मेन्यू की लिखावट में छुपा होता है खाने का स्वाद!

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दाल निज़ामी, शाही मुर्ग रोगनजोश, मुग़लई बिरयानी, रोस्टेड स्टफ्ड टोमैटो...

ये वो कुछ नाम हैं, जो आपने रेस्त्रां और होटल के मेन्यू कार्ड में लिखे देखे होंगे. आप ने अगर ग़ौर किया हो, तो ये भी देखा होगा कि कुछ व्यंजनों के नाम ख़ास अंदाज़ में लिखे होते हैं.

वहीं कुछ के मोटे अक्षरों में. कुछ ख़ास डिशेज़ तो आप नाम देखते ही ऑर्डर कर देते हैं. वहीं, कई बार आप लंबे-चौड़े नाम देखकर सोच में पड़ जाते होंगे कि आख़िर ये है क्या!

फिर आप वेटर को बुलाकर पूछते होंगे कि भई, ये लंबा-चौड़ा नाम जो लिख रखा है, वो है क्या बला?

साहब ये तो आपको लुभाने-फंसाने के लिए बुना गया जाल है. रेस्टोरेंट का मेन्यू कार्ड बनाना और व्यंजनों के नाम तय करना बाक़ायदा एक विज्ञान है. इसके पीछे अच्छी ख़ासी रिसर्च होती है. इनके भीतर कई राज़ छुपे होते हैं.

आप तो बस रेस्टोरेंट या होटल पहुंचते हैं. बेयरा आपके हाथ में एक शानदार मेन्यू कार्ड देता है और आप कर देते हैं ऑर्डर. कई बार अपनी पसंदीदा डिश तो कई बार आप किसी ख़ास नाम को पसंद करके वो डिश ऑर्डर करते हैं.

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान पढ़ाने वाले चार्ल्स स्पेंस कहते हैं कि मेन्यू कार्ड का कवर भी ग्राहकों को लुभाने के अंदाज़ में ही तैयार किया जाता है.

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मेन्यू बनाने में 18 महीने का समय

कई छोटी-छोटी चीज़ों के ज़रिए ग्राहकों को कुछ ख़ास व्यंजन ऑर्डर करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है. ये इशारे आप को समझ में नहीं आते. मगर मेन्यू कार्ड में इन्हें बहुत रिसर्च के साथ डाला जाता है.

कई बार तो मेन्यू कार्ड में शब्दों का फ़ॉन्ट बदलकर इन्हें और दिलकश बनाया जाता है, वहीं कई बार डिश के नाम मेन्यू कार्ड में जगह के हेर-फेर के साथ नए सिरे से पेश किए जाते हैं.

मेन्यू कार्ड में इस हेर-फेर को मेन्यू इंजीनियरिंग कहा जा रहा है. अमरीका के पाम स्प्रिंग्स इलाक़े में मेन्यू इंजीनियिरंग का काम करने वाले ग्रेग रैप कहते हैं कि किसी भी बड़ी रेस्टोरेंट चेन में रोज़ाना हज़ारों लोग आते हैं. ऐसे रेस्टोरेंट का मेन्यू कार्ड तय करने में क़रीब 18 महीने लगते हैं.

34 साल लंबे करियर में ग्रेग ने कई रेस्टोरेंट के लिए काम किया है.

वो कहते हैं कि, ''ग्राहक कुछ मिनट ही मेन्यू को देखते हैं. ऐसे में कोशिश ये होती है कि वो इस वक़्त का अच्छे से अच्छा इस्तेमाल कर सकें. अगर उन्हें जल्दी है तो हम मेन्यू कार्ड इस तरह से डिज़ाइन करते हैं कि उन्हें कुछ मिनट में ही अपनी पसंद की डिश मिल जाए.''

पहली चीज़ जो ग्राहक देखते हैं वो देखते हैं कि मेन्यू कार्ड कितना मोटा और शानदार है. इससे ग्राहकों को एहसास होता है कि वो किसी बड़े रेस्टोरेंट में हैं. यहां उन्हें अच्छी चीज़ खाने को मिलेगी.

