रोज़मर्रा की आदतें जो बताती हैं आदमी की पहचान

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हमारा रहन-सहन, पहनना-ओढ़ना, खाना-पीना यहां तक कि हमारी पसंद ना पसंद बिना किसी के पूछे हमारे किरदार को बयां कर देते हैं.

मिसाल के लिए अगर किसी को चटख रंग पसंद हैं, तो माना जाता है कि वो शख़्स ज़िंदादिल है. उसे रंगीनियां पसंद हैं.

जिसे हल्के रंग पसंद हैं जैसे कत्थई, काला या कोई भी ऐसा रंग जो शोख़ ना हो, तो माना जाता है कि वो शख्स दिमाग़ी तौर पर अपनी उम्र से ज़्यादा बड़ा है.

इसी तरह जो लोग हर बात का ख़्याल करके तोल-मोल कर अपनी बात कहते हैं उनके बारे में माना जाता है कि वो अच्छी सेहत वाले होते हैं. और रिश्तों को बखूबी निभाते हैं.

वहीं बेबाक लोग ज़्यादा खुश मिज़ाज और खुले दिल वाले होते हैं. वो सपनों की ऊंची उड़ान भरते हैं.

इस बात से तो कोई इनकार कर ही नहीं सकता कि ऐसे लोगों के दोस्त बहुत होते हैं.

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सौ ख़ूबियां

मोटे तौर पर तो इन सब बातों को सही माना जा सकता है. लेकिन हाल ही में हुई स्टडी बताती हैं कि ये बातें पूरी तरह से सही नहीं हैं. ज़िंदगी में मिलने वाली बहुत सी चुनौतियां भी हमारी आदतों को बदल देती हैं. नए तजुर्बों के जो नतीजे सामने आए हैं वो चौंकाने वाले हैं.

अमरीका के ओरेगोन में 800 लोगों पर एक तजुर्बा किया गया. इसमें उनसे उनकी शख्सियत को बताने वाली 100 ख़ूबियों के बारे में पूछा गया.

इनसें ये भी पूछा गया कि वो कैसे उठते-बैठते हैं? कैसी भाषा का प्रयोग करते हैं? अक्सर उनका मूड कैसा रहता है? वगैरह. तजुर्बे में भाग लेने वाले ज़्यादार लोग 51 साल की उम्र वाले अंग्रेज़ थे. इन लोगों ने जो जवाब दिए थे, उन्हीं जवाबों को चार साल बाद दोबारा इनसे पूछा गया.

इस बार पूछा गया कि इन चार सालों में कौन से 400 ऐसे काम हैं जो उन्हें ने सबसे ज़्यादा किए. इसमें क़िताब पढ़ने से लेकर नहाते हुए गाने तक की आदतें शामिल थीं.

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ख़ुशगवार रिश्ता

पाया गया कि बेबाक लोगों ने ज़्यादातर वक़्त पार्टी प्लान करने, बार में शराब पीने और ज़्यादा पैसा कमाने के तरीक़ों के बारे में बात करके, या ड्राइविंग के दौरान फ़ोन पर बात करने में बिताया.

जबकि इन चार सालों में अंतर्मुखी लोगों की आदतों में थोड़ा बदलाव आया. जो काम वो चार साल पहले करते थे, अब वो उसी काम से दूर रहने लगे. बल्कि इन चार सालों में उनकी आदतों में और नए काम जुड़ गए. जैसे कपड़े इस्त्री करना, बर्तन धोना, बच्चों के साथ खेलना वग़ैरह.

हो सकता है ये काम उन्हों ने इसलिए शुरू किए हों, क्योंकि वो सभी के साथ एक ख़ुशगवार रिश्ता बनाए रखना चाहते हैं.

इन सब आदतों के अलावा एक दिलचस्प आदत उनकी शख्सियत का हिस्सा बन गई. वो ये कि ये लोग नहाते हुए या कार चलाते हुए गुनगुनाने लगे.

बिंदास लोगों के बर्ताव में भी थोड़ा सा बदलाव आया. जैसे अपनी बेबाकी में पहले वो अगर किसी को कुछ कह बैठते थे उस आदत से वो परहेज़ करने लगे.

