स्कॉटलैंड के इस द्वीप पर केवल एक दिन के लिए जा सकते हैं

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दुनिया का हरेक कोना क़ुदरती ख़ूबसूरती से लबरेज़ है. कुछ हद तक तो हमने ये ख़ूबसूरती देखी है. लेकिन बहुत से ठिकाने अभी भी हमारी आंखों से ओझल हैं. हम दावा करते हैं कि आज हम उन जगहों पर भी पहुंच चुके हैं, जहां इंसान का पहुंचना नामुमकिन सा लगता है.

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जहां पर इंसान नहीं पहुंच सका है, उन जगहों के बारे में तमाम क़िस्से-कहानी प्रचलित हो जाते हैं. कई बार इंसानी बस्तियों के क़रीब ही कुछ हिस्से बे-आबाद होते हैं. इनको लेकर भी कहानियों और अफ़वाहों का लंबा सिलसिला चल निकलता है.

ऐसी ही एक जगह है स्कॉटलैंड का आइनहैलो द्वीप.

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दिल के आकार का द्वीप

आपने न इसका नाम सुना होगा, न ही नक़्शे में आसानी से ढूंढ पाएंगे क्योंकि इसका वजूद है ही इतना छोटा सा.

दिल के आकार का ये छोटा सा द्वीप बेहद ख़ूबसूरत है. इस द्वीप में आपको चमड़े की तरह नज़र आने वाली समुद्री घास मिलेगी. मौसम की मार झेलने वाले बड़े-बड़े पत्थरों से इस जज़ीरे के तट बने हैं. स्कॉटलैंड में पाई जाने वाली दूसरी चट्टानों की तरह यहां की चट्टानों का रंग-रूप भी वैसा ही है. लेकिन यहां आकर हरेक चीज़ हरकत करना बंद कर देती है.

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इस द्वीप से बहुत से क़िस्से, कहानियां, लोक कथाएं, और रीति-रिवाज जुड़े हैं. यहां बहुत से लोग तीर्थयात्रा के लिए भी आते हैं. दिलचस्प बात ये है कि इस द्वीप पर सिर्फ़ एक दिन के लिए ही आया जा सकता है. बाकी 364 दिन यहां आना संभव नहीं है.

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अपनी नाव से भी पहुंचना मुश्किल

ओर्कने से ये सिर्फ़ 500 मीटर की दूरी पर है. फिर भी यहां आना आसान नहीं है. अगर आपके पास अपनी नाव है, तो भी यहां नहीं पहुंच सकते क्योंकि यहां बहने वाली नदियों में ज्वार भाटे इतने ज़्यादा आते हैं कि वो आपका रास्ता रोक लेते हैं.

ओर्कने हेरिटेज सोसाइटी हर साल गर्मी के मौसम में यहां सैलानियों को लेकर आती है. इस सोसाइटी के ज़रिए ही आप इस जज़ीरे पर आ सकते हैं.

ओर्कने के लोग इस द्वीप से जुड़े कई तरह के क़िस्से सुनकर ही बड़े हुए हैं. यहां कि पौराणिक कथाओं में इसे भूत-प्रेतों का द्वीप भी कहा गया है. एक क़िस्से के मुताबिक़ इस द्वीप पर कुछ बुरी रूहों का साया है. जो भी शख़्स इस द्वीप पर आने की कोशिश करता है तो ये बुरी आत्मा इस द्वीप को हवा में ग़ायब कर देती है.

जलपरियों को लेकर रहस्यमय कहानियां

कुछ कहानियों में तो यहां तक कहा गया है कि इस द्वीप पर रहने वाली जलपरियां सिर्फ़ गर्मी के मौसम में ही बाहर आती हैं. इस तरह की रहस्यमय कहानियों ने इस द्वीप को एक पहेली बना दिया है.

यही वजह है कि बस्तियों के इतना क़रीब होने के बावजूद इस द्वीप पर इंसान के आने जाने और रिहाइश के बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं मिलती. क़िस्से कहानियों से ही पता चलता है कि ओर्कने द्वीप की तारीख़ तेरहवीं सदी में लिखी गई थी. इस तारीख़ में आइनहैलो की ज़िक्र नाम मात्र ही है.

स्कॉटलैंड की हाईलैंड्स यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर डेन ली कहते हैं कि 1851 में यहां चूहों से पैदा होने वाली ताऊन या प्लेग की बीमारी फैल गई थी. जिसकी वजह से यहां के लोगों को ये द्वीप छोड़ कर जाना पड़ा. जब ये पुख़्ता हो गया कि अब इस द्वीप पर कोई लौटकर नहीं आएगा, तो यहां के घरों को छोड़ दिया गया. आज यहां सिर्फ़ इन घरों के निशान बाक़ी हैं.

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पाषाण काल की दीवारें भी मिलीं

हालांकि प्रोफ़ेसर डेन ली के मुताबिक़ इंसानों ने इस द्वीप पर हज़ारों साल पहले ही दस्तक दे दी थी. बहुत से ऐसे सबूत मिलते हैं, जो बताते हैं कि ये आइनहैलो द्वीप पर इंसानों की आमदो-रफ़्त थी.

यहां कुछ पुरानी इमारतों के मलबे मिलते हैं. इन्हें देखकर इस द्वीप की तारीख़ का अंदाज़ा लगाया जा सकता है. पुरात्तत्वविदों का कहना है कि ख़ुदाई में यहां कुछ दीवारें ऐसी भी मिली हैं जो पाषाण काल की हैं.

आइनहैलो को होली आइल यानी पवित्र द्वीप भी कहा जाता है. अफ़सोस की बात है कि इस जज़ीरे पर रहने वालों ने इसकी तारीख़ी अहमियत को समझा ही नहीं.

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समुद्री परिंदों का डेरा यहां की चट्टान

पुरातत्वविदों का कहना है कि आइनहैलो पुरातत्व के नज़रिए से रिसर्च करने वाला जज़ीरा है. अगर इस की रिसर्च पर भरपूर पैसा ख़र्च कर दिया जाए तो इतिहास से पर्दा उठाने वाले बहुत से राज़ खुल जाएंगे. लेकिन ओर्कने में पाए जाने वाले संसाधनों के लिए इतनी मारामारी है कि आइनहैलो की पहेली को सुलझाने पर ध्यान ही नहीं दिया जाता.

अच्छी बात ये है कि जब से आइनहैलो से इंसानों का डेरा उठा, यहां क़ुदरत के दूसरे जीवों के फलने फूलने का मौक़ा निकल आया. यहां कई तरह के समुद्री परिंदों ने डेरा बना लिया है. यहां की चट्टानों में जगह जगह इन चिड़ियों के घोंसले नज़र आते हैं.

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पूरा जज़ीरा सुबह शाम चिड़ियों की चहचहाहट से गूंज उठता है. पर्यावरणविदों के लिए ये जगह किसी वरदान से कम नहीं हैं. यहां उन्हें रिसर्च के लिए तरह-तरह की चिड़ियां मिलती हैं. इस द्वीप की तारीख़ का इल्म किसी को नहीं है. लेकिन अगर यहां की सरकार थोड़ा सा ध्यान दे तो बहुत से राज़ खुल सकते हैं.

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