ग्रहण को लेकर आज भी कायम हैं डराने वाले विश्वास

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अमरीका में करीब एक शताब्दी बाद पूर्ण सूर्यग्रहण दिखने वाला है. अनुमान है कि 21 अगस्त को दुनिया भर से करीब सत्तर लाख लोग अमरीका के अलग-अलग शहरों में पूर्ण सूर्यग्रहण देखने पहुंचेंगे.

1918 के बाद पहली बार पूरे उत्तरी अमरीकी महाद्वीप में सूर्यग्रहण दिखाई देगा. इस विरल खगोलीय घटना की प्रत्यक्ष झलक पाने के लिए लाखों लोग बेताबी से इंतज़ार कर रहे हैं. इस अवसर पर नासा पहली बार करीब अस्सी हज़ार फीट की ऊंचाई से गुब्बारों के ज़रिये ग्रहण का सजीव प्रसारण करेगा.

हीलियम से भरे ये गुब्बारे कैमरे और कंप्यूटर से लैस होंगे और इनके ज़रिये धरती पर सूर्यग्रहण की लाइव तस्वीरें और वीडियो भेजे जाएंगे. नासा हवाई जहाज से भी सूर्यग्रहण का पीछा करेगा. इस दौरान पचास हज़ार फीट की ऊंचाई पर सामान्य से तीस गुना अधिक अंधेरा होगा.

ऐसे रोमांच के विपरीत ऐसे लोग भी हैं जिनके लिए ग्रहण किसी ख़तरे का प्रतीक है- जैसे कि दुनिया के ख़ात्मे या भयंकर उथलपुथल की चेतावनी.

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कहीं डर, कहीं पर्यटन की संभावना

हिंदू मिथकों में इसे अमृतमंथन और राहु-केतु नामक दैत्यों की कहानी से जोड़ा जाता है और इससे जुड़े कई अंधविश्वास प्रचलित हैं. अमरीका के कई समूह इस ग्रहण को आने वाले प्रलय का प्रतीक मानते हैं. भविष्यवाणी करने वाली एक वेबसाइट के मुताबिक इस ग्रहण से उस कथित उथलपुथल की शुरुआत होगी जो सात साल तक चलेगी और जिसमें दुनिया की 75% आबादी ख़त्म हो जाएगी.

दूसरी ओर, कई लोग इस अद्भुत नज़ारे को देखने के लिए एक-एक दिन गिन रहे हैं. ओरेगॉन और दक्षिण कैलोरिना के 112 किमी. लंबे रास्ते पर, जहां चांद सूरज को पूरी तरह ढक लेगा, ग्रहण पर्यटन की तैयारी जोरों पर है. ग्रहण पर्यटन की परंपरा की शुरुआत यूरोप में 18वीं शताब्दी में उन यूरोपीय राजधानियों के बीच पर्यटन से हुई, जहां से होकर ग्रहण गुज़रता था.

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ग्रहण सदा से इंसान को जितना अचंभित करता रहा है, उतना ही डराता भी रहा है. असल में, जब तक मनुष्य को ग्रहण की वजहों की सही जानकारी नहीं थी, उसने असमय सूरज को घेरती इस अंधेरी छाया को लेकर कई कल्पनाएं कीं, कई कहानियां गढ़ीं. 7वीं सदी के यूनानी कवि आर्कीलकस ने कहा था कि भरी दोपहर में अंधेरा छा गया और इस अनुभव के बाद अब उन्हें किसी भी बात पर अचरज नहीं होगा. मज़े की बात यह है कि आज जब हम ग्रहण के वैज्ञानिक कारण जानते हैं तब भी ग्रहण से जुड़ी ये कहानियां, ये विश्वास बरकरार हैं.

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Image caption सदियों से ग्रहण मनुष्य को अचंभित करता आया है

कैलिफोर्निया की ग्रिफिथ वेधशाला के निदेशक एडविन क्रप कहते हैं, 'सत्रहवीं सदी के अंतिम वर्षों तक भी अधिकांश लोगों को मालूम नहीं था कि ग्रहण क्यों होता है या तारे क्यों टूटते है. हालांकि आठवीं शताब्दी से ही खगोलशास्त्र‍ियों को इनके वैज्ञानिक कारणों की जानकारी थी.'