इसी तरह मेन्यू कार्ड में लिखे शब्दों का फ़ॉन्ट भी काफ़ी मायने रखता है. इटैलिक में लिखे शब्द किसी डिश की क्वालिटी का भरोसा देते से लगते हैं. मुश्किल से समझ में आने वाले फ़ॉन्ट किसी डिश के स्वाद को लेकर उम्मीद जगाते हैं.

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स्वाद का आभास देने वाली लिखावट

स्विट्ज़रलैंड में एक रिसर्च में पता चला था कि जिस वाइन का नाम पढ़ने में मुश्किल आती है, उसे ग्राहक ज़्यादा पसंद करते हैं. वहीं नाम आसानी से पढ़े जाने वाले शब्दों में लिखें, तो ग्राहक उसमें उतनी दिलचस्पी नहीं लेते.

गोल-गोल लिखे गए शब्दों से मीठे व्यंजन का एहसास होता है. टेढ़े फ़ॉन्ट ग्राहक को संकेत देते हैं कि वो चीज़ कुछ नमकीन या तीखी होगी.

नाम को घुमा-फिराकर लिखना भी ग्राहकों को लुभाने का तरीक़ा होता है. जैसे कि चॉकलेट को इस तरह से लिखें कि ये बेल्जियम चॉकलेट है, जो अंदर से पिघली है और ऊपर से सख़्त.

या फिर एक ऐसी पुडिंग है, जो मशहूर आइसक्रीम ब्रांड शनल की आइसक्रीम से लैस है. किसी डिश के बारे में ऐसे लिखा होने से ग्राहक उसे एक बार चखने की कोशिश करते हैं.

रेस्टोरेंट एक और बहुत बार आज़माए हुए तरीक़े से अपने व्यंजन बेचा करते हैं. घर का खाना, दादी-नानी के हाथ की बनाई हुई भिंडी जैसा स्वाद. यानी कुछ ऐसा जो बरसों से ज़हन में याद के तौर पर बसा हो. ग्राहक ऐसी बातों से भी उस डिश को पसंद करते हैं.

इसी तरह कुछ चीज़ों के नाम घुमाकर बताने से भी लोग झांसे में आते हैं. जैसे कि डायनामाइट मिर्च, या मीठी, रसभरी हरी बीन्स. या फिर क्रिस्पी पकौड़े. नाम में ऐसे बदलाव से ही रेस्टोरेंट के उस व्यंजन की सेल 20 से 30 फ़ीसदी तक बढ़ जाती है.

किसी डिश का नाम ऐसा रखा जाए कि आप उसे बोलते वक़्त मुंह आगे से पीछे चलाएं, तो ऐसी डिश ज़्यादा बिकती हैं और ये बात जर्मनी में हुई एक रिसर्च से सामने आई है.

असल में जब आप कोई नाम पढ़ते हैं तो आपका दिमाग़ उसे लेकर तमाम बातें सोचना शुरू कर देता है. फिर उसके असर से जीभ में स्वाद की अपेक्षा पैदा होती है. घर परिवार या देश और इलाक़ों के नाम पर डिश बनाने से भी उसकी बिक्री बढ़ती देखी गई है.

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क़ीमतों में आकर्षण

आप को मेन्यू कार्ड में लंबे नाम वाले व्यंजनो से ख़ास तौर से सावधान रहना चाहिए. ये दूसरी डिश के मुक़ाबले यक़ीनन महंगी होती हैं. अमरीका की स्टैनफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर डैन जुराफ़्सकी ने ऐसी क़रीब 6500 डिश पर रिसर्च की.

