आंख में कैमरा लगाकर क्या रिकॉर्ड करता है यह शख़्स

हमारी आंखें कैमरे की तरह होती हैं. हमें जो भी चीज़ नज़र आती है, उसकी तस्वीर असल में हमारी आंख में लगे लेंस खींचते हैं और फिर उसे दिमाग़ तक भेजते हैं. तभी हम वो चीज़ें देख पाते हैं.

मगर क्या हो, अगर आंख की खींची हुई तस्वीर, दिमाग़ में न जाकर, किसी मेमोरी कार्ड में स्टोर हो. आंखों से देखा गया मंज़र तो हम दोबारा नहीं देख सकते. पर अगर आंख कैमरे की तरह काम करके हर मंज़र को रिकॉर्ड करे और फिर हम उसे मेमोरी कार्ड में स्टोर कर सकें, तो उसकी एक फ़िल्म बना सकते हैं.

आप हमारी बातों को पागलपन कहेंगे या सनक भरी फंतासी.

मगर एक ऐसे शख़्स हैं जो यही काम कर रहे हैं. उनका नाम है रॉब स्पेंस.

रॉब स्पेंस ब्रिटेन के रहने वाले हैं. 9 साल की उम्र में एक हादसे की वजह से उनकी एक आंख की रोशनी चली गई थी. जिसकी जगह पर उन्होंने 'बायोनिक आई' या बनावटी आंख लगवाई.

फ़िल्म देखकर प्रभावित हुए

बचपन में रॉब स्पेंस मशहूर हॉलीवुड फ़िक्शन फ़िल्म द बायोनिक मैन या The Six Million Dollar Man के शौक़ीन थे. इस फ़िल्म में एक एक ऐसे अंतरिक्षयात्री को दिखाया गया था, जिसके शरीर में कई बायोनिक या मशीनी अंग लगे थे. इनकी मदद से उसे आम इंसानों से ज़्यादा ताक़त हासिल थी.

रॉब कहते हैं इस फ़िल्म ने उन्हें बहुत प्रभावित किया. इस फ़िल्म के किरदार के जो बायोनिक आंख लगी थी उसकी मदद से सामने वाले के सिर के आर-पार देखा जा सकता था.

एक दिन रॉब ने अपने फोन के फ़्लैप में लगे कैमरे को देखा. उन्हें एहसास हुआ कि जब इतने छोटे से कैमरे से रिकॉर्डिंग हो सकती है, तो, क्यों ना इसका और बेहतर इस्तेमाल किया जाए. ऐसे ही एक कैमरे को उन्होंने अपनी आंख में फिट कराया. चीन में इस तरह की आंख पहले से इस्तेमाल होती आ रही थी. इस तरह की आंख का इस्तेमाल करने वालों को 'कैमरा मॉडयूल पीपल' कहा जाता है.

आंख में लगने वाले ये कैमरे दरअसल आंख जैसे नहीं होते हैं. बल्कि ये मोटे कॉन्टैक्ट लेंस की तरह होते हैं. इनके अंदर एक बैटरी होती है. एक वीडियो ट्रांसमिटर और एक वीडियो कैमरा होता है. ये सारे उपकरण एक सर्किट बोर्ड से जुड़े होते हैं, ताकि सभी के दरमियान तालमेल बना रहे.

आंख में लगे इस कैमरे की मदद से रॉब चलते फिरते शूटिंग कर लेते हैं. इस छोटे से कैमरे से दुनिया अलग ही नज़र आती है. इसकी तस्वीरें आपको चौंकाने वाली लग सकती हैं. अब रॉब अपनी कैमरे वाली आंख की मदद से एक साइबोर्ग यानी मशीनी इंसान पर एक डॉक्यूमेंट्री बना रहे हैं.

सब तक पहुँचे

अपने ऊपर कामयाबी से तजुर्बा करने के बाद रॉब कोशिश कर रहे हैं कि ये तकनीक सभी ज़रूरतमंदों तक पहुंचाई जा सके. जिनकी आंखों की रोशनी चली गई है, उन्हें इन बायोनिक आंखों या आर्टिफ़िशियल नज़र आंखों का तोहफ़ा दे सकें.

रॉब कहते हैं कि कुछ लोगों को लगता है कि वो आंख का कैमरा बनाकर सब कुछ रिकॉर्ड कर लेना चाहते हैं. लेकिन वो लोगों को इसी तरह शरीर के दूसरे अंग भी बनाकर देना चाहते हैं, ताकि ज़रूरतमंद उनका इसका इस्तेमाल कर सकें. ज़िंदगी को नई नज़र से देख सकें.

आज अक्लमंद मशीनें बड़ी तेज़ी से तरक़्क़ी कर रही हैं. मशीनी हाथ-पैर तो कब से बनाए और इस्तेमाल किए जा रहे हैं. आगे चलकर शरीर के और हिस्सों को भी मशीनों की मदद से धारदार बनाया जा सकेगा.

मगर, ये काम पैसे वाले लोग ही कर सकेंगे. अब वो तकनीक की मदद से औरों से अलग इंसान बनेंगे, तो नैतिकता का सवाल तो उठेगा ही. कि आख़िर पैसे और तकनीक की मदद से अलग किस्म का इंसान बनना कितना जायज़ है.

फिलहाल इस बहस से दूर रॉब तो दुनिया को आंखों वाले कैमरे की नज़र से देख रहे हैं.

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