जापान में टैटू क्यों अच्छा नहीं माना जाता?

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टैटू या गोदना गुदवाने का चलन बहुत से देशों में है. फ़ैशनेबल लोग अक्सर अपने बदन पर तरह-तरह के टैटू गुदवाकर उसकी नुमाइश करते हैं. कई पश्चिमी देशों में तो इसे कला का दर्जा भी हासिल हो गया है.

दुनिया के कई बड़े अजायबघर और आर्ट गैलरी में टैटू आर्ट की नुमाइशें लगती हैं. लेकिन, जापान में टैटू को अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता. जापान में टैटू को इरेज़ुमी कहते हैं.

बहुत से जापानी टैटू को धमकाने का संकेत मानते हैं. वो इसे अंडरवर्ल्ड से जोड़कर देखते हैं. जापान के शहर ओसाका के मेयर तोरू हाशिमोतो साल 2012 से ही टैटू पर पाबंदी लगाने की मुहिम चला रहे हैं.

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टैटू के प्रति अच्छी सोच न होने के बावजूद जापान में गोदना गुदवाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है.

जापान में आम तौर पर पूरे शरीर पर इरेज़ुमी या टैटू बनाए जाते हैं. कई बार ये पूरी बांह या पैर पर भी बनाए जाते हैं. गर्दन, कलाई और टखने इन इरेज़ुमी की सरहदों के तौर देखे जाते हैं. इनके दायरे के बाहर टैटू नहीं बनाए जाते, ताकि इन्हें कपड़ों से ढंके रखा जा सके. क्योंकि, जापान में टैटू को अच्छा नहीं माना जाता.

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टैटू को लेकर जापान में ये ख़्याल सत्रहवीं सदी से पनपा. जापान में एडो युग (1603-1868) के दौरान इरेज़ुमी को क़ैदख़ाने की सज़ा के तौर पर बनाया जाता था.

अठारहवीं सदी में टैटू जापान के रेडलाइट इलाक़ों में बेहद लोकप्रिय होने लगे थे. वेश्यावृत्ति से जुड़े लोग अपने बदन पर ऐतिहासिक अभिलेखों को गुदवाया करते थे. उस वक़्त टैटू को पहले लकड़ी के खांचों में बनाया जात था, फिर उसके छापे बदन पर लगाए जाते थे.

इन खांचों के ज़रिए जापान की ऐतिहासिक और पौराणिक कहानियां बताई जाती थीं. साथ ही जापान के आध्यात्मिक गुरुओं की बातें भी गोदने के तौर पर गुदवाई जाती थीं.

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बहुत से लोग काबुकी थिएटर से जुड़ी बातें भी टैटू के तौर पर बनवाते थे. इसके अलावा जापान के इतिहास की सबसे पुरानी क़िताब, द क्रॉनिकल्स ऑफ़ जापान की बातें भी टैटू के तौर पर गुदवाई जाती थीं. कहते हैं कि ये क़िताब 720 ईस्वी में लिखी गई थी.

जापान में परंपरागत इरेज़ुमी कला के उस्ताद एलेक्स होरिकित्सुने रीन्के कहते हैं कि जापान में टैटू की नुमाइश करना देखने वाले पर हमले जैसा माना जाता है.

आप जापान में सार्वजनिक जगहों जैसे शौचालयों या ओनसेन (सार्वजनिक स्नानागार) में टैटू नहीं दिखा सकते. लोग इससे घबराते हैं. ऐसा करके आप दूसरे का अपमान करते हैं.

रीन्के कहते हैं कि इसकी बड़ी वजह ये है कि टैटू को आम तौर पर अंडरवर्ल्ड की निशानी माना जाता है. जापान के बदनाम माफिया गैंग याकुज़ा के सदस्य टैटू बनवाया करते थे. अलग-अलग याकुज़ा गैंग के सदस्य अलग तरह के टैटू बनवाते और इसकी नुमाइश किया करते थे.

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जापानी समाज में टैटू के प्रति इस नज़रिए की वजह से आज वहां ये कला ख़त्म होती जा रही है. टैटू गोदने वाले कलाकारों की कमी भी होती जा रही है. कुछ गिने-चुने बुजुर्ग कलाकार ही इस विरासत को आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी निभा रहे हैं.

इन्हीं में से एक है टैटू मास्टर होरियोशी तृतीय. होरियोशी ने अपनी पूरी उम्र इरेज़ुमी या टैटू बनाते हुए गुज़ार दी है. इस जापानी परंपरा को आगे बढ़ाने के दौरान उन्होंने जापानी ड्रैगन, सामंतों और समुराई लड़ाकों के सैकड़ों टैटू बनाए हैं.

