फ़ोटो फर्ज़ी है या असली, आप भी पकड़ें..

Image caption पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति जॉन एफ़ केनेडी की हत्या मामले में यूएस मैरीन ऑस्वाल्ड की इस तस्वीर को जांच कर्ताओं ने नकली मान लिया था. बाद में इसे असली पाया गया

कहते हैं एक तस्वीर हज़ार शब्दों के बराबर होती है. जहां हमारे शब्द कमज़ोर पड़ जाते हैं वहां एक तस्वीर उस कमी को पूरा कर देती है.

शब्दों की जादूगरी से बहुत बार हम झूठ को भी सच का जामा पहनाने में कामयाब हो जाते हैं. लेकिन तस्वीर के साथ ये मुमकिन नहीं.

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तस्वीरें सच बोलती हैं. लेकिन अगर तस्वीर के साथ छेड़छाड़ कर दी जाए तो ये इंसान की आंखों में धूल झोंक सकती है. सोशल मीडिया के इस दौर में कई बार तस्वीरों से छेड़खानी करके अफ़वाहें फैलाई जाती हैं.

ज़रूरी है कि हम असली और नक़ली तस्वीरों में फ़र्क करना सीखें.

तस्वीरों में कैसे छेड़खानी की जाती है. किस तरह दो अलग तस्वीरों को मिलाकर नई तस्वीर ही बना दी जाती है, इसके तमाम नुस्खे होते हैं.

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आंखों में प्रतिबिम्ब से पहचान

चालबाज़ी कि ये तरकीब पता चल जाए तो बड़ी आसानी से इस झूठ को पकड़ा जा सकता है.

रिसर्च बताती हैं कि हम चाहे कितने ही दावे कर लें कि हम धोखाधड़ी को पहली नज़र में ही पकड़ लेते हैं. लेकिन सच तो ये है कि असली और नक़ली फ़ोटो के बीच फ़र्क करने में हम सभी कमज़ोर हैं.

डिजिटल फोरेंसिक के एक्सपर्ट और इमेज एनॉलिसिस्ट डॉ. हानी फरीद ऐसी बहुत सी तकनीक बताते हैं, जिनकी मदद से फ़ोटो के असली या नकली होने की पहचान की जा सकती है.

अगर किसी तस्वीर में दो लोग एक साथ खड़े हैं तो आपको इनकी आंखों में लाइट का अक़्स दिखाई देगा.

इसके अलावा लोकेशन, साइज़, रौशनी के रंग वगैरह से भी पता लगाया जा सकता है कि तस्वीर असली है या फिर असल तस्वीर से छेड़खानी करके उसे तैयार किया गया है.

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Image caption प्रतिबिम्ब के साथ मिलान करके भी तस्वीर की असलियत का पता लगाया जा सकता है

कान के रंग से असली की पहचान

फोटो जांचने का एक और तरीक़ा है. तस्वीर में मौजूद लोगों के कान का रंग. अगर सूरज उस शख्स के पीछे है, तो, उसके कान सामने से लाल रंग के दिखाई देंगे.

अगर रौशनी सामने से पड़ रही होगी तो फिर कान लाल रंग के नज़र नहीं आएंगे.

किसी फ़ोटो को जांचने में रिफ़्लेक्शन एक अहम भूमिका निभाता है. अगर किसी फ़ोटो के साथ छेड़छाड़ की गई है तो तस्वीर की कुछ चीज़ों पर रोशनी का प्रतिबिम्ब अलग-अलग दिखाई देगा.

आज नकली तस्वीरें एक आम आदमी की ज़िंदगी से लेकर सियासत की दुनिया तक में एक अहम भूमिका निभाती हैं.

प्रोफ़ेसर फरीद कहते हैं कि एक उम्मीदवार की फ़ोटो के साथ छेड़ छाड़ करके उसे बेहतर हालत में लाया जाता है. जबकि कुछ तस्वीरों में भीड़ में भी लोगों के चेहरों को तरह तरह से दिखाया जाता है ताकि लोगों को ये बताया जा सके कि उनका नेता किसी एक रंग या नस्ल के लोगों का नेता नहीं है.

