कमज़ोर रुपए का आपकी थाली पर असर

  • 24 नवंबर 2016
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अमरीकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया गुरुवार को अगस्त 2015 के बाद सबसे निचले स्तर 68.86 पर पहुंच गया.

अगस्त 2015 में डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत 68.80 तक हो गई थी. नवंबर महीने में रुपए के मूल्य में तीन फ़ीसदी की गिरावट आई है. डोनल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति निर्वाचित होने के बाद से डॉलर के मुकाबले रुपए में लगातार कमज़ोरी का रुख रहा है.

किसी भी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा की क़ीमत उसकी मांग और पूर्ति पर निर्भर करती है. यानी अगर डॉलर की मांग ज्यादा है और पूर्ति कम तो रुपया कमज़ोर होगा और इसके विपरीत डॉलर की पूर्ति ज़्यादा है और मांग कम तो रुपया कमज़ोर होगा. हालांकि इसके कुछ अन्य कारण भी हो सकते हैं.

भारतीय अर्थव्यवस्था में डॉलर या तो निर्यात से आता है या फिर उसे रुपये का भुगतान कर ख़रीदना पड़ता है ताकि आयात बिल का भुगतान किया जा सके.

इसलिए फ़िलहाल रुपए के कमज़ोर होने से आयात और निर्यात प्रभावित होगा और इसका असर आम लोगों की ज़िंदगी पर भी होगा.

रुपये में आई तेज़ गिरावट ने भारत के केंद्रीय बैंक आरबीआई की चिंता बढ़ा दी और कारोबारियों का कहना है कि आरबीआई ने तुरंत कार्रवाई कर 50 करोड़ डॉलर की बिक्री की ताकि रुपये में गिरावट को थामा जा सके.

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आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक भारत के पास इस समय क़रीब पौने चार अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा उपलब्ध है जो कि मौजूदा आयात बिल के भुगतान के लिए अच्छा रिज़र्व माना जा सकता है.

भारत सरकार ने आठ नवंबर को 500 और 1000 रुपए के पुराने नोट को चलन से बाहर कर दिया है और नए करेंसी नोट जारी किए हैं ताकि काले धन पर लगाम लगाई जा सके और भ्रष्टाचार को नियंत्रित किया जा सके.

इसके साथ ही अमरीका में डोनल्ड ट्रंप के रूप में नए राष्ट्रपति चुने गए हैं जो पद संभालने के बाद देश की मौद्रिक नीति में बदलाव ला सकते हैं और इसका असर फ़ेडरल रिज़र्व रेट पर पड़ सकता है.

तो क्या नोटबंदी और अमरीकी फ़ेडरल रिज़र्व के दरों में संभावित बदलाव का डॉलर के मुकाबले रुपये की कमज़ोर होने में हाथ है? आर्थिक मामलों के जानकार जयंतो राय चौधरी इसकी वजह समझाते हैं -

रुपए के कमज़ोर होने के कारण -

अमरीकी फ़ेडरल रिज़र्व - डोनल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति पद संभालने के बाद संभावना है कि अमरीकी फ़ेडरल रिज़र्व द्वारा निर्धारित दरें बढ़ें. इस संभावना की वजह से रुपया कमज़ोर हुआ है. केवल रुपया ही नहीं, दुनिया की सभी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की करेंसी कमज़ोर हुई है.

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नोटबंदी - 500 और 1000 के नोट बंद होने के बाद बहुत से ऐसे लोग हैं जो जमा नकदी से विदेशी मुद्रा ख़रीद रहे हैं जिसकी इजाज़त दी गई है. इस मांग की वजह से भी डॉलर और यूरो के मुकाबले रुपया कमज़ोर हुआ है.

कच्चा तेल - ठंड के समय कच्चे तेल की कीमत में बढ़ोतरी होती है क्योंकि तेल मांग बढ़ जाती है. खासतौर से ठंडे देशों में. ऐसे में जो भी अर्थव्यवस्थाएं इस वक्त ज्यादा तेल ख़रीदती हैं उन्हें ज्यादा डॉलर का भुगतान करना पड़ता है जिसका असर वहां की स्थानीय मुद्रा पर पड़ता है. जो कि रूपए के साथ हो रहा है.

क्या रुपये में गिरावट जारी रहेगी?

