केवल एक औरत- मर्द धरती को फिर आबाद कर सकेंगे?

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Image caption महज़ एक औरत और एक मर्द मिलकर इंसान की नस्ल को बचा सकते हैं

मान लीजिए कि क़यामत आ जाए, और पूरी इंसानियत तबाह हो जाए. तो धरती को इंसानों से फिर से कैसे आबाद किया जा सकता है?

तकनीकी रूप से तो महज़ एक औरत और एक मर्द मिलकर इंसान की नस्ल को बचा सकते हैं. दोनों के संबंध से बच्चे पैदा होंगे. फिर उन बच्चों के बच्चे होंगे. इस तरह धरती पर इंसानों की आबादी फिर से बढ़ने लगेगी.

मगर, क्या सिर्फ़ एक मर्द और एक औरत मिलकर ये काम कर सकते हैं. विज्ञान की नज़र से देखें तो इस कल्पना में कई जोखिम नज़र आते हैं.

इस जोड़े की अगली पीढ़ी के बच्चों को आपस में यौन संबंध के ज़रिए नई नस्ल पैदा करनी होगी. इसमें सबसे बड़ा जोखिम बीमारियों का होगा.

क़यामत का तसव्वुर करने वाले ये मानते हैं कि धरती पर अगर सिर्फ़ 500 से 1000 मनुष्य बचते हैं, तो भी जल्द ही वो पूरी दुनिया को इंसानों से आबाद कर देंगे.

वैसे, सिर्फ़ एक जोड़ी जीवों से पूरी बस्ती आबाद करने की एक मिसाल ऑस्ट्रेलिया में देखी गई है.

ऑस्ट्रेलिया के पास एक द्वीप पर झींगे की क़रीब क़रीब ख़त्म हो चुकी नस्ल को ज़िंदा कर दिखाया गया है. इस नस्ल के सिर्फ़ दो केकड़े इस जज़ीरे पर बचे थे. ऑस्ट्रेलिया के पास लॉर्ड हो द्वीप पर इनकी रिहाइश थी. मगर 1918 में काले चूहों ने इनके ठिकाने पर धावा बोला और इन्हें चट कर गए.

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Image caption ऑस्ट्रेलिया के पास लॉर्ड हॉवे द्वीप

हॉकिंग की भविष्यवाणीः रोबोट करेंगे मानवता का ख़ात्मा

ऐसा मान लिया गया था कि इन केकड़ों की नस्ल का सफाया हो चुका है. मगर 2003 में दो खोजी वैज्ञानिकों ने एक चट्टान पर मुश्किल चढ़ाई करके इन दोनों को एक गुफा से निकाला. इन्हें लाकर मेलबर्न के चिड़ियाघर में रखा गया.

झींगों के इन आदम और हव्वा से आज की तारीख़ में क़रीब दस हज़ार झींगों का परिवार जमा हो गया है. कहां तो इनके विलुप्त होने का ख़तरा था और कहां ये बड़ी तेज़ी से फल-फूल रहे हैं.

मगर ये बात है केकड़ों की. इंसान के ख़ात्मे की सूरत में ये फॉर्मूला काम आएगा या नहीं, वैज्ञानिकों ने ये पता लगाने की कोशिश की, तो कई चुनौतियां सामने आई हैं.

वैज्ञानिक स्टीफ़न हॉकिंग ने भविष्यवाणी की है कि सौ साल बाद इंसान के बनाए हुए रोबोट इतने ताक़तवर हो जाएंगे कि मानवता का ही ख़ात्मा कर देंगे.

ऐसा हुआ, तो धरती पर इंसानियत को फिर से ज़िंदा करने के लिए एक मर्द और एक औरत की ज़रूरत होगी.

नासा जैसे वैज्ञानिक संस्थान और दुनिया के कई बड़े और संस्थान इस बारे में गंभीरता से सोच रहे हैं. असल में उनकी फ़िक्र, इंसानों की दूसरी दुनिया बसाने को लेकर ज़्यादा है.