होरियोशी कहते हैं कि इरेज़ुमी में आप जो भी टैटू बनाएंगे वो ऐतिहासिक क़िताबों से ही जुड़ा होना चाहिए. होरियोशी जापान के योकोहामा शहर में अपना टैटू स्टूडियो चलाते हैं.

ये जगह राजधानी टोक्यो से 40 किलोमीटर दूर है. वो कहते हैं कि ये हमारी ऐतिहासिक संस्कृति का हिस्सा है.

होरियोशी कहते हैं कि आज की तारीख़ में जापान की संस्कृति की जड़ें टूट रही हैं. आज लोग चाहते हैं कि उनके टैटू ख़तरनाक दिखें, या 'कूल' दिखें. मगर होरियोशी की नज़र में ऐसे टैटू बेकार हैं. वो कहते हैं कि इतनी उम्र में भी वो इसीलिए काम कर रहे हैं, ताकि टैटू की जापानी विरासत को ज़िंदा रख सकें.

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होरियोशी के पास आने वाले टैटू के शौक़ीन उनकी कला के मुरीद हैं. इनमें से कई लोग मानते हैं कि शरीर पर टैटू या इरेज़ुमी गुदवाने से उन्हें ताक़त का एहसास होता है. वो घंटों तक सुइयों से अपना शरीर चुभवाते रहते हैं. मगर ये दर्द सहना उन्हें मंज़ूर होता है.

होरियोशी बताते हैं कि वो जब 12 बरस के थे, तब उन्होंने अपनी बांह पर बुद्ध का पहला टैटू बनवाया था. 15 बरस की उम्र में होरियोशी और उनके दोस्त एक-दूसरे के बदन पर टैटू बनाया करते थे. 21 साल की उम्र में वो अपने उस्तादों होरियोशी प्रथम और द्वितीय से मिले. उनसे मुलाक़ात एक टैटू कन्वेंशन में हुई थी.

इसके बाद उन दोनों ने होरियोशी को ट्रेनिंग देकर टैटू गोदने का उस्ताद बनाया. दोनों उस्तादों ने होरियोशी के पूरे शरीर पर टैटू गोदकर उन्हें अपना शागिर्द बनाया और अपनी विरासत आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी सौंपी.

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आज की तारीख़ में जापान में इरेज़ुमी कला के जानने वाले सौ से भी कम उस्ताद बचे हैं.

होरियोशी पिछले चालीस से भी ज़्यादा सालों से टैटू बना रहे हैं. उम्र के सत्तरवें पड़ाव पर पहुंच चुके होरियोशी अब पूरी दुनिया में इस जापानी कला का प्रचार करने में जुटे हैं. योकोहामा में उनके टैटू स्टूडियो से कुछ ही दूरी पर है योकोहामा टैटू म्यूज़ियम. यहां पर इरेज़ुमी कला से जुड़ी तमाम चीज़ें देखने को मिलती हैं.

इस कला के ब्रिटिश उस्ताद रीन्के कहते हैं कि होरियोशी ने इरेज़ुमी को जिस मुकाम पर पहुंचाया है, वो बेहद शानदार है. उनकी ख़ाली की हुई जगह को भरना मुश्किल होगा. रीन्के ने भी होरियोशी से ही टैटू बनाने की कला सीखी थी.

रीन्के कहते हैं कि इस कला को सीखते वक्त हमारा अहंकार ख़त्म होता है. मतलब ये कि जब आप टैटू गोदते हैं, तो आप ख़ुद एक लहर की तरह आगे बढ़ते हैं. वो बताते हैं कि होरियोशी का पूरा काम जापानी सोच ज़ेन यानी इंसानियत से प्रभावित है.

होरियोशी तृतीय के बेटे भी उनसे ट्रेनिंग ले रहे हैं. उनका नाम सौरयू काज़ूयोशी है.

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जिगर ख़राब होने के बावजूद होरियोशी इस उम्र में भी बेहद सक्रिय हैं. वो आज भी टैटू गोदते रहते हैं. हालांकि इसके लिए वो पुराने तरीक़े के बजाय इलेक्ट्रिक सुई का इस्तेमाल करते हैं. आजकल वो इस कला पर एक डॉक्यूमेंट्री भी बना रहे हैं. साथ ही वो इरेज़ुमी पर एक क़िताब भी लिख रहे हैं.

होरियोशी कहते हैं कि लोग ये सोचते हैं कि ये टैटू बनाने वाले ही तो हैं. मगर वो नहीं जानते हैं कि ये बहुत पुरानी परंपरा है. जापान की ऐतिहासिक विरासत है, जिसे वो आगे बढ़ा रहे हैं.

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