उन्नत तकनीक के बाद भी कैसे हो जाती है समुद्री जहाज़ों में टक्कर?

इमेज कॉपीरइट Getty Images

इंसान के लिए ज़मीन से ज़्यादा बड़ा समंदर का दामन है. साहिल पर खड़े होकर देखो तो दूर दूर तक पानी ही पानी नज़र आता है.

लगता है मानो इसका कोई छोर है ही नहीं. एक छोटे शहर की आबादी को ख़ुद पर बसाने की क्षमता रखने वाले विशालकाय जहाज़, जब समंदर में चलते हैं, तो चींटी जैसे लगते हैं.

धरती के दो-तिहाई हिस्से पर समंदर का विस्तार है. इतने बड़े इलाक़े में मुट्ठी भर जहाज़ चलते हैं. वो भी एडवांस तकनीक के सहारे.

जीपीएस सिस्टम, रडार से निगरानी, रेडियो सेट से संपर्क और ताक़तवर दूरबीन से दूर तक निगाह रखने की तकनीक से लैस होते हैं ये जहाज़. फिर भी वो आपस में टकरा क्यों जाते हैं. ये बात हैरत में डालती है.

हाल ही में अमरीका ने अपनी नौसेना के एक बड़े अफ़सर को हटा दिया. इसकी वजह थी दो बड़े हादसे, जो अमरीकी नौसैनिक जहाज़ों को झेलने पड़े थे.

बीते हफ़्ते आधी रात को मलेशिया के पास 12 हज़ार टन तेल से लदा एक बड़ा टैंकर अमरीकी नौसेना के जंगी जहाज़ जॉन मैक्केन से टकरा गया. इस जहाज़ के दस नौसैनिक अभी भी लापता हैं. ये हादसा सभी को बहुत हैरान करने वाला था.

इसी तरह का एक और हादसा दो महीने पहले हुआ था. अमरीकी नौसेना का जंगी जहाज़ यूएसएस फित्ज़्गेराल्ड जहाज़ जापान के पास समुद्र में एक बड़े मालवाहक जहाज़ से टकरा गया था. इस हादसे में सात अमरीकी नौसैनिक मारे गए थे.

हैरत में डालने वाले हादसे

ये हादसे इसलिए हैरत में डालने वाले हैं, क्योंकि अमरीका के इन दोनों जंगी जहाज़ों की जीपीएस से ट्रैकिंग की जा रही थी. जहाज़ ऑटोमैटिक आइडेंटिफ़िकेशन सिस्टम से लैस थे. फिर भी चूक कहां हुई, ये बड़ा सवाल था.

ब्रिटेन की रॉयल यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूट में मिलिट्री साइंस के डायरेक्टर पीटर रॉबर्ट्स का कहना है कि रडार पर नज़र रखने के साथ-साथ अगर एक नज़र बाहर देखकर हालात का जायज़ा लेते रहें, तो ऐसे हादसे टाले जा सकते हैं.

लेकिन, समुद्र में इस तरह के हादसों की तादाद बढ़ती जा रही है. ये बात चिंता का विषय बन गई है. हालांकि इन हादसों के पीछे साज़िश की आशंका भी जताई जा रही है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

इसकी वजह ये है कि हाल ही में काला सागर में एक जहाज़ का जीपीएस सिस्टम हैक कर लिया गया था. इसीलिए कहा जा रहा है कि हो सकता है कि अमरीकी जंगी जहाज़ों के जीपीएस सिस्टम को हैक करके ये हादसे कराए गए हो.

हालांकि ब्रिटिश जानकार पीटर रॉबर्ट्स कहते हैं कि इसे सिर्फ़ साज़िश के नुक़्ते-नज़र से नहीं देखा जाना चाहिए. गहराई से पड़ताल करके इन हादसों की सही वजह का पता लगाया जाना चाहिए.

इंसानों की कितनी ग़लती?

ऐसा भी नहीं है कि समुद्र में इस तरह के हादसे पहले नहीं हुए. पहले भी बड़े बड़े जहाज़ ऐसे हादसों का शिकार हुए हैं. लेकिन वो हादसे कभी इतनी सुर्ख़ियां नहीं बटोरते थे.

मिसाल के लिए अमरीकी जंगी जहाज़ जॉन एस मैक्केन के हादसे से एक या दो दिन पहले चीन के फुजियान में दो मालवाहक जहाज़ आपस में टकराए थे. इनमें सात नाविक मारे गए थे. लेकिन ये खबर नहीं बनी. जबकि मैक्केन के हादसे की ख़बर मीडिया में ख़ूब छाई.

बीमा कंपनियों के लिए काम करने वाली डेनिश फ़र्म सर्वे एसोसिएशन के डायरेक्टर हेनरिक ऊथ के मुताबिक़ इस तरह के हादसों की जांच में इंसानी ग़लती को ही ज़िम्मेदार मान लिया जाता है. जबकि हेनरिक की कंपनी ने कई हादसों की पड़ताल में पाया है कि जहाज़ पर सवार लोगों ने हादसा टालने की अपनी पूरी कोशिश की थी.

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption 2004 से लेकर अब तक दुनिया में जहाज़ी दस्तों का आकार वज़न के मामले में दोगुना हो गया है.

हेनरिक कहते हैं कि कोई भी ग़लती होने पर सबसे आसान होता है कैप्टन को मुजरिम साबित कर देना. सारी ग़लती उसी की मान ली जाती है. लेकिन हम ये भूल जाते हैं कि बहुत बार कैप्टन की सूझबूझ से ही जहाज़ कई बड़ी मुसीबतों से बच जाता है.