क्रप के मुताबिक, 'जानकारी के इस अभाव की वजह थी- संचार और शिक्षा की कमी. जानकारी का प्रचार-प्रसार मुश्किल था जिसके कारण अंधविश्वास पनपते रहे.' वह कहते हैं, 'प्राचीन समय में मनुष्य की दिनचर्या कुदरत के नियमों के हिसाब से संचालित होती थी. इन नियमों में कोई भी फ़ेरबदल मनुष्य को बेचैन करने के लिए काफ़ी था.'

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अलग-अलग सभ्यताओं में हैं अलग मान्यताएं

प्रकाश और जीवन के स्रोत सूर्य का छिपना लोगों को डराता था और इसीलिए इससे जुड़ी तरह-तरह की कहानियां प्रचलित हो गई थीं. सबसे व्यापक रूपक था सूरज को ग्रसने वाले दानव का. एक ओर पश्चिमी एशिया में मान्यता थी कि ग्रहण के दौरान ड्रैगन सूरज को निगलने की कोशिश करता है और इसलिए वहां उस ड्रैगन को भगाने के लिए ढोल-नगाड़े बजाए जाते थे. वहीं, चीन में मान्यता थी कि सूरज को निगलने की कोशिश करने वाला दरअसल स्वर्ग का एक कुत्ता है. पेरुवासियों के मुताबिक यह एक विशाल प्यूमा था और वाइकिंग मान्यता थी कि ग्रहण के समय आसमानी भेड़ियों का जोड़ा सूरज पर हमला करता है.

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Image caption ग्रहण पर प्रलय आने पर यकीन रखने वाला एक शख़्स पिछले महीने वॉशिंगटन डीसी में.

लेकिन सभी सभ्यताओं में ग्रहण भय का प्रतीक नहीं था. टोगो और बेनिन में बैटामैलाइबा लोगों की मान्यता थी कि ग्रहण के दौरान सूरज और चाँद आपस में झगड़ा कर रहे होते हैं. इसलिए उन्हें आपस में सुलह करने के लिए प्रेरित करने के लिए लोग ग्रहण के दौरान अपने पुराने झगड़े सुलझाते थे और दुश्मनों को माफ़ करते थे. इसी तरह दक्षिणी प्रशांत क्षेत्र के मूल निवासी और अमेरिका के उत्तर-पश्चिम तट पर रहने वाले स्थानीय अमरीकी कबीलों का विश्वास था कि सूरज और चाँद प्रेमी-प्रेमिका हैं और ग्रहण के दौरान वे धरती से पर्दा कर प्रेमलीला करते हैं.

खगोलविज्ञानी और वेस्टर्न केप विश्वविद्यालय में प्रोफेसर जरीटा हॉलब्रुक कहते हैं, 'ग्रहण के बारे में विभिन्न सभ्यताओं का नज़रिया इस बात पर निर्भर करता है कि वहाँ प्रकृति कितनी उदार या अनुदार है. जहां जीवन मुश्किल है, वहाँ देवी-देवताओं के भी क्रूर और डरावने होने की कल्पना की गई और इसीलिए वहाँ ग्रहण से जुड़ी कहानियाँ भी डरावनी हैं. जहां जीवन आसान है, भरपूर खाने-पीने को है, वहाँ ईश्वर या पराशक्तियों से मानव का रिश्ता बेहद प्रेमपूर्ण होता है और उनके मिथक भी ऐसे ही होते हैं.'

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मध्यकालीन यूरोप में, प्लेग और युद्धों से जनता त्रस्त रहती थी, ऐसे में सूर्यग्रहण या चंद्रग्रहण उन्हें बाइबल में प्रलय के वर्णन की याद दिलाता था. प्रोफ़ेसर क्रिस फ्रेंच कहते हैं, 'लोग ग्रहण को प्रलय से क्यों जोड़ते थे, इसे समझना बेहद आसान है. बाइबल में उल्लेख है कि कयामत के दिन सूरज बिल्कुल काला हो जाएगा और चाँद लाल रंग का हो जाएगा. सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण में क्रमश: ऐसा ही होता है. फिर लोगों का जीवन भी छोटा था और उनके जीवन में ऐसी खगोलीय घटना बमुश्किल एक बार ही घट पाती थी, इसलिए यह और भी डराती थी.'