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Image caption कुछ नकली तस्वीरों को पहचानना आसान होता है, जैसा कि ट्रंप की ये टाइम मैग्ज़ीन की कवर तस्वीर यूएस प्रेसिडेंशियल गोल्फ़ क्लब्स पर डाली गई थी.

असली तस्वीरों से छेड़छाड़

मिसाल के लिए अमरीका में साल 2004 के राष्ट्रपति चुनाव में रिपब्लिकन उम्मीदवार और वियतनाम जंग के अनुभवी जॉन कैरी को 1970 की एंटी-वॉर रैली में साथ बैठे हुए दिखाया था.

इसे एक जाने-माने अख़बार ने छापा था. ये तस्वीर इंटरनेट पर वायरल हो गई. बाद में पता चला कि ये तस्वीर लोगों को गुमराह करने के लिए थोड़ी छेड़-छाड़ के साथ छाप दी गई थी. दरअसल ये तस्वीर दो अलग-अलग तस्वीरों को मिलाकर बनाई गई थी.

तस्वीरों के साथ छेड़ छाड़ करने का चलन नया नहीं है. बीबीसी फ़्यूचर ने तो इस पर रिपोर्टिंग भी की थी.

बल्कि साल 2012 में जब अमरीका में सैंडी तूफ़ान की चर्चा आम थी उस वक़्त बहुत तरह की नकली तस्वीरें छापी जा रही थीं. इन तस्वीरों में एक वो तस्वीर भी थी जिसमें इस तूफ़ान का चक्र स्टेच्यू ऑफ़ लिबर्टी के ऊपर से गुज़र रहा है.

ऐसी तस्वीरों के लिए बीबीसी ने इस तूफ़ान की असली तस्वीरों की पहचान के लिए बहुत से तरीक़ों के बारे में बताया था.

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Image caption रोशनी के रास्ते में पड़ने वाली छाया से भी तस्वीरों की असलियत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है

तस्वीरों के साथ छेड़-छाड़ सिर्फ़ आम फोटो के साथ ही नहीं होती है बल्कि अमरीकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन की तस्वीर के साथ भी ये खेल हो चुका है.

किसी अन्य नेता की तस्वीर पर लिंकन का चेहरा चिपका कर उसे लिंकन का फोटो बना दिया गया. डिजिटल कैमरों और फोटो एडिटिंग सॉफ़्टवियर ने इसमें सबसे ख़तरनाक भूमिका निभाई है.

तस्वीरों से धोखा देने का खेल देश की सरकारे भी ख़ूब खेलती हैं. प्रोफेसर फरीद का कहना है इराक़, उत्तरी कोरिया, सीरिया जैसे देशों की तस्वीरें देखकर सरकारों को सुरक्षा बढ़ाए जाने संबंधी फ़ैसले लेने में मदद मिलती है. लिहाज़ा इन देशों की तस्वीरों की सच्चाई की पड़ताल करना बहुत ज़रूरी होता है.

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एडोब फोटोशॉप की साइट भी मददगार

मिसाल के लिए साल 2008 में ईरान ने मिसाइल लॉन्च की एक तस्वीर जारी की थी, जिसमें एक साथ कई मिसालों को उड़ते हुए दिखाया गया था.

जबकि असल में इस मौक़े पर एक मिसाइल चालू ही नहीं हो पाई थी. लेकिन किसी दूसरी फ़ोटो के साथ इसे एडिट करके सभी मिसाइलें एक साथ लॉन्च होते हुए दिखा दिया गया.

हलांकि डिफेंस एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट एजेंसी ने ऐसी तकनीक बनाई है जिससे फ़ोटो और वीडियो ख़ुद ही अपनी सच्चाई बयान करेंगे.

इसके लिए इज़िट्रू नाम की तकनीक को अपना लाइसेंस दिया है. ये एजेंसी अमेरिकी सेना के लिए तकनीक तैयार करती है.

हालांकि जानकार ख़ुद इस बात को मानते हैं कि नंगी आंख से फ़ोटी की सच्चाई को जांचना आसान नहीं है.

लेकिन फिर भी अगर आप बहुत जिज्ञासु हैं तो एडोब फोटोशॉप की साइट पर ऑन लाइन एक छोटे से क्विज़ की मदद से अपनी मुश्किल हल कर सकते हैं.