जहाज़ों का आपस में टकरा कर हादसों का शिकार होना एक बात है. इसके अलावा और बहुत सी वजहों से जहाज़ों का नुक़सान हो जाता है. जैसे, हाल के दिनों में उर्वरक से लदे एक ब्रिटिश कारोबारी जहाज़ एम.वी चेशायर में आग लग गई.

इस पर सवार सभी लोगों को हेलिकॉप्टर की मदद से बचाया गया. इस पर लदा सामान कई दिनों तक कनारी द्वीप में समुद्र में रिसता रहा. जहाज़ में आग किस वजह से लगी अभी तक पता नहीं लग पाया है.

कहने को समुद्र बहुत बड़ा है. लेकिन व्यापार के लिए इस पर अनगिनत जहाज़ चलते हैं. इसीलिए समुद्र रास्तों पर दबाव भी ख़ूब बढ़ गया है. इन जहाज़ों की संख्या में रोज़-ब-रोज़ इज़ाफ़ा हो रहा है.

ब्रिटिश सरकार के आंकड़ों के मुताबिक़ 2016 तक 58 हज़ार जहाज़ दुनिया भर में समुद्र से रास्ते तय कर रहे थे. 2004 के बाद से जो जहाज़ बने हैं उनका आकार और वज़न दोनों ही पहले के मुक़ाबले कई गुना ज़्यादा है.

क्या हादसे होते रहेंगे?

अब सवाल ये है कि अगर समुद्र में जहाज़ों का दबाव बढ़ रहा है, तो क्या मान लिया जाए कि ये हादसे होते ही रहेंगे?

हेनरिक ऊथ कहते हैं कि पानी के जहाज़ बहुत जटिल सॉफ्टवेयर की मदद से चलते हैं. लिहाज़ा इसके लिए माहिर लोगों की ज़रूरत है. 2008 की मंदी के बाद बहुत सी कंपनियों ने काम चलाउ क्रू मेम्बर भर्ती कर लिए हैं. अगर हादसों से बचना है तो अपने काम में माहिर लोगों को ही जहाज़ पर भेजना होगा.

हेनरिक के मुताबिक़ आज के नौसैनिक पूरी तरह से सिर्फ़ और सिर्फ़ तकनीक पर ही निर्भर करते हैं. जबकि ज़रूरी है कि कुछ देसी फार्मूले भी आज़माएं जाएं. क्रू मेम्बर्स को उन तरीक़ों के बारे में भी पता होना चाहिए.

इसी तरह, जैसे सड़कों पर ट्रैफ़िक के लिए अलग-अलग लेन बनाई जाती हैं, उसी तरह समुद्र में भी कारोबारी जहाज़ों, नौसैनिक जहाज़ों और क्रूज़ शिप के लिए अलग लेन होनी चाहिए. सभी जहाज़ अपनी अपनी लेन में ही चलेंगे तो हादसे कम होंगे.

समुद्री ट्रैफ़िक के लिए इस तरह की योजना सबसे पहले 1967 में ब्रिटेन में डोवर स्ट्रेट में अपनाई गई थी. आज दुनिया के कई देशों में छोटे पैमाने पर ऐसी सौ से ज़्यादा लेन बनाई गई हैं.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

पीटर रॉबर्ट्स कहते हैं कि जैसे ही जहाज़ हादसे का शिकार हो, उस पर सवार कर्मचारियों को तुरंत एक्शन में आना चाहिए. उस वक़्त अपनी सूझ-बूझ से वो जो कुछ भी कर सकते हैं उन्हें करना चाहिए. जैसे ही जहाज़ हादसे का शिकार होगा, उसमें पानी भरना शुरू हो जाएगा और जहाज़ का वज़न बढ़ने लगेगा. लिहाज़ा कोशिश होनी चाहिए कि तुरंत पंपिंग के ज़रिए अंदर घुसते हुए पानी को निकाला जाए.

ज़हाज़ों का आपस में टकराना किसी भी लिहाज़ से किसी के लिए भी मुफ़ीद नहीं है. अंतरराष्ट्रीय नियमों के मुताबिक़ नुक़सान होने पर दोनों ही पार्टियों को इसका ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ता है. इसीलिए हादसे को टालने की पूरी ज़िम्मेदारी कैप्टन पर ही आती है.

ख़तरा तो हमेशा रहेगा?

हालांकि इन हादसों के बावजूद हेनरिक को लगता है कि एक ख़बर तो अच्छी है. ख़बर ये है कि अब इस तरह के हासदों में कुल नुक़सान कम होता है. नुक़सान की इस दर में साल दर साल कमी आ रही है. बीमा कंपनी आलियांज़ के मुताबिक़ साल 2016 में कुल 85 बड़े जहाज़ हादसों का शिकार हुए. लेकिन गुज़रे साल के मुक़ाबले इस साल होने वाले नुक़सान में 16 फ़ीसद की कमी आई.

इसमें कोई दो राय नहीं कि नई तकनीक ने बड़े बड़े जहाज़ों के सफ़र को सुरक्षित बना दिया है. नई तकनीक की वजह से ही शिपिंग इंडस्ट्री में एक क्रांति आई है. लेकिन समुद्र में सफ़र करने वालों के लिए ख़तरा तो हमेशा बना ही रहता है.

इंसान हादसों को टालने की पूरी कोशिश करता है. फिर भी हादसा हो जाए तो क्या कहिए.

(मूल लेख अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)