कंप्यूटर प्रिंटर कैसे छोड़ते हैं सुराग?

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अगर हम आप से कहें कि आपका प्रिंटर आपकी जासूसी करा सकता है, तो क्या आप यक़ीन करेंगे? शायद नहीं.

हो सकता है आपको ये बात जानकर हैरानी हो या फिर आपको ये बात मज़ाक़ लगे. जब ये बात हमें पता चली, तो हमारे लिए भी यक़ीन करना थोड़ा मुश्किल था.

लेकिन जब पता चला कि अमरीका की केंद्रीय जांच एजेंसी एफ़बीआई ने कुछ प्रिंटआउट की मदद से एक केस का पर्दाफ़ाश किया है, तो यक़ीन करना ही पड़ा.

चलिए आपको भी बताते हैं क्या है ये पूरा माजरा. दरअसल कुछ ख़ुफ़िया सरकारी दस्तावेज़ प्रेस में लीक कर दिए गए थे.

ये दस्तावेज़ किसने लीक किए, यही पता लगाने के लिए एफ़बीआई के अधिकारी, एक सरकारी मुलाज़िम रियलिटी ले विनर के घर पहुंचे.

विनर ने नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी यानी एनएसए की एक रिपोर्ट, 'द इंटरसेप्ट' नाम की एक वेबसाइट को लीक कर दी थी. जैसे ही ये स्टोरी छपी हंगामा हो गया.

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प्रिंटर का सीरियल नंबर

अब सवाल ये था कि आख़िर पता कैसे चला कि इन दस्तावेज़ का प्रिंट निकाला कहां से गया. दरअसल जो दस्तावेज़ एफ़बीआई के हाथ लगे थे, उन पर कुछ पीले धब्बे थे.

हालांकि नंगी आंख से इन बिंदुओं को देख पाना आसान नहीं था, लेकिन इन बिंदुओं से एक खास तरह का कोड बन रहा था.

इसे डिकोड करने पर पता चला कि इन बिंदुओं की मदद से दस्तावेज़ के प्रिंट होने की तारीख और वक्त दोनों छपे हुए थे.

साथ ही प्रिंटर का सीरियल नंबर भी इस पर छपा हुआ था. बहुत से कलर प्रिंटर छपाई के दौरान इस तरह के धब्बों के ज़रिए कोड नंबर जेनरेट करते हैं.

लेकिन आम इंसान इससे बेख़बर होता है.

इन डॉट्स को सबसे पहले पकड़ने वाले ब्रिटिश रिसर्चर टेड हेन का कहना है कि जब उन्होंने इन दस्तावेज़ों को बड़ा करके देखा, तो, ये बिंदु बिल्कुल साफ़ नज़र आ रहे थे.

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छुपी हुई जानकारी

एक और सिक्योरिटी रिसर्चर रॉब ग्राहम का कहना है कि उन्होंने इन धब्बों को ग़ौर से पढ़ने पर पाया कि उस पेज पर प्रिंट होने की तारीख, घंटे, मिनट और नंबर सब कुछ लिखा हुआ था.

लेकिन सब कुछ कोड की शक्ल में लिखा था. और भी बहुत से सिक्योरिटी रिसर्चर इन बिंदुओं को समझने की कोशिश कर रहे थे. वो सब भी इसी नतीजे पर पहुंचे.

इलेक्ट्रॉनिक फ़्रंटियर फ़ाउंडेशन के मुताबिक़ प्रिंटआउट्स पर इस तरह के धब्बे बहुत सालों से छपते आ रहे हैं. उनके पास ऐसे प्रिंटर की फेहरिस्त मौजूद है.

इलेक्ट्रॉनिक फ़्रंटियर फ़ाउंडेशन के पास ऐसे ऑनलाइन टूल हैं, जिनके ज़रिए ये पता लगाया जा सकता है कि कोड में क्या जानकारी छुपी हुई है.

ये कोड सिर्फ़ दस्तावेज़ों पर ही पोशीदा नहीं होते. बल्कि पूरी दुनिया में कुछ देशों के नोटों पर भी इस तरह के कोड छपे होते हैं जिन्हें 'फ़ाइव प्वॉइंट पैटर्न' कहा जाता है.

