न्यूक्लियर ऊर्जा से जड़ी आशंकाओं से कैसे बचें?

न्यूक्लियर प्लांट इमेज कॉपीरइट Alamy

किसी भी देश को तेज़ी से तरक़्क़ी करने के लिए बिजली बेहद ज़रूरी है. जैसे भारत में बिजली की मांग, सप्लाई से बहुत ज़्यादा है. हम लोगों के ज़रूरत भर की बिजली नहीं बना पा रहे हैं.

साथ ही महंगा होता तेल-गैस और कोयले का घटता भंडार भी बिजली उत्पादन बढ़ाने की राह में चुनौती है.

इसीलिए भारत जैसे विकासशील देश एटमी बिजली बनाने पर ज़ोर दे रहे हैं. भारत ने इसके लिए अमरीका से 2008 में एटमी समझौता किया. जिसके बाद भारत को परमाणु ऊर्जा बनाने में काफ़ी मदद मिलेगी. हालांकि इससे पहले से ही भारत में कई एटमी प्लांट काम कर रहे हैं. हमने परमाणु बिजली बनाने के लिए रूस, अमरीका और फ्रांस जैसे देशों से करार भी किए हैं.

मगर, जहां पर भी एटमी प्लांट लगाए जा रहे हैं, वहां पर लोग इसका तगड़ा विरोध कर रहे हैं. मसलन तमिलनाडु में कुडनकुलम एटमी प्लांट लगाने का तगड़ा विरोध हुआ. वहीं महाराष्ट्र के जैतापुर में भी परमाणु ऊर्जा केंद्र बनाने का हिंसक विरोध हुआ.

इसकी सबसे बड़ी वजह है एटमी प्लांट से होने वाले ख़तरे. पूरी दुनिया ये मानती है कि न्यूक्लियर पावर प्लांट किसी हादसे की सूरत में बहुत बड़ा ख़तरा साबित हो सकते हैं. इसकी सबसे ताज़ा मिसाल है, जापान के फुकुशिमा में एटमी प्लांट में हुआ हादसा.

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption दशकों से लोग न्यूक्लियर प्लांट के आस-पास के क्षेत्र में रह रहे हैं.

11 मार्च 2011 को आई सुनामी के बाद फुकुशिमा न्यूक्लियर प्लांट की दीवारें समुद्र की लहरों से ढह गईं. प्लांट की बिजली काट दी गई. प्लांट के न्यूक्लियर रिएक्टर को ठंडा करने वाले डीज़ल जनरेटर को समंदर की लहरें बहा ले गईं.

नतीजा ये हुआ कि फुकुशिमा प्लांट ठप पड़ गया. इसके तीन रिएक्टर मेल्टडाउन के शिकार हुए, जिससे इसके इर्द-गिर्द रेडिएशन का ख़तरा बढ़ गया. एहतियातन क़रीब एक लाख लोगों को प्लांट के आस-पास से हटाया गया. अब इस प्लांट की सफाई का काम चल रहा है. जिसमें क़रीब 100 अरब डॉलर ख़र्च आने का अंदाज़ा है.

फुकुशिमा हादसे के बाद से पूरी दुनिया में न्यूक्लियर पावर के ख़िलाफ़ उठती आवाज़ें तेज़ हो गईं. भारत में भी एटमी प्लांट बनाने का विरोध तेज़ हो गया. फुकुशिमा से हजारों किलोमीटर दूर हवाई द्वीप के बाशिंदों को भी रेडिएशन का ख़ौफ़ सताने लगा.

जापान के पड़ोसी देश दक्षिण कोरिया ने एटमी प्लांट में निवेश को कम करने का फ़ैसला किया. वहीं जर्मनी ने तो 2022 तक देश के सभी एटमी प्लांट बंद करने का फ़ैसला ले डाला.

