क्या पाकिस्तान की राह पर चल पड़ा है श्रीलंका?

  • 1 नवंबर 2018
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अक्टूबर की 26 तारीख़. अचानक रात को श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना घोषणा करते हैं कि उनका गठबंधन यानी - 'यूनाइटेड पीपुल्स फ़्रीडम अलायन्स' प्रधानमंत्री रनिल विक्रमसिंघे की सरकार से अपना समर्थन वापस ले रहा है.

उसी रात वो रनिल विक्रमसिंघे को हटाकर महिंदा राजपक्षे को प्रधानमंत्री बनाये जाने की घोषणा भी करते हैं. उन्होंने संसद को भी 16 नवंबर तक के लिए निलंबित कर दिया है.

राष्ट्रपति के इस फ़ैसले ने श्रीलंका को संवैधानिक और राजनीतिक - दोनों संकटों के बीच ला खड़ा कर दिया है.

जानकार मानते हैं कि श्रीलंका में जो कुछ हो रहा है वो बिल्कुल वैसा ही है जैसा पकिस्तान में होता रहा है.

'इंस्टीट्यूट ऑफ़ डिफ़ेन्स स्टडीज़ एंड एनालिसिस' (आईडीएसए) में दक्षिण एशिया के मामलों की विशेषज्ञ स्मृति पटनायक ने बीबीसी से बात करते हुए इसे 'राजनीतिक कू' की संज्ञा दी है.

वो कहती हैं कि श्रीलंका में जो कुछ हो रहा और जिस तरह हो रहा है वो उसी तर्ज़ पर है जैसा पकिस्तान में अक्सर देखने को मिलता है.

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वो कहती हैं: "रातो-रात सरकारें अपदस्त होना. अचानक सरकारों का बर्ख़ास्त होना हम इस उपमहाद्वीप में सिर्फ़ पकिस्तान में ही देखते आये हैं. अब श्रीलंका भी उसी राह पर है. जब भी पकिस्तान में ऐसा होता है तो सबसे पहले सरकारी समाचार चैनल पीटीवी पर और पकिस्तान रेडियो पर क़ब्ज़ा होता है. श्रीलंका में भी ऐसा ही हुआ."

श्रीलंका की संसद के स्पीकर ने भी स्पष्ट किया है कि वो विक्रमसिंघे को ही प्रधानमंत्री मानते हैं.

वो इसलिए क्योंकि जब तक कोई राजनीतिक दल का नेता अपने दल या गठबंधन का बहुमत सदन में साबित नहीं कर देता, तब तक वो प्रधानमंत्री नहीं बन सकता.

लेकिन स्पीकर को संसद का सत्र आहूत करने का अधिकार नहीं है. सत्तारुढ़ 'यूनाइटेड नेशनल फ्रंट' के घटक दल - आल सीलोन मुस्लिम कांफ्रेंस के सदस्य और श्रीलंका के पूर्व मंत्री हुसैन अहमद भायला कहते हैं कि ये अधिकार सिर्फ राष्ट्रपति को ही है.

कोलम्बो से फोन पर बात करते हुए भायला कहते हैं, "स्पीकर को सत्र बुलाने का अधिकार है या नहीं इस पर बहस चल रही है. ये एक तरह का संवैधानिक संकट है. मगर अभी तक राष्ट्रपति ही संसद का सत्र बुलाते आये हैं."

वहीं, राजपक्षे ने प्रधानमंत्री पद की शपथ भी ले ली है और वो अपने मंत्रिमंडल की घोषणा भी करने वाले हैं. मगर रनिल विक्रमसिंघे भी प्रधानमंत्री बने हुए हैं क्योंकि अभी तक राजपक्षे ने संसद में अपना बहुमत साबित नहीं किया है.

कुछ जानकार मानते हैं की राष्ट्रपति किसी प्रधानमंत्री को बर्ख़ास्त नहीं कर सकते हैं.

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अब ताज़ा जानकारी ये है कि राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना ने उनपर पड़ रहे दबाव के सामने हार मान ली है और संसद का सत्र बुलाने को सहमति दे दी है ताकि देश के राजनीतिक संकट का समाधान किया जा सके.

क्या प्रधानमंत्री की बर्ख़ास्तगी संभव

2015 में ही इस संबंध में संवैधानिक संशोधन भी किया गया था. इस संशोधन के तहत राष्ट्रपति तब तक प्रधानमंत्री को बर्ख़ास्त नहीं कर सकते जब तक प्रधानमंत्री ख़ुद इस्तीफ़ा नहीं दे देते हैं या फिर वो विश्वास मत हार जाते हैं.

कहा जा रहा है कि राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना और प्रधानमंत्री रनिल विक्रमसिंघे के बीच रिश्ते तभी से ख़राब होने शुरू हो गए थे जब स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजे सामने आये जिसमें राजपक्षे के गठबंधन - श्रीलंका पोडूजाना पेरामुना ने अच्छी जीत दर्ज कराई.

इन चुनावों में सिरीसेना की 'यूनाइटेड पीपल्स फ्रीडम अलायन्स' और रनिल विक्रमसिंघे की 'यूनाइटेड नेशनल फ्रंट' को हार का सामना करना पड़ा था.

सिरीसेना और विक्रमसिंघे ने इस हार के लिए एक दूसरे को ज़िम्मेदार ठहराया. इसी बीच राष्ट्रपति सिरीसेना ने विक्रमसिंघे के इस्तीफ़े की मांग भी कर डाली. परिणामों के फ़ौरन बाद विक्रमसिंघे ने संसद में विश्वास मत भी हासिल कर लिया था.

सिरीसेना और रनिल विक्रमसिंघे के गठबंधन ने 2015 में राजपक्षे के गठबंधन को हराया था. राजपक्षे ने चुनावी पराजय की ज़िम्मेदारी भारत की रिसर्च एंड एनालिसिस विंग यानी - रॉ पर डाल दी थी.

कुछ दिनों पहले विक्रमसिंघे ने भी रॉ पर आरोप लगाया था. बाद में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात की और अपने शब्द वापस लिए.

चीन ने राजपक्षे को बधाई दी जबकि अमरीका और यूरोपीय यूनियन ने श्रीलंका के राजनीतिक हालात पर चिंता जताई है.

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Image caption श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना, भारतीय पीएम नरेंद्र मोदी और श्रीलंका के प्रधानमंत्री विक्रमासिंघे

भारत ने श्रीलंका के हालात पर कोई टिप्पणी नहीं की है.

सरकार की तरफ से सिर्फ इतना कहा गया कि वो श्रीलंका के 'हालात पर क़रीब से नज़र रखे हुए है.

'भारत ने ये भी उम्मीद जताई कि श्रीलंका में 'लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधानिक प्रक्रिया का सम्मान' किया जाएगा.

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