बहुत सी फ़ोटोकॉपी मशीन और स्कैनर में इस तरह के प्रोगाम, किसी तरह की जालसाज़ी से बचने के लिए लगाए जाते हैं. जो बैंक के नोटों पर छपे कोड को पढ़ने पर उसकी कॉपी ही नहीं करते.

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ख़ास तरह की स्याही

खुद एनएसए इन डॉट्स से जुड़ी कई मिसालें पेश करते हुए कहता है कि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान कुछ जासूस जर्मनी से कुछ सामान लेने की कोशिश कर रहे थे.

जिसमें रेडियो और कुछ खास तरह की स्याही शामिल थी.

लेकिन इस सामान के लिफ़ाफ़े पर लिखे कोड को रास्ते में ही डिकोड कर लिया गया और जर्मन जासूसों का मिशन बर्बाद हो गया.

जानकारों का कहना है कि दूसरे विश्व युद्ध और शीत युद्ध के समय में इस तरह के ख़ुफ़िया संदेशों का ख़ूब इस्तेमाल किया गया था.

ऐसी रिपोर्ट भी हैं, जो बताती हैं कि सोवियत यूनियन के एजेंट जो पश्चिमी जर्मनी में रहकर काम करते थे, वो संदेश पहुंचाने के लिए ऐसी कोडेड भाषा का इस्तेमाल किया करते थे.

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कोड नंबर

अगर आप भी अपने साज़ो-सामान को सुरक्षित रखना चाहते हैं तो कुछ कंपनियां हैं जो आपके लिए इस तरह के बेहद ख़ुफ़िया संदेश तैयार कर सकती हैं.

ब्रिटेन की कंपनी अल्फ़ा डॉट यही काम करती है जो सूई की नोक के बराबर के धब्बों के साथ एक ख़ास तरह का सीरियल नंबर तैयार करती है.

अगर आपका कोई सामान गुम हो जाता है, तो पुलिस उस कोड नंबर से मिलान करके आप तक वो चीज़ पहुंचा सकती है.

हालांकि बहुत से कलर प्रिंटर इस तरह के कोड नहीं बनाते हैं. लेकिन जिस तरह से वो प्रिंटिंग के दरमियान स्पेस छोड़ते हैं उससे भी कई अहम जानकारियां मिल सकती हैं.

यूनिवर्सिटी ऑफ सरे में सिक्योरिटी एक्सपर्ट के तौर पर काम करने वाले एलेन वुडवर्ड का कहना है कि पेज पर छोड़ा जाने वाला व्हाइट स्पेस गुप्त मैसेज डिकोड करने में काफी मददगार साबित होता है.

लेकिन व्हाइट स्पेस के ज़रिए किसी मैसेज को पढ़ना ऐसा ही है, जैसा कि बर्फ़ीले तूफ़ान में किसी पोलर बियर को ढ़ूंढना. दस्तावेज़ के ज़रिए उसे लीक करने वाले तक पहुंचने के और भी बहुत से तरीक़े हैं.

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अमरीका में सूचना का अधिकार कानून

इस बात को लेकर भी बहस शुरू हो गई है कि किसी दस्तावेज़ को प्रिंट करने वाले की जानकारी के बग़ैर इस तरह कोड भाषा में जानकारी दूसरों तक पहुंचाना सही है या नहीं.

बहुत से जानकार तो इसे मानव अधिकार के ख़िलापफ़ बताते हैं. यहां तक कि प्रिंटर कंपनियों के ख़िलाफ़ करीब 45 हज़ार शिकायतें भी दर्ज हो चुकी हैं.

लेकिन इसके बावजूद कुछ जानकार इसे कुछ हद तक सही मानते हैं.

अमरीका में सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी के मुताबिक़, कैनन, ज़ीरॉक्स, ब्रदर, कैसियो, एचपी, कोनिका, मिनोल्टा, मीता, रिकोह और शार्प वो कंपनिया हैं, जिन्होंने अपने हर प्रिंटर में कोड डालने की अमरीकी सरकार की बात मानी है.

यानी इन कंपनियों के प्रिंटर से निकले दस्तावेज़ों का पीछा करके पता लगाना अमरीकी एजेंसियों के लिए बाएं हाथ का खेल है.

तो, अगली बार जब आप अपने दफ़्तर के प्रिंटर से किसी निजी दस्तावेज़ का प्रिंट निकालें, तो याद रखें, आपकी कंपनी को इसकी ख़बर हो सकती है.

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