना छोड़कर बातचीत करना सीख जाएं.

लेकिन, इससे पहले की ये जनजातियां बोलने की आदत डालें, इनके संवाद के तरीक़े को हमे सहेजकर रख लेना चाहिए. इससे इंसान के विकास के इतिहास को समझने में बहुत मदद मिलेगी.

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