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Image caption अगर एक ही परिवार के लोगों के बीच संबंध होंगे, तो आनुवांशिक बीमारियां पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ती जाएगी

लेकिन, अगर धरती पर वाक़ई क़यामत आ जाए तो?

यूं तो, क़ुदरती तौर तरीक़ों के हिसाब से तो सिर्फ़ दो इंसान, यानी एक पुरुष और एक औरत इंसानियत को ज़िंदा कर देंगे.

मगर सोचिए...इनकी अगली पीढ़ी में जो बच्चे होंगे, वो भाई-बहन होंगे, जिनके आपसी संबंध से ही अगली पीढ़ी हो सकेगी. ऐसे में इनके बच्चों में एक ही परिवार के गुण होंगे, कमियां होंगी.

मशहूर मनोवैज्ञानिक, सिग्मंड फ्रॉयड कहते थे कि समाज के लिए सबसे ख़राब जो दो बातें हैं उनमें से एक है अपने मां-बाप का क़त्ल और दूसरा, परिवार के लोगों के बीच जिस्मानी ताल्लुक़ात.

अगर एक ही परिवार के लोगों के बीच संबंध होंगे, तो, जो आनुवांशिक बीमारियां हैं, उनका असर पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ता जाएगा.

यूरोप के देश चेकोस्लोवाकिया में 1933 से 1970 के बीच पैदा हुए बच्चों के बीच सर्वे हुआ था. पता चला कि जिनके मां-बाप ऐसे थे जो किसी न किसी पुराने रिश्ते से जुड़े थे, उन बच्चों में से चालीस फ़ीसदी किसी न किसी बीमारी के शिकार थे.

आख़िर में इनमें से चौदह फ़ीसदी बेवक़्त चल बसे.

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Image caption जीन की वजह से न्यूजीलैंड का यह पक्षी आज लुप्तप्राय हो गया है

असल में हम सबके पास अपने जीन्स की दो कॉपी होती है. इनमें से एक मां से मिलती है तो दूसरी पिता से. लेकिन इनमें से कई जीन ऐसे होते हैं, जो तब तक छुपे रहते हैं जब तक उनका परफेक्ट मैच नहीं मिलता. ऐसा तभी होता है, जब आपके मां-बाप पहले के किसी न किसी रिश्ते से जुड़े हों. ये ख़ुफ़िया जीन, पीढ़ी दर पीढ़ी, छुपते-छुपाते आने वाली नस्लों में ट्रांसफर होते हैं, जैसे ही इनका परफेक्ट मैच मिलता है, ये जाग उठते हैं, हमें बीमार करते हैं.

वर्णांधता या कलर ब्लाइंडनेस की बीमारी को ही लें. आज की तारीख़ में हर तेंतीस हज़ार में से एक इंसान इस बीमारी का शिकार है. ये संख्या बेहद कम है. लेकिन पश्चिमी प्रशांत महासागर में स्थित एक छोटे से द्वीप पिंगलैप का हाल इसके ठीक उलट है. यहां अठारहवीं सदी में भयानक समुद्री तूफ़ान आया और द्वीप में रहने वाले बीस लोगों के सिवा बाक़ी सभी मारे गए. इन बीस लोगों में से एक को कलर ब्लाइंडनेस की बीमारी थी. पीढ़ी दर पीढ़ी, इनके आपसी संबंधों का नतीजा ये हुआ कि आज इस द्वीप पर रहने वाला हर दसवां आदमी इस बीमारी का शिकार है.

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Image caption 19वीं शताब्दी के यूरोपीय शाही परिवार में अंतः प्रजनन (निकट संबंधियों) के सबूत पाये गये

वैज्ञानिक इसी बात को लेकर ज़्यादा फ़िक्रमंद हैं

क्या हुआ अगर, तबाही हुई और जो दो लोग बच रहे, उनमे से किसी एक में ऐसे ही बीमारी के जीन हुए.तो होगा ये कि आगे चलकर कई लोग इस बीमारी के शिकार होंगे. ऐसे में मानवता पर आया ख़तरा बीमारी के तौर पर सिर पर सवार होगा.

