ये है दुनिया में ‘जहन्नुम का दरवाज़ा’

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किसी जगह पर ज़िंदगी के पनपने के लिए गर्मी, सर्दी, हवा, पानी सभी का होना लाज़मी है. बहुत ज़्यादा सर्दी या गर्मी होने पर ज़िंदगी का पनपना लगभग ना के बराबर है.

पूर्वी अफ्रीका के इथियोपिया में एक जगह ऐसी है जहां आग बरसती है. इसे दुनिया का सबसे गर्म ठिकाना कहा जाता है. इस जगह का नाम है, दानाकिल डिप्रेशन. ये वो इलाक़ा है जिसकी कोख में धरती की तीन कॉन्टिनेंटल प्लेट आपस में टकराती हैं.

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इस वजह से यहां धरती से लावा और एसिड बाहर आता रहता है. दानाकिल डिप्रेशन में साल भर औसत तापमान 45 डिग्री सेल्सियस रहता है. इसे इलाक़े के लोग 'जहन्नुम का दरवाज़ा' कहते हैं.

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Image caption दुनिया की दूरस्थ जगहों में से एक

ज़िंदगी पनपने के आसार कम

इतनी भयंकर गर्मी और पानी के बजाय पूरे इलाक़े में एसिड होने की वजह से यहां ज़िंदगी पनपने के आसार बेहद कम होते हैं. फिर भी हाल ही में यहां ज़िंदगी के निशान मिले हैं.

अफ़्रीक़ा का ये ऐसा इलाक़ा है जिसके बारे में सबसे कम रिसर्च की गई है. ये समुद्र की सतह से क़रीब 330 फुट नीचे है. बारिश तो यहां बमुश्किल ही होती है. अलबत्ता यहां की सरज़मीं पर पिघला हुआ लावा अक्सर रिसता रहता है.

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दानाकिल के पानी में पीएच का स्तर 0.2 है. पीएच यानि पानी में हाइड्रोजन की मौजूदगी. यहां के पानी में हाईड्रोजन इतनी मात्रा में है, जितना कि दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलता.

यहां दो ऐसे ज्वालामुखी हैं जो अक्सर सक्रिय रहते हैं. इसमें से एक है 'इरता अले'. इस ज्वालामुखी की चोटी में लावा खौलता रहता है. आस-पास तेज़ाब के तालाब हैं. जहां से हर वक्त भाप उठती रहती है. इस ज्वालामुखी के मुहाने को 'डालोल' कहते हैं.

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Image caption तेज़ाबी तालाब में सल्फ़र और नमक

यहां रंग भी हैं

समुद्र का खारा पानी जब ज्वालामुखी से निकलने वाले खनिजों और लावा के साथ मिलता है, तो कई तरह के चमकीले रंग पैदा करता है. तेज़ाबी तालाब में जब सल्फ़र और नमक एक दूसरे के साथ मिलते हैं तो चमकीला पीला रंग दिखाई देता है. इसी तरह जब ये तांबा नमक के साथ मिलता है तो चमकीला फ़िरोज़ी रंग तैयार होता है.

इस इलाक़े में जिस तरह की आबो-हवा है उससे साफ़ है कि यहां ज़िंदगी नहीं पैर जमा सकती. लेकिन इस इलाक़े से कुछ फ़ासले पर अफ़ार घुमंतू जाती के लोग रहते हैं.

2013 से पहले तक दानाकिल के बारे में दुनिया को बहुत ज़्यादा जानकारी नहीं थी. लेकिन 2013 में 'यूरोप्लांट' की टीम ने इस इलाक़े पर रिसर्च करने का काम शुरू किया. यूरोप्लांट रिसर्च संस्थाओं और कंपनियों का ऐसा संघ है जो धरती के ऐसे इलाक़ों पर तजुर्बे करते हैं, जिससे मंगल ग्रह पर रिसर्च करने में मदद मिले.

रिसर्चरों का कहना है कि इस इलाक़े तक पहुंचना आसान नहीं है. साल 2012 में यूरोप के कुछ रिसर्चर यहां आए थे, लेकिन उन्हें अग़वा कर लिया गया था. यहां तक पहुंचने के लिए इस देश के फ़ौजी साथियों की मदद दरकार होती है.

गैस मास्क का सहारा

इटली की बोलोना यूनिवर्सिटी की बारबरा क्वालाज़ी ने इस इलाक़े के बारे में काफ़ी शोध किया है. बारबरा के मुताबिक़ यहां के माहौल में बेपनाह गर्मी है. दिन में तापमान 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है. एक बार तो यहां 55 डिग्री सेल्सियस तक तापमान रिकॉर्ड किया गया था.

साथ ही ज्वालामुखी के भीतर इतने केमिकल रिएक्शन होते रहते हैं जिससे तापमान में और इज़ाफ़ा हो जाता है. नतीजा ये होता है कि ज़मीन से जो खारा पानी निकलता है, वो लगभग खौलता हुआ निकलता है.

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Image caption नमक की खानें भी हैं यहां

इस इलाक़े की हवा में क्लोरीन और हाईट्रोजन सल्फ़ाइड गैस घुली होती है. लिहाज़ा यहां आने वाले रिसर्चरों को गैस मास्क का सहारा लेकर ही यहां आना पड़ता है.

