मौसम का मिजाज बिगड़ा तो बदल जाएगा बिज़नेस

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दुनिया की बदलती आबो-हवा या जलवायु परिवर्तन आपकी नौकरी, कारोबार और करियर पर असर डालने वाली है. हमारी इस बात को आप मज़ाक़ न समझें. तमाम नई रिसर्च और तजुर्बे खुलकर यही इशारा दे रहे हैं कि क्लाइमेट चेंज से करियर और कारोबार पर गहरा असर पड़ रहा है. बेहतर है वक़्त रहते इसके लिए तैयार हो जाएं.

असल में जब भी जलवायु परिवर्तन या क्लाइमेट चेंज की बात उठती है, हम इसे एक सियासी मसला समझ लेते हैं. कुछ और आगे बढ़ते हैं तो सोचते हैं कि धरती की बदली आबो-हवा से समंदर में पानी बढ़ जाएगा. ग्लेशियर पिघल जाएंगे, गर्मी बढ़ेगी और बारिश का चक्र बदलेगा.

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कोहरे का असर न केवल रेल यातायात पर पड़ा है बल्कि लोगों का स्वास्थ्य भी इससे अछूता नहीं है.

जलवायु परिवर्तन

दुनिया के तमाम हिस्सों में इस डर से निपटने के लिए काम भी हो रहा है. जैसे, अमरीका के मयामी शहर में पानी को साफ़ करने वाले कारखाने ऊंचे ठिकानों पर ले जाए जा रहे हैं. समुद्र की लहरों से बचाने वाली दीवारें ऊंची की जा रही हैं. शहर की कार पार्किंग को बाढ़ से निपटने लायक़ बनाया जा रहा है.

पर, ये तो वो ख़तरें हैं, जो धरती की आबो-हवा बदलने से ऊपरी तौर पर होते दिख रहे हैं. आज की तारीख़ में जलवायु परिवर्तन का असर कारोबार से लेकर सेहत तक पर पड़ रहा है. ऐसे में क्लाइमेट चेंज से सिर्फ़ शहरी विकास की योजनाएं बनाने वालों पर असर नहीं पड़ रहा है.

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सोशल मीडिया

बल्कि किसानों से सिविल इंजीनियर और डॉक्टरों से लेकर वित्तीय सलाहकारों तक के करियर पर जलवायु परिवर्तन का असर होता देखा जा रहा है. ज़ाहिर है कि क्लाइमेट चेंज का सीधा ताल्लुक़ आपके करियर से हो गया है. अमरीका के एंड्र्यू विंस्टन ने इस बारे में एक क़िताब लिखी है-The Big Pivot:Radically Practical Strategies for a Hotter, Scarcer and More Open World.

विंस्टन कहते हैं कि आज सभी को जलवायु परिवर्तन को समझने की ज़रूरत है. इसकी चुनौतियों के लिए ख़ुद को तैयार करने की ज़रूरत है. जैसे इन दिनों हर नौकरी में आपके सोशल मीडिया के हुनर के बारे में पड़ताल होती है. वैसे ही, आगे चलकर इस बात पर भी सवाल होंगे कि आप क्लाइमेट चेंज को कितना समझते हैं. इसके लिए कितना तैयार हैं.

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भूकंप की वजह से...

आज की तारीख़ में ये कहना मुश्किल है कि जलवायु परिवर्तन का हमारे ऊपर कितना और कैसा असर पड़ेगा. इसीलिए इसका अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल है कि इसका तमाम उद्योगों पर कैसा असर होगा. लेकिन, कुछ बदलाव तो आ रहे हैं. वो ज़ाहिर हैं. मसलन, क़ुदरती आफ़तों से निपटने वाले बीमा का प्रीमियम बढ़ गया है.

किसी एक जगह पर क़ुदरती आफ़त आने पर उसका असर दूर-दूर तक पड़ता है. मिसाल के तौर पर जापान में पिछले साल अप्रैल में आए भूकंप की वजह से ऑटोमोबाइल कंपनी टोयोटा को पूरी दुनिया में अपना उत्पादन घटाना पड़ा था.

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टोयोटा का मामला

वजह ये कि जिस इलाक़े में भूकंप आया था वहां पर टोयोटा को कल-पुर्ज़ों की सप्लाई करने वाली कंपनी का ठिकाना था. ज़लज़ले से ये सप्लाई ठप पड़ गई थी. इसका असर टोयोटा के पूरी दुनिया में स्थित कारखानों पर पड़ा. इसी तरह धरती की आबो-हवा बदलने से हमारी सेहत और सेहत से जुड़े कारोबार पर भी असर पड़ रहा है.

