रेलवे लाइन जो हवाई हमले से बचने के काम आया

अंडरग्राउंड रेलवे, ब्रिटेन इमेज कॉपीरइट Amanda Ruggeri
Image caption कभी बीबीसी के स्टाफ़ इस दरवाज़े से सुरंग के भीतर मौजूद अपने दफ़्तर जाया करते थे

आज आपको ले चलते हैं एक ख़ास रेलवे लाइन की सैर पर. ये रेलवे लाइन ब्रिटेन में है. आज की तारीख़ में इसका इस्तेमाल नहीं होता.

मगर सवा सौ साल से भी ज़्यादा पुरानी इस रेलवे लाइन का कई तरह से इस्तेमाल हुआ था. ये रेलवे लाइन ब्रिटेन के ब्रिस्टॉल शहर में स्थित है.

उन्नीसवीं सदी में ये रेलवे लाइन एक खड्ड के सीने को काटकर बनाई गई थी. इसका मक़सद ब्रिस्टॉल शहर के निचले इलाक़े को ऊंचाई वाले इलाक़े से जोड़ना था.

उन्नीसवीं सदी में ब्रिटेन का ब्रिस्टॉल शहर बेहद व्यस्त बंदरगाह हुआ करता था. साथ ही इसके समुद्री किनारों पर भी भारी तादाद में लोग आया करते थे.

इस शहर के ऊपरी इलाक़े में स्थित क़स्बा क्लिफ्टन रईसों की बस्ती था. वही निचला इलाक़ा व्यस्त बंदरगाह.

दुनिया भर में क्यों हो रही है नए देशों की मांग?

भारत में ट्रेन की शुरुआत का अमरीकी कनेक्शन

इमेज कॉपीरइट Alamy
Image caption 18वीं सदी में क्लिफ़टन का इलाका ब्रिस्टल से अलग हुआ करता था

रेलवे लाइन

निचले इलाक़े से ऊपर की तरफ़ आने में लोगों को काफ़ी परेशानी हुआ करती थी. इस मुश्किल का हल निकाला क्लिफ्टन के कारोबारी जॉर्ज न्यूनेस ने.

जॉर्ज दोनों इलाक़ों के जोड़ने के लिए रेलवे लाइन बिछाने का प्रस्ताव दिया. उनका प्रस्ताव एक शर्त के साथ मंज़ूर किया गया.

शर्त ये थी कि रेलवे लाइन ज़मीन के ऊपर नहीं होगी. उसे ज़मीन के भीतर बिछाया जाना होगा. जॉर्ज न्यूनेस ने ये शर्त मंज़ूर कर ली.

उन्होंने इंजीनियर को जमा किया, जिन्होंने अंदाज़ा लगाया कि रेलवे लाइन बिछाने में एक साल लगेगा.

मगर जब सुरंग खोदी जाने लगी तो चट्टानों को काटने में बड़ी दिक़्क़तें आईं. बार-बार चट्टानों के टुकड़े गिर जाते थे. चुनौती बढ़ती देख कनाडा से इंजीनियर बुलाए गए.

जली लाशों और मलबे में बदल गया था हिरोशिमा

किन हथियारों के बल पर चीन ललकार रहा है

इमेज कॉपीरइट Amanda Ruggeri
Image caption कुछ स्वयंसेवी लोगों ने सुरंग से आती ट्रेन को फिर से रीक्रिएट करने की कोशिश की है

टेलीग्राफ मशीन

जिन्होंने सलाह दी कि सुरंग के भीतर ईंट की दीवार बनाई जाए, ताकि गिरती हुई चट्टानों को रोका जा सके. आख़िरकार ये सुरंग 1893 में बनकर तैयार हुई.

इसके भीतर एक डिब्बे वाली रेलगाड़ी चलने लगी. ऊपर और नीचे जाते डिब्बों के बीच तालमेल बैठाने के लिए ऊपर की तरफ़ पानी के बड़े-बड़े टैंक बनाए गए थे.

नीचे जाते डिब्बे का ड्राइवर टेलीग्राफ़ मशीन से ऊपर वालों को ख़बर करता था कि उसके डिब्बे में कितने लोग हैं.

उसी हिसाब से बैलेंस बनाने के लिए पानी के टैंकों में पानी भरा जाता था. जॉर्ज न्यूनेस की ये अजीबोग़रीब रेलवे लाइन शुरुआती बरसों में ख़ूब कामयाब रही.

उन्होंने शहर के ऊपरी हिस्से में एक शानदार स्पा बनवाया. जिसका प्रचार ब्रिटेन के सबसे ख़ूबसूरत स्पा सेंटर के तौर पर किया गया.

वो लड़कियां जिनके हाथों बना पहला एटम बम

...तो समंदर में डूब जाएंगे कई शहर

इमेज कॉपीरइट Alamy
Image caption अब जर्जर अवस्था में लेकिन एक वक्त था जब इस अंडरग्राउंड रेलवे को देखने के लिए सैलानियों की बड़ी भीड़ आया करती थी

बीबीसी रेडियो सर्विस

मगर बीसवीं सदी का दूसरा दशक आते-आते मुसाफ़िरों की तादाद बहुत कम हो गई. 1934 में ये रेलवे लाइन बंद कर दी गई.

