अब मुर्दों के लिए बहुमंजिला कब्रिस्तान का चलन

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मौत ज़िंदगी का सच है. जो दुनिया में आया है वो यहां से जाएगा भी. हर मज़हब में अंतिम संस्कार का कोई ना कोई तरीक़ा है.

पारसियों में अंतिम संस्कार का तरीक़ा सबसे अलग है. ये अपने मुर्दे को बुलंद टावर पर ले जाकर रख देते हैं. वहां गिद्ध और दूसरे परिंदे उसे अपनी ख़ुराक बना लेते हैं.

बहुत से मज़हबों के लोग मुर्दों को जलाकर अस्थियां पानी में बहा देते हैं. लेकिन इब्राहिमी मज़हब यानी इस्लाम, ईसाई और यहूदी धर्मों के मानने वाले अपने मुर्दों को दफ़नाते हैं. सारी दुनिया में इन्हीं की तादाद भी ज़्यादा है.

एक अंदाज़े के मुताबिक़ पिछले पचास हज़ार सालों में 101 अरब लोग दुनिया में आए और चले गए. आज की तारीख़ में 7 अरब से ज़्यादा लोग धरती पर रहते हैं. इन्हें भी एक न एक दिन दुनिया से जाना है. सवाल पैदा होता है कि इतने लोगों को दफ़नाने के लिए ज़मीन कहां से आएगी.

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क़ब्रों में मुर्दे नहीं गल रहे

धरती पर आबादी का दबाव बढ़ता जा रहा है. मुर्दों को ठिकाने लगाने के तरीक़े मुश्किल होते जा रहे हैं. मिसाल के लिए पारसियों ने अपने अंतिम संस्कार का पारंपरिक तरीक़ा छोड़ दिया है. क्योंकि गिद्ध ख़त्म होते जा रहे हैं. बहुत से यूरोपीय देशों में एक ही क़ब्र को 15 से 20 साल बाद फिर से इस्तेमाल कर लिया जाता है.

पिछले कुछ सालों में देखा गया है कि इतने सालों में भी लाशें पूरी तरह से गल कर ख़त्म नहीं हो रही हैं. जिसके चलते इन्हें जिस ज़मीन पर दफ़नाया गया है, उसका फिर से इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है. लिहाज़ा मुर्दे दफ़नाने के लिए नई ज़मीन तलाशी जा रही है. इसी तरह जर्मनी में भी पिछले चालीस सालों से क़ब्रों में मुर्दे गले नहीं हैं.

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अस्थि कलश के लिए लॉकर

क़ब्रों के लिए कम होती जगह के मसले से निपटने के लिए हांगकांग ने नया तरीक़ा अपनाया. यहां बड़े-बड़े हॉल बनाए गए हैं. जहां अस्थियां सालों साल रखी जा सकती हैं.

बैंक के लॉकर की तरह यहां अस्थि कलश रखने के लिए लॉकर ख़रीदना पड़ता है. लेकिन यहां भी जगह कम पड़ने लगी, और क़ीमत आसमान छूने लगी. एक अस्थि कलश रखने के लिए अदा की जाने वाली क़ीमत एक लग्ज़री फ्लैट ख़रीदने के बराबर होती है.

जगह की कमी इतनी ज़्यादा हो गई है कि यहां भी अस्थियां रखने के लिए लॉटरी सिस्टम लागू हो गया.

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बहुमंज़िला क़ब्रिस्तान का प्रचलन

हालांकि अब नए तरीक़े भी अपनाए जा रहे हैं. अधगली लाशों को कई तरह के केमिकल लगाकर समय से पहले पूरी तरह से गला दिया जाता है. इसके अलावा बहुमंज़िला क़ब्रिस्तान बनाने का चलन भी शुरू हो गया है. जहां एक ही मंज़िल पर बहुत से ताबूत हिफ़ाज़त से रख दिये जाते हैं.

इन मुर्दों के अज़ीज़ जब चाहें यहां अक़ीदत के फूल पेश करने आ सकते हैं. दावा किया जाता है कि इन बहुमंज़िला क़ब्रिस्तान में ज़मीन पर बनाए जाने वाले क़ब्रिस्तान से सात गुना ज़्यादा जगह होती है.

इस तरह के बहुमंज़िला कब्रिस्तान का चलन इज़राइल और ब्राज़ील में पहले से है. मुंबई और पेरिस में भी इक्का दुक्का ऐसे क़ब्रिस्तान मिल जाएंगे. लेकिन सवाल उठता है कि क्या ये बहुमंज़िला क़ब्रिस्तान मसले को पूरी तरह से हल कर पाएंगी.

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लेस इनोसेंट्स सिमिट्री

क़ब्रिस्तानों के लिए कम पड़ती जगह एक गंभीर विषय है. लंदन में ऐसे बहुत से उपनगरीय इलाक़े हैं, जहां क़ब्रिस्तान के लिए जगह बची ही नहीं है. यहूदी और मुस्लिम आबादी वाले इलाक़ों में तो हालात और भी गंभीर हैं.

एक अंदाज़े के मुताबिक़ अगर मुर्दे दफ़नाने का चलन यूं ही बरक़रार रहा तो 2050 तक दुनिया भर में क़ब्रिस्तान के लिए 6500 वर्ग किलोमीटर ज़मीन दरकार होगी. ये इलाक़ा अमरीका के न्यूयॉर्क शहर से पांच गुना ज़्यादा है.