बढ़ती गर्मियों से बीमारियों की तस्वीर बदल रही है. ज़्यादा लोग मलेरिया और डेंगू की चपेट में आ रहे हैं. हाल ही में ज़ीका वायरस के ख़तरे ने भी इसके संकेत दिए. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़, धरती का तापमान बढ़ने से हर साल ढाई लाख लोगों की मौत दुनिया भर में होगी.

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मौसम में बदलाव

न्यूयॉर्क की एक्सपर्ट मिशेल डिपास कहती हैं कि क्लाइमेट चेंज की वजह से ज़ीका जैसी बीमारियां सिर उठा रही हैं. इसी तरह मलेरिया, डेंगू या इबोला वायरस से होने वाले मर्ज़ का दायरा भी बढ़ रहा है. अमरीका और ब्रिटेन जैसे देश भी इन बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं.

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट के मुताबिक़ 2017 में दुनिया के सामने जो पांच बड़े ख़तरे हैं, उनमें से चार ख़तरे क़ुदरती हैं. ये ख़तरे हैं-मौसम में बड़ा बदलाव, पानी का संकट, बड़ी क़ुदरती आपदाएं और क्लाइमेट चेंज के असर से निपटने में नाकामी. यानी धरती की आबो-हवा बदलने की चुनौती बहुत बड़ी है.

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भयंकर बारिश के बाद...

मगर इससे निपटने की तैयारी उतनी ही कमज़ोर है. गैर सरकारी संगठन एसोसिएशन ऑफ क्लाइमेट चेंज ऑफ़िसर्स के डेनियल क्रीगर कहते हैं कि हालात से निपटने के लिए उपयुक्त लोग सही जगह पर नहीं हैं. डेनियल सिविल इंजीनियरिंग की मिसाल देते हैं. हम भयंकर बारिश के बाद के हालात से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हैं.

जब जलवायु परिवर्तन से बारिश का पैटर्न बदलेगा, तो इंजीनियरों को उस हालात से निपटने की रणनीति बनानी होगी. वो फिलहाल तो होती नहीं दिखती. भारत में तो हम हर साल बारिश में ऐसा होते देखते हैं.

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क्लाइमेट चेंज का असर

डेनियल कहते हैं कि बारिश की आफ़त से निपटने के लिए न इंजीनियरों को ट्रेनिंग दी जा रही है और न ही शहरी योजनाएं बनाने वालो को. न ही आर्किटेक्ट इस हिसाब से इमारतों की डिज़ाइन तैयार कर रहे हैं. यानी उनके करियर पर क्लाइमेट चेंज का असर पड़ना तय है.

जलवायु परिवर्तन के लिए कारोबारी तैयारी- वैसे, दुनिया भर में कंपनियां क्लाइमेट चेंज के असर से निपटने की तैयारी करने लगी हैं. आज की तारीख़ में ऊर्जा के क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियां ऐसे लोगों को नौकरी पर रख रही हैं, जिन्हें जलवायु परिवर्तन की समझ है.

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ग्रीन एनर्जी

जैसे ब्रिटेन में ही आज की तारीख़ में सोलर एनर्जी, पनबिजली, बायोएनर्जी और पवन ऊर्जा की कंपनियों में रोज़गार के मौक़े बढ़ रहे हैं. यही हालात अमरीका और दूसरे पश्चिमी देशों में हैं. पिछले कुछ सालों से कच्चे तेल के दाम में आई गिरावट की वजह से इस सेक्टर में नौकरियां कम हुई हैं.

लोग नेचुरल गैस के कारोबार में लगी कंपनियों में रोज़गार के मौक़े देख रहे हैं. अमरीका की जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी की तारा सिन्क्लेयर कहती हैं कि आज नौकरी देने वाले और उनकी तलाश करने वाले, दोनों ही क्लाइमेट चेंज के असर को देख रहे हैं. इसीलिए आज ग्रीन एनर्जी के क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियों में लोगों की दिलचस्पी बढ़ रही है.