अमरीकी फेडरल रिज़र्व के रेट के तय होते ही बाज़ार में स्थिरता आ जाएगी. दुनिया के तमाम उभरते बाज़ारों में स्थिरता आएगी और उनकी मुद्रा थोड़ी मज़बूत भी हो सकती है.

आयात पर असर - डॉलर के मुकाबले रुपए के कमज़ोर होने से आयात महंगा होगा. यानी कच्चा तेल, मशीनरी जैसी तमाम चीज़ें जो हम भारत में औद्योगिक विकास के लिए मंगाते हैं वो महंगी हो जाएंगी क्योंकि इनपुट कॉस्ट बढ़ जाएगा. दवाओं के कच्चे माल की कीमत बढ़ जाएगी. दाल जैसी आयात होनेवाली खाने-पीने की चीज़ें महंगी हो जाएंगी.

निर्यात पर असर - डॉलर के मुकाबले रुपए के कमज़ोर होने से विदेशों में भारतीय चीज़ें सस्ती हो जाती हैं. सस्ती होने की वजह से उनकी बिक्री बढ़ती है और भारत को ज्यादा डॉलर मिलता है. यानी निर्यातक रुपए की कमज़ोरी से फ़ायदे में रहते हैं.

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भारत की जीडीपी का तकरीबन 45 फीसदी विदेशी व्यापार से आता है यानी आयात-निर्यात से आता है. हमारे खाने-पीने, पहनने, दवाओं, आईफ़ोन लगभग हर चीज़ में विदेश का अंश जुड़ा हुआ है. विदेश का अंश जुड़ा होने से इसमें डॉलर जुड़ा हुआ है जिसका असर रुपये की कीमत और आखिर में भारत में विदेशी वस्तुओं की कीमत पर पड़ता है.

शेयर बाज़ार पर असर - जब रुपया डॉलर के मुक़ाबले कमज़ोर होता है शेयर बाज़ार में बिकवाली का दौर आता है. विदेशी निवेशक शेयर बेचकर बाज़ार से निकल जाते हैं जिसका रुपए पर ख़राब असर पड़ता है. लेकिन थोड़े समय बाद यही शेयर विदेशी निवेशकों के लिए आकर्षक भी हो जाते हैं क्योंकि रुपए के कमज़ोर होने की वजह से वो कम कीमत पर उपलब्ध होते हैं. ऐसे में निवेशक शेयर खरीदने लगता है. कहने का अभिप्राय ये कि रुपए के कमज़ोर होने का शेयर बाज़ार पर मिला-जुला असर होता है, तात्कालिक रूप से इसे अच्छा नहीं माना जा सकता.

आरबीआई का हस्तक्षेप कितना उचित?

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भारत के पास जो पौने चार अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है उसे एक मज़बूत भंडार कहा जा सकता है. ट्रेडर्स के मुताबिक फिलहाल आरबीआई ने जो 50 करोड़ डॉलर की बिक्री कर रुपए के गिरते मूल्य को थामने की कोशिश की है. ऐसी कोशिश आरबीआई करता रहता है जो कि ठीक भी है. लेकिन ये थोड़ा-बहुत ही संभव है. संरचनात्मक कारणों से जब रुपए के मूल्य में भारी गिरावट आएगी तो आरबीआई भी कुछ नहीं कर सकता क्योंकि उसके कारण मूलभूत अर्थव्यवस्था की मज़बूती या कमज़ोरी में निहित होते हैं. आरबीआई यही कोशिश करती है कि रुपए में ना तो तेज़ी से मज़बूती आए और ना ही उसमें तेज़ी से गिरावट दर्ज हो.

आम उपभोक्ता की थाली पर असर - आम उपभोक्ता पर अभी दोहरी मार है. पहले तो नोटबंदी से नकदी की कमी है. दूसरे, रुपए के कमज़ोर होने से आयात की जानेवाली दाल, खाने के तेल, दवाओं की कीमत बढ़ेगी. चीज़ों की किल्लत भी होगी क्योंकि जिन आयातकों ने पैसे का भुगतान कर दिया है वो चीज़ें मंगाने में विलंब कर सकते हैं ताकि रुपए की कीमत जब सुधरे तब वो चीज़ें मंगाएं और ज्यादा मुनाफ़ा कमाएं. इससे आयात आधारित उपभोक्ता वस्तुओं की कीमत बढ़ सकती है.

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