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ग्रहण से डराकर फ़ायदा भी उठाया गया है

वैसे ग्रहण की जानकारी रखने वालों ने इसका इस्तेमाल अपने फ़ायदे के लिए भी किया है. 1504 में जब क्रिस्टोफ़र कोलंबस का जहाज़ जमैका के तट से टकरा गया और जहाज के कर्मचारियों के भूखे मरने की नौबत आ गई तो कोलंबस ने चंद्रग्रहण की सटीक जानकारी के ज़रिये आकाशीय शक्तियों पर अपने नियंत्रण का दावा किया ताकि स्थानीय अरावाक इंडियन उन्हें रसद मुहैया कराएं.

इसी तरह जूलु के योद्धा शासक शकाका सेन सेनजैंगैकॉनै ने खगोलीय घटनाओं की अपनी जानकारी का इस्तेमाल अपनी सत्ता को और मजबूत करने के लिए किया और जनता को विश्वास दिलाया कि सूर्य भी उसके नियंत्रण में है. कई बार ग्रहण से जुड़े अंधविश्वासों को और फैलाया गया ताकि लोगों को सही जानकारी न हो और उनके अज्ञान का इस्तेमाल अपने हक में किया जा सके.

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अख़बारों की शुरुआत के बाद ग्रहण के बारे में जानकारी बढ़ने लगी. क्रप कहते हैं, '17वीं सदी के यूरोपीय अख़बारों में आपको ग्रहण से जुड़ी खतरनाक भविष्यवाणियाँ तो नज़र आएंगी लेकिन ऐसी ख़बरें भी दिखेंगी कि ये सारी भविष्यवाणियाँ बकवास हैं और यह कुछ और नहीं बल्कि सौर प्रणाली से जुड़ी घटना भर है".

लेकिन आज जब हम ग्रहण के वैज्ञानिक कारणों को जानते हैं तो भी ये अंधविश्वास क्यों प्रचलित हैं? फ्रेंच कहते हैं, 'इसके पीछे संयोग है. अगर किसी ग्रहण के आसपास कोई जन्म या मृत्यु होती है तो जो लोग ज्योतिष में विश्वास करते हैं, वे इसे ग्रहण से जोड़ लेंगे जबकि यह मात्र संयोग होगा.'

इन मिथकों के प्रचलित रहने का एक और कारण भी है. हॉलब्रुक कहते हैं, 'ग्रहण की प्रतिक्रिया हमारे शरीर पर भी होती है. जब हम कोई ग्रहण देखते हैं तो हमारी धड़कनें तेज हो जाती हैं, शरीर के तापमान और साँसों की गति में बदलाव आता है, पुतलियां फैल जाती हैं और पसीना आने लगता है. माना जाता है कि इसके पीछे मनोवैज्ञानिक कारण हैं. कुदरत के बारे में हममें अंतर्निहित समझ होती है. जब ऐसा कुछ देखते हैं जो उस समझ के हिसाब से असंभव है, जैसे सूर्यग्रहण, तो प्रतिक्रिया में दिमाग़ शरीर को ये सारे सिग्नल भेजता है. हम सभी के शरीर में एक सी प्रतिक्रिया होती है, लेकिन हम उनका क्या अर्थ निकालते हैं, यह हमारी संस्कृति पर निर्भर है.'

अमरीका में इस बार जब सूर्यग्रहण होगा तो हममें से अधिकांश के मन में इसे लेकर कोई डर तो नहीं होगा, लेकिन जब सूर्यग्रहण के दौरान सूर्य ग़ायब होने लगेगा और हर ओर अंधेरा छा जाएगा, तब शायद हम यह समझ पाएं कि आख़िर क्यों सभ्यता की शुरुआत से ही ग्रहण इंसान को डराते रहे हैं.

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