दालचीनी की इस ख़ुशबू में कहीं ज़हर तो नहीं!

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कहते हैं कि ख़ूबसूरती से सावधान रहना चाहिए. कई बार उससे ख़तरा भी हो सकता है.

अक्सर ऐसा होता है कि तमाम ख़ूबियों वाली चीज़ में कुछ ऐसी ख़ामी होती है जो जानलेवा हो सकती है.

ऐसी ही एक चीज़ है जिसका नाम है टोनका बीन. असल में ये एक बीज होता है जो दक्षिण अमरीका में अमेज़न नदी की घाटी में पाए जाने वाले विशाल पेड़ों का होता है. इस बीज को लाने पर अमरीका और यूरोप के कई देशों में पाबंदी लगी हुई है. लेकिन ये मशहूर खानसामों के बीच इतनी लोकप्रिय है कि इसकी तस्करी होती है.

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बड़े रेस्तरां में इसका जमकर इस्तेमाल होता है. इसे पेस्ट्री, केक, वनीला आइसक्रीम या सिरप में मिलाया जाता है. इसकी खुशबू इतनी बढ़िया होती है कि खाने को स्वाद की ऊंची पायदान पर पहुंचा देती है.

कई लोग तो कहते हैं कि टोनका बीन्स दुनिया की सबसे स्वादिष्ट चीज़ है. हालांकि इन डिब्बाबंद बीजों को खोलें तो सबसे पहले जो बू आती है वो लकड़ी पर की जाने वाली पॉलिश जैसी महसूस होती है.

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बड़ी किशमिश जैसे दिखने वाले इन टोनका बीन्स के दीवाने अमरीका और यूरोप के कई शेफ हैं. न्यूयॉर्क के मशहूर होटल ल बर्नार्डिन के हेड पेस्ट्री शेफ थॉमस रक्वेल कहते हैं कि थोड़ी मात्रा में लेने पर इससे नुक़सान नहीं होता.

असल में टोनका बीन्स इसलिए बदनाम हैं क्योंकि इसके बारे में कहा जाता है कि इसे खाकर कई जानवरों की मौत हो गई. कई इंसान गंभीर रूप से बीमार हो गए.

अमरीका में टोनका बीन्स खाना और बेचना 1954 से ही प्रतिबंधित है. जिस खाने-पीने के सामान में टोनका बीन्स मिली होती हैं, उसे मिलावटी माना जाता है.

इतनी पाबंदियों के बावजूद अमरीका के तमाम रेस्तरां और होटलों में इसका इस्तेमाल होता है. कई बार इन ठिकानों पर छापेमारी भी होती है, ताकि टोनका बीन्स का इस्तेमाल रोका जा सके. आज की तारीख़ में अमरीका में दुनिया में सबसे ज़्यादा टोनका बीन्स इस्तेमाल होती हैं.

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टोनका की ख़ुशबू का राज़ है, इसमें पाया जाने वाला केमिकल 'कूमरिन'. कूमरिन से ही इसे वो स्वाद और ख़ुशबू मिलती है, जिसके लिए टोनका बीन्स मशहूर हैं. हालांकि कूमरिन, क़ुदरती तौर पर कई पेड़-पौधों, फूल-पत्तियों में पाया जाता है. जैसे के घास, लैवेंडर, चेरी और दालचीनी. आपने भी इसकी ख़ुशबू महसूस की होगी, बग़ैर ये जाने कि ये कूमरिन नाम के केमिकल की ख़ुशबू है.

टोनका बीन्स से पहली बार कूमरिन को 1820 में अलग किया गया था. इस केमिकल को ये नाम टोनका के पेड़ के कैरीबियन नाम कूमारू से मिला.

बाद में एक अंग्रेज केमिस्ट ने इसे लैब में भी बनाने का फॉर्मूला ढूंढ निकाला. 1940 के दशक तक आते-आते केमिकल कूमरिन को बनाने का काम इतने बड़े पैमाने पर हो रहा था कि ये बेहद सस्ता पड़ने लगा. क़ुदरती वनीला की जगह इसी का चॉकलेट मिठाइयों और कॉकटेल में इस्तेमाल होने लगा था. यहां तक कि वनीला एसेंस और सॉफ्ट ड्रिंक में भी कूमरिन मिलाया जाने लगा था. तंबाकू में भी लोग इसे मिलाकर उसे नई ख़ुशबू देकर बेच रहे थे.

इसी दौरान हुए एक तजुर्बे में पता चला कि कूमरिन ज़हरीला भी होता है. महज़ पांच ग्राम कूमरिन खाकर भेड़ की मौत हो जाती है. कई कुत्तों और चूहों पर हुए टेस्ट में भी कूमरिन की वजह से उनकी मौत हो गई. इसी के बाद टोनका बीन्स और कूमरिन पर पाबंदी लगा दी गई.

लेकिन, प्रतिबंध के बावजूद इनका इस्तेमाल जारी रहा.

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अमरीका के न्यूयॉर्क स्थित कॉर्टन रेस्तरां के पॉल लिब्रांट कहते हैं कि सबको मालूम है कि टोनका बीन्स कहां मिलेंगे. ये हाल तब है जब अमरीकी सरकार ने दस साल पहले ही टोनका बीन्स के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर अभियान चलाया था.

शिकागो के रेस्टोरेंट मालिक ग्रांट एकेज़ बताते हैं कि अक्सर फूड ऐंड ड्रग्स डिपार्टमेंट के अधिकारी होटल और रेस्तरां में छापे मारकर टोनका बीन्स तलाशते थे.

