घड़ी जिसे देखकर आइंस्टाइन ने दी थी नई थ्योरी

इमेज कॉपीरइट Etcheverry Images/Alamy
Image caption ज़िटग्लॉग, बर्न

घड़ी का काम है सही वक़्त बताना. घड़ियां लम्हा-लम्हा चलते हुए, तारीख़ दर्ज करती हैं. और जब वो बरसों तक ऐसा करती रहती हैं, तो, ख़ुद भी तारीख़ यानी इतिहास बन जाती हैं.

ऐसी ही एक घड़ी स्विटज़रलैंड में मौजूद है. जिसका नाम है 'ज़िटग्लॉग'. ये घड़ी स्विटज़रलैंड की राजधानी बर्न की पहचान है. दूर दूर से लोग इसे देखने आते हैं. ये घड़ी क़रीब 500 साल पुरानी है. यूनेस्को ने इसे विश्व की धरोहर का दर्जा दिया है.

लकड़ी की घड़ी

घड़ी संग्रह करना कितने फ़ायदे का सौदा?

मार्टी वो शख़्स हैं जो पिछले चालीस सालों से इस दीवार घड़ी की देखभाल कर रहे हैं. वो इस घड़ी के इंजीनियर हैं. आज भी वो हर हफ़्ते क़रीब तीन से चार मर्तबा सैलानियों के ग्रुप को शहर की शान कही जाने वाली इस घड़ी को अंदर से दिखाने ले जाते हैं. और बड़े चाव से इसकी बारीकियां और ख़ूबियां उन्हें बताते हैं.

मामूली दीवार घड़ी नहीं

लेकिन इस घंटाघर के भीतर खड़े होकर मार्टी की बातें सुनने में दिक़्क़त होती है क्योंकि घड़ी की लगातार की टिक-टॉक ख़लल डालती है. इस घड़ी को बहुत ही दिलचस्प चीज़ों के साथ सजाया गया है.

हर एक घंटे में इस घड़ी में मुर्गे आकर बांग देने लगते हैं. जैसे जैसे घड़ी का पेंडुलम झूलता है उस पर बनाई गई मूर्तियां भी घूमती रहती हैं. जिन्हें 'क्रोनोस' कहा जाता है. इन मूर्तियों पर सोने के पत्तर चढ़े हैं.

इमेज कॉपीरइट Jon Arnold Images Ltd/Alamy
Image caption इसी दीवार घड़ी को देखकर आइंस्टाइन को रिलेटिविटी की थ्योरी का ख़याल आया था.

ये घड़ी कोई मामूली दीवार घड़ी नहीं है. बल्कि ये वो घड़ी है जिसे देखते हुए महान वैज्ञानिक आइंस्टाइन को अपनी 'थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी' का ख़याल आया था.

ये बात सन 1905 की है. एक शाम आइंस्टाइन ने इस घड़ी की आवाज़ सुनी. और सोचने लगे कि अगर कोई ट्राम, रौशनी की रफ़्तार से इस घड़ी से दूर भागे तो क्या होगा? सब रौशनी की रफ़्तार इतनी तेज़ होती है कि ट्राम, पलक झपकते ही बहुत दूर चली जाएगी.

लेकिन उसके मुक़ाबले घड़ी की टिक-टॉक की रफ़्तार धीमी रहती है, तो, चलती हुई घड़ी भी ट्राम की रफ़्तार के आगे रुकी हुई नज़र आएगी.

इसी घड़ी को देखते हुए आए ख़याल ने आइंस्टाइन को एक नई राह दिखा दी और उन्होंने छह हफ़्तों बाद ही एक नई थ्योरी के साथ अपना रिसर्च पेपर लिख डाला. इस पेपर का नाम था 'स्पेशल थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी'.

बाद में उन्होंने गुरूत्वाकर्षण और ऊर्जा के संबंध को बताते हुए समझाने की कोशिश की कि अंतिरक्ष में ग्रह और खगोलीय पिंड एक दूसरे के नज़दीक कैसे आते हैं. और पूरा ब्रह्मांड कैसे काम करता है. तो, जब आप स्विटज़रलैंड की राजधानी बर्न आएं, तो इस ऐतिहासिक घड़ी को देखना न भूलें.

इमेज कॉपीरइट Douglas Pearson/Getty

यहां एक म्यूज़ियम भी है जहां भौतिक विज्ञान की थ्योरी को वीडियो के ज़रिए समझाया जाता है. स्कूली बच्चे यहां आकर भौतिक विज्ञान की मोटा-मोटी समझ तो हासिल कर ही सकते हैं. वीडियो में आइंस्टाइन का एक कार्टून आता है जो अपनी थ्योरी को बहुत ही आसान तरीक़े से समझाता है.

हैरान रह जाते हैं लोग

इस घड़ी के काम करने के तरीक़े पर जितनी हैरानी यहां आने वाले सैलानियों को होती है उतनी ही हैरानी मार्टी को भी होती है. जबकि मार्टी साइंस और तर्क की बात करने वाले इंसान हैं. कभी-कभी उन्हें भी हैरानी होती है कि आख़िर ये घड़ी खुद ही कभी तेज़ और कभी धीमे कैसे चलती है.

मार्टी घड़ी को रोक कर ये दिखाने की कोशिश करते हैं कि कैसे रिपेयर के लिए इस घड़ी को रोक दिया जाता है. फिर ठीक हो जाने के बाद दोबारा उस वक़्त के मुताबिक़ सेट कर दिया जाता है.

इमेज कॉपीरइट Blaine Harrington III/Getty

बर्न शहर के लोग पिछले 500 सालों से इस घड़ी की टिक-टॉक सुनते आ रहे हैं. इतने सालों में उन्हें एक ही सबक़ मिला है कि समय कभी रूकता नहीं है. लिहाज़ा आप भी समय की रफ़्तार के साथ आगे बढ़ते जाइए और ज़िंदगी का लुत्फ़ उठाइए.

इसी क़ीमती वक़्त में से थोड़ा सा हिस्सा निकालकर बर्न भी घूम आइए. शायद आइंस्टाइन की तरह से ही आपको भी ये घड़ी देखकर कोई बड़ा ख़याल आ जाए.

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी ट्रैवल पर उपलब्ध है.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)