ग्राउंड रिपोर्ट: झरिया को निगल रही आग रोकने में किसी की दिलचस्पी नहीं

  • 17 अक्तूबर 2017

अगस्त के महीने का आख़िरी सप्ताह. तेज़ बारिश हो रही थी.

देश के कोयले की राजधानी धनबाद के झरिया में स्थित मोहरी बांध के लोगों के लिए ये दिन एक बुरे सपने की तरह आया.

ज़िन्दगी आम दिनों की तरह ही चल रही थी कि तभी लोगों को एक धमाका सुनाई दिया. ज़मीन हिलने लगी और देखते देखते एक पूरी बस्ती पाताल में समाने लगी.

प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि मकान ऐसे गिर रहे थे जैसे ताश के पत्ते हों. लोग घरों से निकलकर भागने लगे. इस क्रम में कुछ घायल भी हुए. बस्ती में अफ़रा तफ़री मची हुई थी.

धनबाद के कोयलांचल में ये नज़ारे आम हैं. कौन सी बस्ती का निशां कब मिट जाएगा किसी को पता नहीं. ये पूरा इलाक़ा एक ऐसी ज़मीन पर टिका हुआ है जो नीचे से पूरी तरह खोखला हो चुका है.

आग शहर को निगल रही है

चारों तरफ काली धूल, धुंआ, आग और ज़हरीली गैस. मानो कई ज्वालामुखी एक साथ धधक रहे हों. कोयलांचल में बसे झरिया को लोग अब 'आग का दरिया' कहकर ही बुलाते हैं.

पहले यहाँ खदानें भूमिगत थीं. मगर अब सिर्फ कुछ ही भूमिगत खदानें बचीं हैं जबकि सारा कोयला 'ओपन कास्ट' खदानों के ज़रिेए निकाला जा रहा है.

एक शताब्दी से भी ज़्यादा से कोयले में लगी आग अब शहर को भी निगलने लगी है. शहर के बीचों बीच सड़कों और मकानों का धंसना जारी है.

जो बस्तियां आज नज़र आ रही हैं, हो सकता है कुछ दिनों के बाद वो न हों. ज़मीन की आग भयावह रूप धारण करती ही जा रही है.

आम लोगों पर असर

मोहरी बांध की घटना से कुछ दिनों पहले झरिया के ही इंदिरा चौक का इलाक़ा ज़मींदोज़ हो गया था जिसमे बबलू ख़ान और उनका बेटा सैकड़ों फ़ीट भूमिगत आग के काल में समा गए.

मृतक बबलू ख़ान की साली शाहाना ख़ातून बताती हैं कि घटना सड़क पर उस जगह हुई जहां उनका घर था.

वो कहती हैं, "हम लोगों के दरवाज़े पर ही ज़मीन धंसी थी. हमलोगों को छोड़कर पीछे रहने वालों को दूसरी जगह ले जाया गया है. हम लोगों को ले जाकर स्कूल में डाल दिए हैं."

"आज एक महीने से हमलोग स्कूल में रह रहे हैं. अपना पकाते खाते हैं घर में आकर और वहां जाते हैं सोने के लिए. छोटे छोटे बच्चे लेकर कितना आना जाना करेंगे."

मोहरी बांध की घटना भी कुछ अलग नहीं थी. घटना के बाद से बस्ती के लोग सड़कों पर ही पनाह लिए हुए हैं. ज़मीन धंसने से बेघर हुए लोगों के पास ना रहने की कोई जगह है और ना ही दूसरा कोई सहारा.

शांति देवी अपने ज़मींदोज़ हुए मकान से अपना सामान निकालने के लिए जद्दोजहद कर रही थीं जब उनसे मेरी मुलाक़ात हुई.

सबकुछ चला गया

उन्होंने उस पल को याद किया जिसने उनकी बस्ती का चेहरा ही बदल दिया, "ज़मीन हिल रही थी. हमलोग खाना खा रहे थे. तभी ज़मीन में दरारें आने लगीं. अपने बच्चों को किसी तरह बाहर निकला. हम सब बर्तन छोड़कर भागे. हमारा सबकुछ ज़मीन ने निगल लिया है."

मोहरी बांध के रहने वाले भुनेश्वर रवानी दिहाड़ी मज़दूरी करके अपना पेट पालते रहे हैं. मगर घटना के बाद से वो काम पर नहीं जा पा रहे हैं.

घटना के दिन उनकी पत्नी घायल हो गयीं थीं. साथ में घायल पत्नी और सिर छुपाने को छत नहीं. उनके पास ना कपड़े हैं और ना ही कोई दूसरा सामान है.

वे बिलखते हुए अपनी आपबीती सुनाने लगे, "पत्नी को अस्पताल से लेकर आया हूं. वो चल नहीं पा रही है. उसकी कमर में चोट लगी है. अब हम लोगों के भरोसे हैं. वो दया कर कुछ देते हैं तब हम खाते हैं. हम बच गए किसी तरह यही बहुत है."

प्रशासन ने भूमिगत आग की वजह से धनबाद और चंद्रपुरा के बीच ट्रेनों के परिचालन को भी बंद कर दिया है.

अधिकारियों का कहना है कि ऐसा इसलिए किया गया है ताकि यात्री ट्रेनों को ज़मींदोज़ होने से बचाया जा सके.

इससे पहले भी धनबाद से पाथरडीह के बीच ट्रेनों के परिचालन को रोका गया और इस बीच के सभी स्टेशनों को भी बंद कर दिया गया.

हालांकि, सरकार के इस क़दम से स्थानीय लोगों को साज़िश की बू आ रही है.

आग रोकने में दिलचस्पी नहीं

उनका मानना है कि भूमिगत आग को फैलने से रोकने की बजाय इसके नाम पर 'दहशत फैलाने' का काम किया जा रहा है. लोग फ़ैसले के ख़िलाफ़ आंदोलन कर रहे हैं.

पेशे से वकील विजय झा कहते हैं कि कोयले में लगी आग पर जानबूझ कर क़ाबू नहीं किया जा रहा है.

उनका कहना था, "कोयला निकालने की मंशा है. आग तो एक बहाना है. आग के नाम पर भयभीत करना चाहते हैं जिससे लोग डरकर अपना घर, मकान और व्यापार छोड़कर पलायन कर जाएं और आसानी से कोयले को निकाला और बेचा जा सके."

भारत सरकार के विज्ञान एवं तकनीक मंत्रालय के अधीन 'सेंटर फ़ॉर माइन एंड फ्यूल रिसर्च' के निदेशक पी के सिंह कहते हैं कि भूमिगत आग को फैलने से रोका जा सकता है.

मगर, उन्हें लगता है कि इसे रोकने में कोई रुचि नहीं ले रहा है. ख़ास तौर पर कोयला निकलने वाली कंपनियां.

वो कहते हैं, "अग्नि प्रभावित क्षेत्र के लिए हमें किसी भी सक्षम एजेंसी से कोई चिट्ठी नहीं मिली है जिसमे ये कहा गया हो कि आपको आग के फैलने को रोकना होगा. अगर हमें कहा जाता है कि आप भूमिगत आग को फैलने से रोकने के प्रयासों का हिस्सा है तो इसके लिए हम सक्षम भी हैं और तैयार भी हैं."

कोयला क़ीमती है तो इंसानी ज़िंदगियां भी. अब सरकारी महकमे को लगता है कि इस समस्या का समाधान झरिया के लोगों को ही हटाकर ढूंढा जा सकता है.

मगर ये तेज़ आग की लपटें मरे हुए शहर की दास्ताँ सुनाती रहेंगी.

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