हालांकि आदम और हव्वा के ऐसे आख़िरी जोड़े की कई संतानें सेहतमंद भी होंगी. लेकिन, बीमारी के छुपे हुए गुणसूत्र वाले लोगों के बीच अगर पीढ़ी दर पीढ़ी रिश्तेदारियां होती रहीं, तो बीमारियां भी ट्रांसफर होती रहेंगी.

स्पेन का हैब्सबर्ग राजपरिवार इसकी सबसे अच्छी मिसाल है. इस परिवार का आख़िरी राजा, सत्रहवीं सदी में हुआ चार्ल्स द्वितीय था. वो इतनी तरह की बीमारियों का शिकार था कि गिनना मुश्किल. सिर्फ़ 39 साल की उम्र में जब वो मरा तो उसका राज-पाट संभालने के लिए दूर दूर तक कोई रिश्तेदार नहीं था. असल में चार्ल्स द्वितीय से पहले के दो सौ सालों तक, यूरोप के तमाम राजपरिवार एक दूसरे के यहां अपने बेटे-बेटियों का ब्याह करते रहे थे. नतीजा ये कि तमाम बीमारियों के जीन्स छुपते-छुपाते इकट्ठे होते रहे. नतीजा चार्ल्स के तौर पर सामने आया, यानी बीमारियों का घर.

उसको विरासत में इतने बीमार पुश्तैनी जीन्स मिले थे कि गिनती करना मुश्किल. इससे बेहतर तो शायद तब भी होता जब उसके मां-बाप आपस में भाई बहन होते.

कहने का मतलब ये कि अगर, किसी प्रजाति की बहुत कम तादाद बचती है. तो उनका जीन पूल यानी गुणसूत्रों का बैंक, कम होता है. इसमें भी अगर कुछ बीमार जीन्स हुए, तो अगली पीढ़ियों के विस्तार की उम्मीद कम होती जाती है. क्योंकि इनकी आने वाली नस्लों के पास जो जीन पूल होता है, उसमें बीमारी वाले जीन्स की संख्या बढ़ जाती है.

कुछ वैज्ञानिक ये भी कहते हैं कि ये बहस ही बेवजह की है. आख़िर लाखों साल पहले इंसान का जन्म हुआ था तो हज़ार की भी तादाद नहीं थी. आज तमाम सबूत ये कहते हैं कि क़रीब दस लाख साल पहले, सिर्फ़ एक हज़ार इंसान धरती पर थे. फिर इनकी संख्या में इज़ाफ़ा हुआ.

ऐसे में अगर प्रलय आया और महाविनाश के बाद सिर्फ़ आदम और हव्वा बच रहे, तो भी इंसानियत फिर से ज़िंदा हो उठेगी.

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इसका सबसे अच्छी मिसाल है उत्तरी अमेरिका का हटेराइट समुदाय. इस समुदाय के लोग आपस में ही रिश्ते करते हैं. फिर भी, बीसवीं सदी की शुरुआत में इस समुदाय की जनसंख्या तेज़ी से बढ़ी, सिर्फ़ सत्रह सालों में इनकी आबादी दोगुनी हो गई.

ऐसी मिसालें हीं उम्मीद की किरण हैं.

अगर धरती पर सिर्फ़ एक मर्द और एक औरत बचे तो भी धरती की आज की आबादी की बराबरी में सिर्फ़ 556 साल लगेंगे. मगर इसकी एक शर्त है. हर औरत कम से कम आठ बच्चे पैदा करे. ये शर्त पूरी करना मुश्किल लगता है.

मुझको क़दम क़दम पे भटकने दो वाइज़ों

तुम अपना कारोबार करो, मैं नशे में हूं.

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