उन्होंने पाया कि जिन के नाम लंबे थे, वो दूसरे व्यंजनों के मुक़ाबले महंगी थीं. जिसके बारे में मेन्यू में कुछ ज़्यादा ही तारीफ़ लिखी हो, वो ऑर्डर करने से बचना चाहिए. वो किसी आम-सी डिश को ख़ास बताकर महंगी बेचने का तरीक़ा होता है.

मेन्यू कार्ड में इस्तेमाल किए जाने वाले रंग भी काफ़ी अहम होते हैं. हरा रंग ये ज़ाहिर करने के लिए होता कि कोई डिश सेहत के लिए अच्छी है. नारंगी रंग का मतलब भूख बढ़ाना होता है. लाल रंग का मतलब ये है कि आप ये डिश फ़ौरन ऑर्डर कर दें. शायद इनमें होटल को ज़्यादा मुनाफ़ा होता है.

कई बार क़ीमतों में ज़रा-सी हेरा-फेरी कर के भी रेस्टोरेंट महंगी डिश को बेचने की कोशिश करते हैं. जैसे 600 की डिश को 599 रुपए या 100 रुपए की चीज़ को 99 बताकर बेचने की कोशिश होती है.

एक रुपए कम कर के आप को ये एहसास कराया जाता है कि फलां चीज़ तो बेहद सस्ती है. कई बार तो रेस्टोरेंट रुपए या दूसरी करेंसी का नाम भी नहीं लिखते.

रेस्टोरेंट में किसी डिश का नाम लिखने की जगह भी बहुत सोच समझकर तय की जाती है. महंगी चीज़ों के दाम सबसे ऊपर होते हैं ताकि नीचे की डिश आप को सही क़ीमत की लगें.

मेन्यू की सब से अहम जगह होती है, दाहिनी ओर सब से ऊपर. इसे मेन्यू कार्ड की सबसे अहम जगह कहा जाए तो ग़लत नहीं होगा. किसी डिश का नाम वहां लिखकर कई बार रेस्टोरेंट उसकी सेल बढ़ा लेते हैं.

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रखा जाता है मूड का ख़्याल

मेन्यू में बहुत सारे नाम लिखना अच्छा नहीं माना जाता. इससे ग्राहक को तय करने में भी दिक़्क़त होती है और कई बार वो खीझ भी जाते हैं. हां कुछ डिश के नाम बॉक्स में लिखने से ग्राहक उन्हें ट्राई करने की कोशिश करते हैं. वो उन्हें ख़ास समझते हैं.

एक और तरीक़ा जो ग्राहकों को लुभाने के लिए इस्तेमाल होता है, वो है डिश की तस्वीर नाम के साथ लगाना. पिघलती हुई चीज़ वाली डिश ज़ाहिर तौर पर आपको लुभाएगी. या फिर चटख रंग के साथ दिखने वाली मसालेदार पनीर की डिश आप ऑर्डर करना पसंद करेंगे.

हालांकि तस्वीरों के साथ दिक़्क़त ये होती है कि वो किसी डिश को लेकर ग्राहकों में उम्मीद ज़्यादा जगा देते हैं. जब असल डिश वैसी नहीं होती, तो ग्राहक निराश होते हैं.

मगर अब तो ज़माना ऑनलाइन और डिजिटल हो रहा है. इसलिए तस्वीरों और वीडियो में डिश को पेश करने की अहमियत बढ़ती जा रही है.

अब तो कई कंपनियां आई ट्रैकिंग तकनीक से ये भी पता लगा ले रही हैं कि आप क्या ऑर्डर करने वाले हैं. कई साल पहले पिज़्ज़ा हट ने ये तकनीक प्रयोग के तौर पर इस्तेमाल की थी.

जानकार मानते हैं कि मशीनी मानव यानी रोबोट भविष्य में आप के खान-पान और पसंद ना पसंद को आप से बेहतर जानने वाले होगे. वो आप के रेस्टोरेंट पहुंचने से पहले ही बता देंगे कि आप क्या ऑर्डर करने वाले हैं.

उत्तेजक नाम हो तो सब्जियां भी खींचती हैं

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