राजनीतिक संरक्षण में फलते-फूलते रहे आसाराम बापू

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आसाराम बापू की क़िस्मत का फैसला जोधपुर की अदालत पर निर्भर है, मगर राजनीतिक रूप से आसाराम को काफ़ी रसूखदार माना जाता रहा है.

भारतीय जनता पार्टी हो या फिर कांग्रेस- आसाराम बापू के राजनीतिक शागिर्दों की लम्बी फ़ेहरिस्त रही है.

चाहे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी हों या वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी - हर कोई बापू का आशीर्वाद लेने उनके आश्रम जाते रहे हैं.

लेकिन जब आसाराम बापू पर शिकंजा कसना शुरू हुआ तो लोगों ने उनसे दूरियां बना लीं.

बदली हुई परिस्थितियों में कोई भी राजनेता उनके साथ नज़र आना नहीं चाहता है. लेकिन उनके भक्तों की आस्था उनमें बनी रही है.

उन पर ज़मीन हड़पने के मामले से लेकर आश्रम में दो बच्चों के शवों की बरामदगी के मामलों के बावजूद उनके भक्तों की श्रद्धा में कोई कमी नहीं आई और वो उनकी गिरफ्तारी के ख़िलाफ़ लगातार प्रदर्शन करते आ रहे हैं.

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आसाराम का रसूख

हालांकि जोधपुर में धारा 144 के तहत निषेधाज्ञा लागू कर दी गई है, लेकिन दिल्ली के जंतर मंतर पर लगातार धरना देने वाले उनके भक्त जोधपुर रवाना हो चुके हैं.

जानकारों का मानना है कि मूलतः व्यापारी वर्ग ही ऐसा है जो उनकी रिहाई का विरोध कर रहा है.

ऐसे आरोप हैं कि आसाराम बापू ने काफ़ी पैसा व्यापारियों को दिया था. जेल से रिहाई की सूरत में उन्हें उस पैसे का हिसाब देना पड़ेगा.

बीबीसी की गुजराती सेवा के सम्पादक अंकुर जैन कहते हैं कि उन्होंने एक दौर ऐसा भी देखा है जब किसी अख़बार में आसाराम बापू के ख़िलाफ़ कोई ख़बर छपती थी तो उनके समर्थक हफ्ते-हफ्ते भर तक उस पत्रिका या अख़बार के दफ्तर के सामने धरने पर बैठ जाया करते थे.

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आसाराम के जेल जाने के बाद परिस्थितियां बदल चुकी हैं. कई नेता और कार्यकर्ता उनके साथ नज़र नहीं आना चाहते.

सामाजिक कार्यकर्ता मनीषी जानी ने बीबीसी से बातचीत के दौरान आरोप लगाया कि सबकुछ के बावजूद आसाराम बापू को एक तरह का राजनीतिक संरक्षण भी हासिल है.

उन्होंने विधानसभा का हवाला देते हुए कहा कि नौबत यहां तक आ गई कि आसाराम बापू के मुद्दे पर विधानसभा में इतना जमकर हंगामा हुआ जिसमें माइक तक उखाड़े गए.

गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी भी उनके आश्रम जाते रहे थे. इससे आसाराम बापू को लगा कि क़ानून के हाथ उन तक नहीं पहुँच सकते हैं.

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राजनीतिक संरक्षण

लेकिन नरेंद्र मोदी ने जल्द ही बापू से दूरियां बना लीं और आसाराम बापू पर क़ानूनी शिकंजा कसना शुरू हो गया. जो राजनेता उनके साथ नज़र आना चाहते थे उन्होंने आसाराम बापू से दूरियां बनानी शुरू कर दीं.

जब आसाराम बापू के आश्रम से दो शव बरामद हुए तो माहौल ही उल्टा हो गया और गुजरात में नरेंद्र मोदी की तत्कालीन सरकार ने उनके आश्रमों पर छापेमारी शुरू कर दी.

कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता मनीष दोशी को लगता है कि इन तमाम आरोपों के बावजूद आसाराम बापू को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है. दोशी का आरोप है हाल ही में संपन्न विधानसभा के चुनावों में इतना तो पता चल ही गया कि भारतीय जनता पार्टी का जनाधार खिसक रहा है.

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वो कहते हैं, "भाजपा जानती है कि बापू के आने से जनाधार बढ़ेगा. ये सर्वविदित है कि आसाराम ने इतनी संपत्ति और ज़मीन सरकार के संरक्षण से ही हासिल की है कि अब अगर वो छूट कर आते हैं तो वो उन्हीं के लिए काम करेंगे जो उनकी शरण में जाते रहे हैं."

कांग्रेस को लगता है कि आसाराम बापू अगर जेल से बाहर आते हैं तो राजनीतिक मित्रों के लिए ही काम करेंगे. "भाजपा को इस वक़्त उनकी बहुत ज़रूरत है क्योंकि उसका जनाधार खिसक रहा है और आसाराम बापू के समर्थकों या भक्तों की तादाद काफ़ी है.

हालांकि आसाराम बापू के भक्तों को लगता है कि उनके गुरु को झूठे आरोपों में बंद किया गया है और उन्हें एक सोची-समझी साज़िश के तहत जेल भिजवाया गया है. वो यह भी मानते हैं कि आसाराम बापू पर लगाया गया बलात्कार का आरोप भी ग़लत हैं.

फ़िलहाल जोधपुर के प्रशासन ने एहतियाती क़दम पहले से ही उठा लिए हैं ताकि आसाराम बापू के समर्थक हिंसा पर उतारू ना हो जाएँ. बलात्कार की पीड़ित के घर पर भी सुरक्षा बढ़ा दी गई है.

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