पांच साल बाद दूसरा विश्व युद्ध छिड़ गया. जर्मनी ने ब्रिटेन पर हमले करने शुरू कर दिए. ब्रिस्टॉल शहर पर भी जर्मन एयरफ़ोर्स ने ख़ूब हमले किए.

इसकी एक वजह तो यहां का बंदरगाह था. वहीं दूसरी वजह यहां की हवाई जहाज़ बनाने वाली कंपनी थी, जो ब्रिटेन की रॉयल एयरफ़ोर्स के लिए हवाई जहाज़ बनाया करती थी.

बमबारी से बचने के लिए लोगों को तहखाने की ज़रूरत महसूस हुई. जिसके बाद पुराने लोगों को इस सुरंग वाली रेलवे लाइन की याद आई.

इस रेलवे ट्रैक के एक हिस्से को हवाई हमलों से बचने के ठिकाने के तौर पर इस्तेमाल किया जाने लगा. साथ ही इसके एक हिस्से में बीबीसी ने अपनी रेडियो सर्विस शुरू की.

चीनी गांव को अमरीका ने समझा मिसाइल गोदाम

जिसने 6 दिन में बदल दिया मध्य पूर्व का नक्शा

इमेज कॉपीरइट Amanda Ruggeri
Image caption हवाई हमलों से बचने के लिए बनाए गए ठिकाने और स्टूडियो तक जाने का रास्ता अब डरावना लगता है

ब्रिटेन की शानदार विरासत

असल में लंदन पर लगातार हवाई हमले हो रहे थे. ऐसे में बीबीसी का प्रसारण बंद होने का डर था. इसीलिए बीबीसी की रेडियो सर्विस को लंदन से ब्रिस्टॉल लाया गया.

यहां इस सुरंग में बीबीसी ने अपना दफ़्तर बनाकर प्रसारण शुरू किया. बीबीसी के दफ़्तर यहां 1960 के दशक तक काम करते रहे थे. इसके बाद यहां वो काम भी बंद हो गया.

सुरंग एक बार फिर वीरान हो गई थी. अब एक स्वयंसेवी संस्था ने इस रेलवे सुरंग को फिर से तैयार करने की शुरुआत की है. इसका रंग-रोगन किया जा रहा है.

साथ ही टूट-फूट को दुरुस्त किया जा रहा है. तहखाने में रोशनी का इंतज़ाम किया गया है. रेलवे टिकटघर से लेकर बीबीसी के दफ़्तर तक को फिर से रोशन किया जा रहा है.

इस काम को करने वाली संस्था का मक़सद है कि वो लोगों को ब्रिटेन की इस शानदार विरासत से रूबरू कराए.

दुनिया की पहली मिसाइल फ़ैक्ट्री बनने वाला गांव

जिसने अंधेरे में देखना किया मुमकिन

इमेज कॉपीरइट Amanda Ruggeri
Image caption एयर रेड शेल्टर से वॉलंटियर्स ने टूटी हई बोतलें इकट्ठा कीं

उन्नीसवीं सदी की इंजीनियरिंग

सैलानी आएं और उन्नीसवीं सदी की इंजीनियरिंग का ये शाहकार देखें.

वो ये भी देखें कि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान किस-किस तरह से ब्रिटेन ने ख़ुद को तबाह होने से बचाया और जर्मनी का मुक़ाबला करके उसे मात दी.

इस रेलवे सुरंग की मरम्मत का काम अभी पूरा नहीं हुआ है. सुरंग में काफ़ी मलबा फैला हुआ है. साथ ही पानी भी लगातार टपकता रहता है.

ये सुरंगें हमें गुज़रे ज़माने की याद दिलाती हैं. यहां के तहखाने में उस वक़्त ठहरने वाले लोगों के कई सामान भी पड़े मिले हैं, जिन्हें सहेजकर रखा गया है.

वहीं बीबीसी के दफ़्तर में भी कई चीज़ें लोगों को मिली हैं, जिन्हें यहां एक म्यूज़ियम का रूप देकर रखा गया है.

ये रेलवे सुरंग पुराने इंजीनियरों के कमाल की यादगार है, साथ ही ये दूसरे विश्व युद्ध के बुरे दौर की भी याद दिलाती है.

कंप्यूटर प्रिंटर कैसे छोड़ते हैं सुराग?

समंदर के सीने में दफ़न ये ख़ूबसूरत राज़!

इमेज कॉपीरइट Amanda Ruggeri
Image caption छुपने के लिए बनाए गए इन ठिकानों से बच्चों के जूते जैसी चीज़ें भी मिली हैं

(बीबीसी फ़्यूचर पर इस स्टोरी को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. आप बीबीसी फ़्यूचर कोफ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

मिलते-जुलते मुद्दे