आंध्र प्रदेश: 13 घंटों में 37 हज़ार बार बिजली कैसे गिरी

  • सलमान रावी
  • बीबीसी संवाददाता
आसमानी बिजली

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प्राकृतिक आपदा की बढ़ती घटनाओं को अक्सर जलवायु परिवर्तन से जोड़ा जाता है.

जलवायु परिवर्तन का असर दुनिया भर में है और इससे भारत भी अछूता नहीं है. दक्षिण भारत में तो हाल के दिनों में कुछ ऐसी आपदा देखने को मिली है जिनके बारे में रहस्य सुलझना अभी बाक़ी है.

आंध्र प्रदेश में पिछले महीने 24 मई तटवर्तीय इलाक़ों में महज 13 घंटों के भीतर कुल 37 हज़ार बार आसमान से बिजली गिरी.

आंध्र प्रदेश सरकार के मुताबिक़ आसमानी बिजली से सिर्फ़ मई महीने में ही 15 लोगों की जान गुंटूर ज़िले में गई.

गुंटूर के एसपी वेंकटा अपाला नायडू कहते हैं कि यह उनके ज़िले के लिए अप्रत्याशित घटना है.

घटनाएँ

एसपी का कहना है कि इससे पहले पूरे एक साल में बिजली गिरने से तीन या चार लोगों की मौत होती थी.

उन्होंने कहा, "पहले ऐसी घटना कभी दर्ज नहीं की गई जब सिर्फ़ 13 घंटों के भीतर 37 हज़ार बार बिजली गिरी हो."

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गुंटूर के अननतारम गांव के राघवा रेड्डी अपने खेत में काम कर रहे थे तभी बादल गरजने लगे और एक के बाद एक बिजली गिरनी शुरू हो गई.

रेड्डी ख़ुशक़िस्मत थे कि वो बच गए. उस दिन की घटना को याद करते हुए रेड्डी का कहना था, "हम तीन लोग थे जो खेत में काम कर रहे थे जब अचानक बादल घिर आए और बिजली कड़कने लगी.''

''तेज़ बारिश से बचने के लिए मेरे दो साथियों ने पेड़ के नीचे शरण ली. मैं उनसे कुछ ही दूरी पर था. मैंने उन्हें यहीं पर मरते हुए देखा. बिजली गिरने की वजह से मैं भी ज़ख़्मी हो गया था."

चेतावनी

अपने दो बेटों को खो देने वाली जोनाला कोटेश्वरम्मा भी उस घटना को याद कर सिहर उठती हैं. पूरा गावं अभी भी सदमे में है.

बुज़ुर्ग हो चुकीं कोटेश्वरम्मा ने अपनी पूरी उम्र में ऐसा मंज़र नहीं देखा था.

बातचीत के दौरान वो रोने लगती हैं, "मैं अपने घर में ही बैठी हुई थी जब गांव का एक लड़का दौड़ता हुआ मेरे पास आया और बोला की खेत में बिजली गिरी है. बिजली कड़कने की ऐसी आवाज़ मैंने पहले कभी नहीं सुनी थी. लग रहा था कि कान के परदे फट जाएंगे."

कोक्कीली चेन्ना राव मछुआरा हैं. उनका कहना है कि सरकार तूफ़ान और ख़राब मौसम की चेतावनी देती है, मगर कोई चेतावनी को गंभीरता से नहीं लेता.

वो कहते हैं कि मच्छ्लीपट्नम के तटवर्तीय इलाक़ों में मौसम ख़राब होने पर सरकारी अधिकारी जगह-जगह लाल झंडे लगा देते हैं.

उन्होंने आरोप लगाया कि यहां के मछुआरे, स्थानीय अधिकारियों को रिश्वत दे देते हैं और समुद्र में चले जाते हैं. इसी लिए इतनी मौतें हो रही हैं.

मोबाइल ऐप

सेना के रिटायर्ड कर्नल संजय श्रीवास्तव को आंध्र प्रदेश की सरकार ने अपना आपदा प्रबंधन विभाग का सलाहकार बनाया है. वो कहते हैं कि राज्य सरकार ने मौसम की अप्रत्याशित घटनाओं की वजह से लोगों को सचेत करने के लिए एक मोबाइल ऐप बनाया है.

कर्नल श्रीवास्तव ने बताया, "अब सबके पास पास मोबाइल फ़ोन है. मोबाइल ऐप सतर्क करेगा. आपदा की स्थिति में लोगों को क्या करना है यह भी बताएगा."

चिंता

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समाप्त

मौसम वैज्ञानिक मानते हैं कि मॉनसून से पहले तटवर्तीय इलाक़ों में तूफ़ान का आना कुछ अप्रत्याशित नहीं है.

मगर, जिस पैमाने पर इस साल तूफ़ान आने का सिलसिला शुरू हुआ है और जिस हिसाब से बिजली गिरी हैं वो चिंताजनक है.

भारतीय मौसम विभाग के महानिदेशक और देश के जाने माने मौसम वैज्ञानिक केजे रमेश कहते हैं कि मौसम वैज्ञानिकों की टीम उन कारणों की जांच कर रही है जिसकी वजह से सिर्फ़ आंध्र प्रदेश के तटवर्तीय इलाक़ों में ही बिजली गिरने की घटनाएं हुईं.

रमेश का कहना है कि मॉनसून से पहले पश्चिमी विक्षोभ यानी 'वेस्टर्न डिस्टर्बेंस' होना कुछ अप्रत्याशित नहीं है.

वो कहते हैं कि जब भी तापमान बढ़ता है तो 'वेस्टर्न डिस्टर्बेंस' की वजह से आंधी भारत के विभिन्न हिस्सों से टकराती हैं.

उन्होंने कहा, "जिन इलाक़ों में मौसम ख़ुश्क यानी सूखा होता है- जैसे राजस्थान के रेतीले इलाक़े, तो यह हवा धूल भरी आंधी पैदा करती है. फिर जैसे-जैसे तूफ़ान आगे बढ़ता है तो कुछ राज्यों में हवा की नमी से टकराने के बाद उससे बादल पैदा होते हैं और बिजली कड़कती है. ये आम बात है. कुछ भी अप्रत्याशित नहीं है. मगर सिर्फ़ 13 घंटों में 37 हज़ार बार बिजली का गिरना चिंताजनक है. हम कारण पता करने की कोशिश कर रहे हैं."

मॉनसून अभी उत्तर भारत में दस्तक नहीं दी है. मगर पिछले 24 घंटों में मुंबई में हो रही प्रलयकारी बारिश की वजह भी 'वेस्टर्न डिस्टर्बेंस' ही बताई गई है.

यानी अरब सागर से उठने वाली हवाओं की वजह से ही इस तरह की बारिश मॉनसून से पहले हो रही है. अब जब मॉनसून दक्षिणी भारत में दस्तक दे रहा है, आंध्र प्रदेश में बिजली गिरने की घटनाओं में तेज़ी सबके लिए चुनौती बन चुकी है.

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