ऊपर धधकती आग और धुआं, नीचे सालों से सुलगती आग

झरिया में पहले गहने घने जंगल हुआ करते थे.
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झरिया में कोयले के भंडार होने का पता 18वीं सदी के अंत में चला. उसके बाद यहां प्राकृतिक संसाधनों का दोहन शुरु हुआ.

झारखंड के झरिया स्थित कोयला खदानों में लगी आग की तस्वीरों को दूसरा सालाना गेटी इमेजेज़ इंस्टाग्राम पुरस्कार मिला.

भारतीय फ़ोटोग्राफ़र रॉनी सेन को इन तस्वीरों के लिए 10,000 डॉलर का अनुदान भी मिलेगा.

रॉनी सेन ने उरुग्वे के क्रिश्चियन रॉड्रीग्ज़ और इथियोपिया के गिरमा बर्टा के साथ यह पुरस्कार जीता है.

सेन ने कहा, "झरिया के खदानों के अंदर यह आग सौ साल से भी ज़्यादा समय से जल रही है. यहां रहने वाले लोग जन्म से ही यह सब कुछ देख रहे हैं. लिहाज़ा, वे सब कुछ जानते हैं और यह उनकी ज़िंदगी का हिस्सा बन चुका है. "

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घर, मकान, स्कूल, मंदिर और दूसरी तमाम चीज़ें ज़मीन के नीचे धधकती आग में समा चुकी हैं

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ऊपर धधकती आग और धुआं, नीचे सालों से सुलगती आग

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आग की वजह से नष्ट हो चुके मंदिर का एक हिस्सा

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19वीं सदी के शुरू होते होते पूरा प्राकृतिक संसाधन झरिया इलाक़े से निकाला जा चुका था.

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अधिकारी इस्तेमाल होने लायक़ कोयला किसी तरह खदान से निकालने की कोशिश में रहते हैं.

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ठेके पर काम करने वाले इस मज़दूर को पांच ट्रक कोयला लादने पर तक़रीबन 130 रुपए मिलते हैं

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तड़के इस खदान के अंदर घुसकर कोयला निकालने के काम में लग जाती हैं ये महिला मज़दूर

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खदान के अंदर से कोयला निकालने वाला कर्मचारी

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ये बच्चे माता पिता का इंतज़ार कर रहे हैं, जो खदान के अंदर से कोयला निकालते हैं

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