प्रोफ़ेसर क्वालाज़ी के अनुसार ये पता होना बेहद ज़रूरी है कि किस जगह पर ज़मीन के भीतर ज़्यादा हलचल मची है. ग़लती से भी अगर उस इलाक़े में पैर पड़ गया या आप गिर गए तो जलने से आपको कोई नहीं बचा सकता. सबसे नज़दीक जो अस्पताल है वो भी कई घंटों के फ़ासले पर है.

बारबरा क्वालाज़ी बताती हैं कि उन्हें काफ़ी वक़्त तो यही समझने में लगा कि दानाकिल में काम शुरू कैसे करना है. यहां से केमिकल के नमूने जमा करने के लिए अपने साथ कोई फ़्रिज तो ली जाई नहीं जा सकती. लिहाज़ा अपने काम को बहुत सोच समझकर करना पड़ता है.

यलो लेक या ऑयली लेक या किलर लेक

रिसर्चरों की टीम ने साल 2013 में काम शुरू किया था, साल 2016 में नमूने जमा किए और साल 2017 में बहुत से नमूनों के साथ लौटे. अच्छी बात ये रही कि रिसर्चरों की इतने साल की मेहनत बेकार नहीं गई. जिस मक़सद से वो यहां आए थो वो मक़सद कामयाब रहा. यहां से लिए गए नमूनों में उन्हें कुछ बैक्टीरिया मिले जिससे ज़िंदगी होने के सबूत मिले. दो अलग अलग जगह के नमूनों में अलग अलग तरह के बैक्टीरिया पाए गए.

डालोल के पास जो झील पाई गई थी उसके पानी में तेज़ाबियत कम थी और कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा ज़्यादा थी. इस झील को यहां के लोग अलग-अलग नाम देते हैं. कोई इसे यलो लेक कहता है, कोई ऑयली लेक कहता है तो कोई इसे किलर लेक कहता है.

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प्रोफ़ेसर क्वालाज़ी के मुताबिक़ इस झील के पास बहुत से कीड़े और चिड़ियां मरी हुई पाई गईं. हो सकता है इन जानदारों ने इस झील का पानी पिया हो और कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा ज़्यादा होने की वजह से इनकी मौत हो गई हो.

रिसर्चरों की एक और टीम नई बात की तरफ़ इशारा करती है. इनके मुताबिक़ यहां के तेज़ाबी तालाब में पीएच का स्तर ज़ीरो है. फिर भी वहां कई तरह के बैक्टीरिया पाए गए.

धरती पर इससे ज़्यादा तेज़ाबियत वाली जगह कहीं और नहीं है. होता ये है कि इतने ज़्यादा एसिड वाली जगह पर हाईड्रोजन की तादाद बहुत ज़्यादा होती है. ये कोशिकाओं के काम करने के लिए ज़रूरी एंजाइम को नष्ट कर देती है. एंजाइम नष्ट होंगे तो डीएनए भी नहीं बच सकेगा.

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साथ ही पानी में नमक ज़्यादा होने की वजह से कोशिकाओं के भीतर का पानी भी बाहर आ जाएगा और वो सिकुड़कर ख़त्म हो जाएंगी.

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Image caption 55 डिग्री सेल्सियस भी होता है तापमान

लेकिन दुनिया में कई ऐसे ठिकाने हैं, जहां पर बेहद मुश्किल हालात में ज़िंदगी पनप रही है. जैसे अमरीका में यलोस्टोन. यहां भी धरती की कोख में प्लेटों के टकराव से ऊपर का माहौल बेहद गर्म रहता है. फिर भी यहां कुछ बैक्टीरिया पाए गए हैं. माना जाता है कि इन कीटाणुओं ने ख़ुद को माहौल के हिसाब से ढाल लिया है.

चंद्रमा-मंगल पर भी ऐसे हालात

इसी तरह स्पेन के रियो टिंटो में पानी का पीएच लेवल महज़ 2 है. फिर भी यहां कुछ कीटाणु मिलते हैं.

माना जाता है कि चंद्रमा और मंगल ग्रह पर भी ऐसे ही हालात हैं. तो वहां भी ज़िंदगी पनपने के आसार हो सकते हैं. ये कैसे होगा, ये समझने के लिए दानाकिल में की जा रही रिसर्च से काफ़ी मदद मिल सकती है.

वैज्ञानिक अब ये पता लगा रहे हैं कि दानाकिल में पाए गए कीटाणुओं के भीतर क्या बदलाव हुए हैं, जो इतनी भयंकर गर्मी या जहन्नुम जैसे हालात में उनको ज़िंदा रखते हैं.

ये रिसर्च हमें ये समझाने में भी मददगार होगी की धरती पर ज़िंदगी की शुरुआत कैसे हुई.

दानाकिल को जहन्नुम का दरवाज़ा कहा जाता है. अब वहां से भी हमें ज़िंदगी के इतने राज़ पता चलेंगे, तो ज़ाहिर है जहन्नुम भी हमारे काम का है.

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