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देशों और संस्कृति

अपने गुस्से पर क़ाबू करने लगे. दूसरों का मज़ाक़ बनाना बंद कर दिया. बल्कि क़िताबे पढ़ना, संगीत सुनना, कलात्मक काम करना उनकी आदतों में शामिल हो गया.

यही नहीं उनकी खान-पान की आदतों में भी बदलाव आया. अगर वो पहले ज़्यादा मिर्च-मसाले पसंद करते थे तो बाद में उन्हों ने कम मिर्च मसाले खाना शुरू कर दिया.

इस स्टडी के नतीजे बेहद दिलचस्प थे. लेकिन ये एक ही देश के एक इलाक़े में किया गया तजुर्बा था. इसे बाक़ी दुनिया के लिए मिसाल नहीं माना जा सकता. हालांकि एक मोटा अंदाज़ा ज़रूर हम लगा सकते हैं. इन्हीं नतीजों की बुनियाद पर दुनिया के बहुत से देशों और संस्कृति के लोगों के साथ भी ये तजुर्बे किए गए.

कुछ आदतों को छोड़ कर लगभग सभी लोगों का बर्ताव कमोबेश एक जैसा था. तो कुछ में अलग-अलग जगह पर थोड़े बदलाव थे.

हालांकि पहले जो स्टडी की गई थी, उसमें किसी शख़्स के किरदार की कुछ ख़ासियतों के बारे में ही पता किया गया था. लेकिन बाद में इस रिसर्च का दायरा बढ़ा दिया गया.

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सेल्फ़ी का इतिहास

ऑनलाइन ट्रोलिंग

जैसे ख़ुद ही अपनी तारीफ़ों के पुल बांधने वालों को भी इसका हिस्सा बनाया गया. दिमाग़ी तौर पर बीमार लोगों की आदतें कैसी होती हैं. वो किस तरह से लोगों के साथ रिश्ता बनाते हैं, इस पर भी रिसर्च की गई.

पाया गया कि दिमाग़ी तौर पर अस्थिर लोगों को उतनी आसानी से दबाव में नहीं लाया जा सकता, जितना कि हम समझते हैं. बल्कि वो ज़्यादा देर तक आंखें मिलाकर बातें करते हैं. वो चीज़ों को समझने की कोशिश करते हैं.

वहीं अगर बात करें दिल में कपट रखने वालों की, तो देखा गया कि ऐसे लोग ऑनलाइन ट्रोलिंग में काफ़ी दिलचस्पी लेते हैं. एक और स्टडी में पाया गया है कि जिन लोगों की शख्सियत में निगेटिविटी ज़्यादा होती है वो देर रात तक जागते हैं और सुबह देर तक सोते हैं.

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सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग पर दिल्ली की नाज़िया ने खुलकर बात रखी.

सेल्फी पोस्ट

जैसे अपना गुणगान करने वाले ज़्यादातर लोग अक्सर देर रात में ली गई सेल्फी पोस्ट करते हैं. इसी तरह कपट रखने वाली महिलाएं भी अपनी शख्सियत का असली चेहरा छुपा कर ऐसा पहलू पेश करती हैं, जिससे सामने वाला खुश हो.

वो ये सब अपने मतलब के लिए करती हैं. इस तरह के रिसर्च से अलग-अलग तरह के लोगों को जानने का मौक़ा तो मिलता ही है. साथ ही सेहत को लेकर चलाई जाने वाली बहुत सी मुहिम में भी इनसे मदद मिलती है.

क्योंकि इस तरह के तजुर्बों में जब लोगों से सवाल पूछे जाते हैं, तो वो बिना किसी झिझक के अपनी बात सामने रखते हैं. साथ ही जब इन तजुर्बों की रिपोर्ट सामने आती हैं.

लोग उन्हें पढ़ते हैं, तो उनकी समझ बढ़ती है. वो पहले के मुक़ाबले सामने वालों को ज़्यादा एडजस्ट करने लगते हैं. उनमें एक खास तरह की सहनशीलता भी आती है.

अगर किसी की कोई आदत पसंद नहीं भी होती, तो, लोग उसे ये जानकर बर्दाश्त करते हैं कि, ये आदत उसकी शख़्सियत का हिस्सा है.

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