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सैलरी पर असर

क्लाइमेट चेंज का सैलरी पर असर- धरती की बदलती आबो-हवा से वो कंपनियां तो आगाह हैं ही जिनका इससे सीधा वास्ता है. वो कंपनियां भी तैयारी कर रही हैं, जिन पर फिलहाल क्लाइमेट चेंज का सीधा असर नहीं पड़ रहा है. अमरीकी लेखक एंड्र्यू विंस्टन इसके लिए मल्टीनेशनल कॉर्पोरेशन यूनीलीवर की मिसाल देते हैं.

साबुन से आइसक्रीम तक बनाने वाली इस कंपनी ने कहा है कि 2030 तक वो सिर्फ़ रिन्यूएबल एनर्जी के सोर्स से पैदा होने वाली बिजली ही इस्तेमाल करेगी. कंपनी ने अपने कारोबार से होने वाले प्रदूषण में भी 43 फ़ीसद तक की कमी की है. इसी तरह कोका-कोला, आइकिया और वालमार्ट ने भी कहा है कि वो आगे चलकर क्लीन एनर्जी ही इस्तेमाल करेंगे.

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कंपनी के पैसे

हम आम तौर ऐसी बातें एनजीओ के हवाले से सुनते आए थे. लेकिन आज बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी क्लाइमेट चेंज के ख़तरों के बारे में बात कर रही हैं. उन्हें पता है कि जलवायु परिवर्तन बड़ा ख़तरा है और उन्हें भी इससे निपटना होगा. इसीलिए इन कंपनियों ने तैयारी शुरू कर दी है. इसकी एक और वजह भी है.

जैसे आज ऑर्गेनिक फूड की बड़ी चर्चा होती है. ऐसे ही इन कंपनियों को ये कहकर अपना सामान बेचने में सहूलत होती है कि वो ग्रीन एनर्जी के इस्तेमाल से बना है. इससे इन कंपनियों के बारे में अच्छा माहौल बनता है. नई नौकरियां तलाशने वाले युवाओं को भी ऐसी कंपनियों से जुड़ने में गर्व होता है. और हां, इससे कंपनी के पैसे भी बचते हैं.

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प्रदूषण और बिजली

यूनीलीवर का कहना है कि प्रदूषण और बिजली के इस्तेमाल में कटौती करके कंपनी ने 2008 से अब तक 70 करोड़ यूरो बचाए हैं. क्लाइमेट चेंज से कर्मचारियो की उत्पादकता पर भी असर पड़ता है. 2016 की एक रिपोर्ट बताती है कि एशिया और अफ्रीका में गर्मी बढ़ने की वजह से 2030 तक अर्थव्यवस्था को क़रीब 2 ख़रब डॉलर का नुक़सान होगा.

यही वजह है कि जब अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पेरिस जलवायु समझौते से हटने का एलान किया, तो फ़ेसबुक और गोल्डमैन सैक्स जैसी कंपनियों ने इसका विरोध किया. वाल्ड डिज़नी के बॉब इगर, टेस्ला के एलन मस्क जैसे सीईओ ने तो राष्ट्रपति के सलाहकार पद से इस्तीफ़ा दे दिया. इन बड़े कारोबारी दिग्गजों को क्लाइमेट चेंज के असर का एहसास है.

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सियासी मसला?

आज की तारीख़ में जलवायु परिवर्तन के असर से निपटने का हुनर रखने वालों को आम कर्मचारियों से दोगुनी तक तनख़्वाह मिल रही है. हाल ये है कि ये हुनर रखने वाले क़ाबिल लोगों की भारी कमी महसूस की जा रही है. कंपनियों को इनकी ज़रूरत इसलिए है ताकि वो जलवायु परिवर्तन के ख़तरों और नुक़सान से उनको बचा सकें.

इसीलिए उन्हें बाक़ी कर्मचारियों के मुक़ाबले ज़्यादा पैसे दिए जा रहे हैं. हालांकि आज की तारीख़ में कंपनियों के एचआर डिपार्टमेंट इस बात की गंभीरता नहीं समझ रहे हैं. अभी भी बहुत से लोगों को लगता है कि जलवायु परिवर्तन का मसला सियासी है. इसमें उनका कोई रोल नहीं.

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लेकिन, आप इस मुग़ालते में न रहें. दुनिया की बदलती आबो-हवा के हिसाब से अपना हुनर बढ़ा लें और बदल लें. ये आपके लिए कारगर साबित हो सकता है.

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