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption कुछ ऐसे भी हैं जो न्यूक्लियर एनर्जी का समर्थन करते हैं. तेहरान की यह छात्रा उनमें से ही एक है जो ईरान में न्यूक्लियर प्लांट लगाने का समर्थन कर रही है.

बहुत से जानकार इसके बाद एटमी ऊर्जा के भविष्य पर सवाल उठाने लगे. भारत में सरकार जिस तरह एटमी ऊर्जा पर ज़ोर दे रही थी, उस पर भी सवाल उठे.

यूरोप के न्यूक्लियर एक्सपर्ट विलियम मैगवुड कहते हैं कि फुकुशिमा हादसे के बाद पूरी दुनिया में एटमी ऊर्जा को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं.

आख़िर 21वीं सदी में न्यूक्लियर एनर्जी का भविष्य क्या है?

1950 के दशक में एटमी ऊर्जा को दुनिया की बिजली की बढ़ती ज़रूरतों का हल माना जा रहा था. विज्ञापनों के ज़रिए बताया जा रहा था कि एटमी बिजली ही भविष्य का ईंधन होगी.

लेकिन आज की तारीख़ में बहुत से देशों में एटमी प्लांट का कड़ा विरोध हो रहा है. हाल ही में स्विटज़रलैंड में लोगों ने एटमी ऊर्जा के इस्तेमाल के ख़िलाफ़ वोट किया.

लेकिन, बहुत से देश ऐसे भी हैं जिनकी बिजली की ज़रूरत का बड़ा हिस्सा एटमी बिजली से पूरा होता है. जैसे कि फ्रांस में 75 फ़ीसद बिजली, न्यूक्लियर एनर्जी से आती है. ब्रिटेन, रूस और अमरीका भी बड़ी तादाद में एटमी बिजली बनाते हैं. चीन में जल्द ही 5 नए एटॉमिक रिएक्टर काम करना शुरू कर देंगे.

आगे चलकर चीन का इरादा 8 नए रिएक्टर लगाने का है. ब्रिटेन भी हिंकले प्वाइंट सी के नाम से 3.2 गीगावाट का एटमी प्लांट शुरू करने वाला है. ये ब्रिटेन का सबसे बड़ा बिजली का कारखाना होगा.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

दुनिया में बहुत से लोग ऐसे हैं जो एटमी ऊर्जा की वक़ालत करते हैं. इनका कहना है कि सिर्फ़ सोलर या विंड एनर्जी से बिजली की ज़रूरतें नहीं पूरी की जा सकतीं. कोयले से बिजली बनाना पर्यावरण के लिए नुक़सानदेह है. ऐसे में एटमी बिजली ही भविष्य में इंसान की ऊर्जा की ज़रूरतें पूरी कर सकती है.

न्यूक्लियर एनर्जी की वक़ालत करने वाले कहते हैं कि पनचक्की या सोलर प्लांट लगाने के लिए बहुत ज़मीन चाहिए. फिर ये प्लांट बहुत जल्दी ख़राब हो जाते हैं. इन्हें लगाने और चलाने में काफ़ी पैसा लगेगा.

इनके मुक़ाबले एटमी प्लांट 50 से 80 या 100 साल तक काम करते रहते हैं. इनसे लंबे वक़्त तक सस्ती बिजली बनाई जा सकती है.

मगर न्यूक्लियर एनर्जी का प्लांट लगाना इतना आसान भी नहीं. इसमें तकनीकी और आर्थिक चुनौतियां आती हैं. पहले तो प्लांट लगाने में बहुत ख़र्च आता है. फिर इसके ख़तरों से निपटना भी बड़ी चुनौती होता है. जैसे फुकुशिमा प्लांट में हुआ. रिएक्टर ठंडे न होने से विकिरण फैल गया. हालांकि अब एटमी ऊर्जा की नई तकनीक पर काम हो रहा है. जिसमें रिएक्टर को ठंडा करने के नए तरीक़े ईजाद करने की कोशिशें हो रही हैं. मगर अभी उन पर पूरी तरह ऐतबार नहीं किया जा सकता.