सामूहिक क़ब्रों का रिवाज सदियों से रहा है. एक वक़्त था जब अठारह हज़ार से ज़्यादा मुर्दों को एक ही बड़े गड्ढे में डाल कर उसे बंद कर दिया गया.

पेरिस में 'लेस इनोसेंट्स सिमिट्री' ऐसा ही क़ब्रिस्तान था जहां बड़े पैमाने पर सामूहिक रूप से मुर्दों को दफ़नाया गया. यहां लाशों का इतना ढेर लग गया कि चर्च की दीवारों से इन लाशों को देखा जा सकता था.

जब मुर्दे दफ़नाने के लिए और ज़्यादा जगह की ज़रूरत पड़ी तो लोगों ने तेज़ी से ज़मीन को साफ़ किया. क़ब्रों में जो हड़्डियां बाक़ी बची थीं उन्हें निकाल कर मेहराबी बिल्डिंगों में ले जाकर रख दिया गया.

इनमें बहुत सी वो लाशें भी थीं जो अभी पूरी तरह से गली तक नहीं थीं. उस दौर में इन क़ब्रों का रख-रखाव अच्छी तरह से नहीं किया गया था. लेकिन आज ज़मीन के ऊपर जो क़ब्रिस्तान बनाए जा रहे हैं, वो बेहतर हालत में हैं.

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सबसे ऊंचा क़ब्रिस्तान

अमरीका के न्यू ऑरलियन्स और लूसियाना जैसे शहरों में तो बड़े पैमाने पर टावर वाले क़ब्रिस्तान हैं. इसीलिए इन्हें मुर्दों का शहर कहा जाता है. चूंकि ये शहर दलदली ज़मनी पर बसे हैं, लिहाज़ा यहां इस तरह के क़ब्रिस्तान बनना मजबूरी भी है.

टावर वाले क़ब्रिस्तानों में सबसे ऊंचा टावर ब्राज़ील का मेमोरियल नेक्रोपोल एक्यूमेनिका है जो 32 मंज़िला है. एक मंज़िल पर 1400 लाशें रखी जा सकती हैं. इसे 1983 में बनाया गया था. यहां का रख-रखाव आला दर्जे का है. इसीलिए यहां और मंज़िलें बनाने की मांग हो रही है.

यहां अस्थियां और ताबूत रखने के लिए अलग-अलग कमरे हैं. पारिवारिक मक़बरे भी हैं. इसके अलावा यहां श्मशान, तहखाने, छोटा गिरजा घर, कार म्यूज़ियम और बिल्डिंग की छत पर काफ़ी हाउस भी है. ये इमारत ख़ूबसूरत बाग़ीचों और झीलों से घिरी है. हरेक फ्लोर पर 150 क़ब्रें हैं जो पूरी तरह से हवादार हैं.

बहुत से यूरोपीय देशों की तरह यहां भी क़ब्रें ख़रीदने के बजाए किराए पर दी जाती हैं. मोटे तौर पर माना जाता है कि तीन साल में लाश गल कर ख़त्म हो जाती है. उसके बाद हड्डियां निकाल ली जाती हैं और मेहराबनुमा क़ब्रिस्तान में रख दी जाती हैं. फिर यही क़ब्र किसी और को दे दी जाती है. साफ़ सफ़ाई का ख़ास ख़्याल रखा जाता है. यहां बहुत सुकून और शांति है. ये इतनी ऊंचाई पर बना है कि यहां से पूरा शहर और समुद्र देखा जा सकता है.

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इस क़ब्रिस्तान का अनूठा तरीका

इज़राइल के शहर तेल अवीव में तो खुले क़ब्रिस्तान में क़ब्र ख़रीदने पर पाबंदी लगा दी गई है. यार्कोन क़ब्रिस्तान में हाल में बहुमंज़िला बनाने की तैयारी शुरू हुई है. यहां क़रीब ढाई लाख मुर्दे दफ़नाए जा सकेंगे. हालांकि रूढ़िवादी यहूदी शुरुआत में इसके ख़िलाफ़ थे. यहां जो लोग दफ़नाए जाते हैं उनकी याद में लकड़ी की एक छड़ बिल्डिंग के बाहर लगा दी जाती है. मृतक की पुण्यतिथि के दिन यहां रोशनी की जाती है.

मुर्दों को दफ़नाने का ये तरीक़ा सभी को पसंद आए, ऐसा भी नहीं है. लंदन में बहुत से क़ब्रिस्तानों को रिसाइकिल किया जाने लगा है. यहां की क़ब्रों का डिज़ाइन ऐसा है कि एक ही क़ब्र में छह लोगों को दफ़नाया जा सकता है. कुछ प्लॉट में दो लोगों को एक साथ दफ़नाने के लिहाज़ से भी क़ब्रें बनाई गई हैं. इनकी गहराई 10 से 12 फीट होती थी.

लंदन में लाशों को क़ब्रों से निकालना भी आसान नहीं है. इसे क़ानूनी मान्यता प्राप्त नहीं है. अगर कोई क़ब्र इस्तेमाल नहीं हुई है तो भी इसे 75 साल के बाद ही किसी और को दिया जा सकता है.

बहरहाल लाशें दफ़नाने का ये नया तरीक़ा किसी को पसंद हो या ना हो, लेकिन मुर्दों के लिए सिमटती जगह को देखते हुए कोई ना कोई क़दम तो उठाया ही जाएगा. ये बहुमंज़िला क़ब्रिस्तान शायद मौजूदा वक़्त में बेहतरीन विकल्प हैं.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

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