ये थे वो मददगार लोग...

  • 22 नवंबर 2016
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Image caption कानपुर रेल हादसा

रविवार तड़के तीन बजे इंदौर-पटना एक्सप्रेस कानपुर के नज़दीक पुखरायां में पटरी से उतरी जिससे कम के कम 145 यात्रियों की मौत हो गई और सैकड़ों घायल हो गए.

सबसे पहले मदद के लिए घटना स्थल पर पहुँचने वाले आस-पास के गांव वाले थे. लोगों की मदद का जो सिलसिला रविवार सुबह से शुरू हुआ वह सोमवार रात तक जारी रहा.

चाहे वो पुखरायां हो या कानपुर का हैलट अस्पताल, घायलों और उनके रिश्तेदारों से ज़्यादा भीड़ उनके मददगारों की थी.

आम नागरिक के तौर पर या फिर किसी सामाजिक संस्थान के सदस्य की तरह, लोग मदद के लिए तत्पर थे और घायलों को हर तरह की राहत पहुँचाना चाहते थे.

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राकेश कुमार गुप्ता बी3 कोच में सफ़र कर रहे थे.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "मुझे ज़्यादा चोट नहीं लगी थी. ट्रेन के अंदर जो हाहाकार मची उसे मैं ज़िंदगी भर नहीं भूल पाऊंगा. मैंने अपने हाथ से शीशा तोड़ा और बहार कूदा. गाड़ी के बाहर भी चीख़, पुकार और लोगों का रोना देखा."

दुर्घटना स्थल पर सबसे पहले पहुँचने वालों में से दलेल पुर गाँव के सुरेश कुमार थे.

उनका कहना था, "अचानक बहुत तेज़ आवाज़ सुनाई दी जैसे कई सारे बम फटे हों. मेरा घर तीन किलोमीटर दूर था. उतनी रात को मैं गांव के कुछ लोगों के साथ घटना स्थल पर गया और लोगों को गाड़ी से बाहर निकाला. थोड़ी देर बाद पुलिस और दम कल विभाग के लोग पहुँचने लगे."

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सुरेश कहते हैं, "हमने उनकी मदद की पर जैसे-जैसे पुलिस वाले और दम कल विभाग के लोग पहुँचने लगे हम लोगों को पीछे कर दिया गया. पर हम लोग वहां किसी भी तरह की मदद के लिए रुके रहे,"

सोमवार सुबह अरुण मिश्र अपनी पत्नी गीता के साथ घटना स्थल पर एक थैला पकडे खड़े थे. थैले में पूड़ी और सब्ज़ी के पैकेट थे. वे दफ़्तर से छुट्टी लेकर वहां पहुंचे थे.

अरुण ने बीबीसी से कहा, "हमको लगा की हमसे जितनी मदद हो सके उतनी मदद कर दें,"

सोमवार की ही शाम रात के आठ बजे प्रितिपाल सिंह एक केतली और काग़ज़ के गिलास लेकर हैलट अस्पताल परिसर में घूम रहे थे और लोगों को चाय और बिस्कुट दे रहे थे.

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कानपुर के हैलट अस्पताल में दुर्घटना में घायल 60 लोगों का इलाज चल रहा है.

इमरजेंसी वॉर्ड के पास ही एक संस्थान शहरी जमीअत उलेमा-ए-हिंद, कानपुर ने एक स्टॉल लगा रखा है जहाँ फ़्री में पानी, चाय, और नाश्ता उपलब्ध है.

संस्थान के सदस्य इकराम अली कहते हैं, "जो भर्ती हैं और जो उनके तीमारदार हैं, सब बाहर के हैं. वे कहाँ से खाना-पीना जुटाएंगे. इसीलिए हम लोग मदद कर रहे हैं,"

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