आज दुनिया एटमी प्लांट का विरोध इसलिए भी करती है क्योंकि इसमें भारी रक़म लगानी पड़ती है. एटमी प्लांट लगाने में बहुत ख़र्च आता है. इससे बनने वाली बिजली, गैस के मुक़ाबले महंगी पड़ती है. इसीलिए आज की तारीख़ में निवेशक गैस पावर प्लांट लगाने में ज़्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं. ये सस्ता भी पड़ता है और जल्दी से प्लांट काम करना भी शुरू कर देता है. हालांकि गैस पावर प्लांट से पर्यावरण को नुक़सान होता है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

न्यूक्लियर एनर्जी के हामी मानते हैं कि सरकारों को चाहिए कि वो बिजली बनाने वालों पर ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन का टैक्स लगाएं. इससे लोग न्यूक्लियर प्लांट लगाने में दिलचस्पी लेने लगेंगे. फिर एटमी बिजली सस्ती भी होनी चाहिए. तभी निवेशक, न्यूक्लियर प्लांट में पैसे लगाने को राज़ी होंगे.

आज एटमी ऊर्जा का बाज़ार ठंडा है. रिएक्टर के ख़रीदार नहीं. भारत, चीन और फ्रांस जैसे कुछ गिने-चुने देशों को छोड़ दें, तो ज़्यादातर देशों में एटमी प्लांट का विरोध होता है. इसकी वजह इसकी क़ीमत भी है और इससे होने वाला रेडिएशन का ख़तरा भी.

फिर एटमी प्लांट लगाने का काम भी बड़ा पेचीदा है. इसके जवाब में कहा जा रहा है कि छोटे-छोटे न्यूक्लियर रिएक्टर विकसित किए जाने चाहिए, ताकि इन्हें आसानी से लगाकर प्लांट चालू किया जा सके. मगर इन्हें लाने-ले जाने के दौरान रेडिएशन के ख़तरों से निपटने का ख़र्च भी बढ़ जाएगा.

आज एटमी ऊर्जा के क्षेत्र में काम करने वाले लोग नई तकनीक ईजाद करने में लगे हैं, ताकि इसकी लागत कम की जा सके.

किसी एटमी प्लांट की उम्र 50 से 100 साल तक होती है. इसके बाद इसके रेडियोएक्टिव पदार्थों को नष्ट करने और ठिकाने लगाने की चुनौती होती है. जानकार मानते हैं कि रेडियोएक्टिव छड़ों को ज़मीन में दफ़न कर देना सबसे अच्छा विकल्प है. मगर एटमी प्लांट को उखाड़ने और इसका सामान नष्ट करना भी बड़ी चुनौती होता है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

कुछ जानकार कहते हैं कि इसमें रेडिएशन का शिकार होने का ख़तरा रहता है. इससे तकनीक की मदद से निपटा जा सकता है. हम इस काम में रोबोट की मदद ले सकते हैं.

मगर आज सबसे बड़ी चुनौती है एटमी बिजली को सस्ता बनाने की. जब तक एटमी प्लांट लगाने का ख़र्च कम नहीं होगा. नई तकनीक से एटमी प्लांट सुरक्षित नहीं होंगे, तब तक इन्हें लेकर शंका का ऐसा ही माहौल बना रहेगा.

ये बात तो तय है कि सोलर या विंड एनर्जी से तरक़्क़ी के लिए ज़रूरी सारी बिजली नहीं बनाई जा सकती. इसके लिए एटमी बिजली ही सबसे अच्छा साधन है. मगर, ज़रूरी है कि इससे जुड़े ख़तरे और ख़र्च कम किए जाएं.

भविष्य भले ही न्यूक्लियर एनर्जी का है. पर उस भविष्य में निवेश से पहले तमाम आशंकाओं को दूर किए जाने की ज़रूरत है.

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)