अमरीका के पड़ोसी देश मेक्सिको में आज भी टोनका बीन्स का खुलेआम इस्तेमाल होता है. लोग वनीला की ख़ुशबू पाने के लिए इसे इस्तेमाल करते हैं.

खाने में भले इस्तेमाल न किया जा सके, मगर कूमरिन को तंबाकू और कॉस्मेटिक्स में मिलाने पर कोई रोक नहीं है. जबकि ये आसानी से हमारी चमड़ी में पैबस्त हो जाता है. ज़हरीला होने के बावजूद कूमरिन को धड़ल्ले से डिटर्जेंट पाउडर, शॉवर जेल, हाथ धोने के साबुन और डिओडरेंट में मिलाया जा रहा है. यहां तक कि मशहूर ब्रांड शनल के कोको मैडेमोज़ील और जूप नाम के सेंट में भी कूमरिन मिलाया जाता है. कई कारोबारी तो इसे ई-सिगरेट में भी मिलाते हैं.

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इस बात की पूरी संभावना है कि कूमरिन किसी न किसी रूप में आपके घर में मौजूद होगा. क्योंकि ये दालचीनी की छाल में भी होता है. असली दालचीनी में इसकी बड़ी कम मात्रा होती है. मगर आज की तारीख में नक़ली दालचीनी ख़ूब बिकती है. इसमें कूमरिन की मात्रा असली दालचीनी के मुक़ाबले 25 हज़ार गुना ज़्यादा होती है. ये आपके लिए नुक़सानदेह साबित हो सकती है.

खाने-पीने के कई सामानों में दालचीनी का इस्तेमाल होता है. अब अगर ये नक़ली वाली दालचीनी है, तो ये आपके लिए ज़हरीली साबित हो सकती है. कई यूरोपीय देशों में इस नक़ली दालचीनी पर पाबंदी लगी हुई है.

आख़िर कूमरिन नाम का ये केमिकल कितना ख़तरनाक हो सकता है?

कम से कम दस्तावेज़ों में तो इससे किसी इंसान की मौत की घटना नहीं दर्ज हुई है. इसी वजह से कई लोग इस पर से पाबंदी हटाने की मांग भी कर रहे हैं.

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कूमरिन हमारे जिगर के लिए घातक हो सकता है. हमारा लिवर, शरीर में आने वाले ज़हरीले केमिकल को ख़ून से अलग करने का काम करता है. इसमें बीमारी से लड़ने की ग़ज़ब की क्षमता होती है. लेकिन लिवर के कमज़ोर होने से हमारी सेहत का कबाड़ा हो सकता है. और कूमरिन के बारे में कहा जाता है कि ये सीधे लिवर पर ही अटैक करता है. लंबे वक़्त तक इसका इस्तेमाल हमारे जिगर के लिए घातक हो सकता है.

जर्मनी के रसायनशास्त्री डिर्क लाकेनमायर कहते हैं कि लंबे वक़्त तक अगर हम थोड़ी-थो़ड़ी तादाद में भी कूमरिन इस्तेमाल करते रहे हैं, तो ये हमें नुक़सान पहुंचा सकता है. उन्होंने खाने पीने के सामान में कूमरिन का पता लगाने का नया तरीक़ा ढूंढ निकाला है.

इंसान के लिए कितनी तादाद में कूमरिन खाना सुरक्षित है?

कुछ लोगों का मानना है कि रोज़ाना एक टोनका बीन्स का एक चौथाई हिस्सा खाने से कूमरिन आपके लिए नुक़सानदेह नहीं होगा. या रोज़ाना एक दालचीनी का टुकड़ा खाने से भी इससे सेहत पर बुरा असर नहीं पड़ेगा.

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लेकिन कई लोगों के लिए ये तादाद बेहद कम है. वो जानवरों की मिसाल देते हैं कि वो तो आसानी से अपने शरीर से कूमरिन को निकाल फेंकते हैं. क्योंकि जानवर तो क़ुदरती तौर पर कई ऐसी चीज़ें खाते हैं, जिसमें कूमरिन अच्छी ख़ासी तादाद में मौजूद होता है. जैसे घास. जानवरों के शरीर में पाए जाने वाले एंजाइम इसे कम ख़तरनाक केमिकल में तब्दील कर देते हैं. इससे वो उन्हें नुक़सान नहीं करता.

इंसानों के शरीर में भी ऐसे एंजाइम होते हैं जो ये काम करते हैं. मगर कुछ केमिकल ऐसे भी हैं जो इसके उलट काम करते हैं.

90 के दशक में जर्मनी में ऐसा ही मामला सामने आया था. जब एक महिला को वारफारिन नाम की दवा लेने की वजह से कूमरिन का बुरा असर हो गया था. असल में वारफारिन नाम की ये दवा उन एंजाइम्स पर असर डाल रही थी, जो कूमरिन को दूसरे केमिकल में बदलने का काम करते हैं. इसी वजह से इस महिला की तबीयत कूमरिन के इस्तेमाल से बिगड़ गई थी.

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वारफारिन नाम की दवा 1920 के दशक में जानवरों पर कूमरिन के बुरे असर को देखने के बाद ईजाद की गई थी.

पूरी दुनिया में लिवर की बीमारी 2010 में दस लाख लोग मारे गए थे. कुल मौतों का ये महज़ 2 फ़ीसद था. ऐसे में इनमें से कितने लोग कूमरिन की वजह से मरे, इसका अंदाज़ा लगाना बेहद मुश्किल है.

हां, ये तय है कि कूमरिन नुक़सान करता है. इसका सावधानी से इस्तेमाल करने की ज़रूरत है.

तो अगली बार जब आपका साबका टोनका बीन्स या दालचीनी से पड़े, तो ज़रा सोच समझकर ही इस्तेमाल करें!

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