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केनेडी की हत्या और विवादित तस्वीर

प्रोफ़ेसर फरिद कहते हैं कि आम तौर हम असली को नक़ली और नक़ली को असली समझ बैठते हैं. हमें अपने अपनी समझ पर भरोसा इतना ज़्यादा होता है कि उसे ग़लत साबित करना भी मुश्किल होता है. लिहाज़ा कंप्यूटर की मदद से ही असली-नक़ली के मसले को सुलझाया जा सकता है.

फ़ोरेंसिक लैब एल्गोरिदम का फ़ॉर्मूला अपनाते हुए फ़ोटो के साथ छेड़छाड़ की बात को सही साबित करते हैं. हालांकि इसके अलावा और भी बहुत से तरीक़े अपनाए जाते हैं.

साल 1963 में अमरीकी राष्ट्रपति जॉन एफ़ केनेडी की हत्या कर दी गई थी. हत्या का इल्ज़ाम अमरीका के पूर्व मरीन ली हॉर्वे ऑस्वाल्ड पर लगा.

सबूत के तौर पर एक तस्वीर पेश की गई जिसमें पूर्व मरीन ऑस्वाल्ड के पिछवाड़े में एक गन के साथ खड़ा है. ये वही गन थी जिसका इस्तेमाल केनेडी की हत्या में हुआ था. लेकिन ली ने इस फ़ोटो का अपना मानने से ही इंकार कर दिया.

Image caption 2012 में हरिकेन सैंडी तुफ़ान की ये फर्ज़ी तस्वीर वायरल हुई थी

इसके बाद फ़ोटो की सच्चाई पर सवाल उठने के साथ ही हत्या को लेकर साज़िश की बात सामने आने लगी.

ये भी माना गया कि ऑस्वाल्ड को फंसाने के नज़रिए से ही इस फ़ोटो को तैयार किया गया था. क्योंकि जांचकर्ताओ ने फ़ोटो में बहुत से ऐसी बातें देखीं जिससे साफ़ ज़ाहिर होता था कि ये फ़ोटो असली नहीं है.

मिसाल के लिए फ़ोटो में जो और चीज़ें नज़र आ रही थी उनकी परछाई एक जैसी नहीं थी. सभी पर लाइट का रिफ़्लेक्शन अलग अलग था. ख़ुद ऑस्वाल्ड के चेहरे के साथ छेड़छाड़ नज़र आ रही थी. यहां तक कि गन की लंबाई और उसकी परछाई में भी फ़र्क़ नज़र आ रहा था.

लेकिन बाद में एडवांस तकनीक के साथ जब इस फ़ोटो पर रिसर्च की गई तो पता चला कि फ़ोटो के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं हुई थी. लिहाज़ा कहा जा सकता है कि कई बार हम सच को झूठ और झूठ को सच मान बैठते हैं.

फ़ोटो की क्वालिटी और उसका फॉर्मेट भी असली नक़ली की पहचान कराने में मददगार होता है. हरेक कैमरे की अपनी अलग ख़ूबी होती है.

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Image caption 2008 में ईरान ने मिसाइल परीक्षण किया था, जिसमें एक रॉकेट लांचर असफल हो गया था, जारी की गई तस्वीर में इसे हटाकर चौथी मिसाइल को उड़ता दिखा दिया गया

अलग कैमरे की तस्वीर का फ़ार्मेट भी अलग

मिसाल के लिए जब मोबाइल कैमरे से कोई फ़ोटो ली जाती है तो उसकी फ़ाइल जेपीजी फॉर्मेट में बनती है.

जबकि आईफ़ोन या पैनासोनिक के कैमरे से ली गई फ़ोटो की फ़ाइल का फ़ॉर्मेट अलग होता है. लिहाज़ा फ़ाइल की पैकेजिंग से भी पहचान करने में मदद मिलती है.

कई बार न्यूज़ एजेंसियां भी असली नक़ली के झांसे में आ जाती हैं. इसीलिए किसी फ़ोटो की इस्तेमाल करने से पहले उसकी सच्चाई की पड़ताल कर लेना बहुत ज़रूरी है.

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहाँ पढ़ें जो बीबीसी पर उपलब्ध है.

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