पुलवामा: 'हमले से पहले पापा का आंसुओं में डूबा चेहरा देखा था'

  • 13 फरवरी 2020
संजय कुमार सिन्हा इमेज कॉपीरइट Seetu Tiwari /BBC

"पूरी दुनिया भी क्या मिलकर मेरे पापा की जगह ले सकती है?"

25 साल की रूबी कुमारी के इस सवाल का जवाब दुनिया में शायद ही किसी के पास हो. वो रोती जा रही थीं और अपनी अंतहीन पीड़ा को शब्दों के सहारे ज़ाहिर भी कर रही थीं.

उनके 'शब्दों' में सिसकियां, लड़खड़ाती आवाज़, आंसू सब घुल मिल रहे थे. और मैं उसके सामने खड़ी, उसके ज़ख्मों को फिर से उभार देने के लिए ख़ुद को गुनहगार पा रही थी.

रूबी के पिता हवलदार संजय कुमार सिन्हा बीते साल 14 फ़रवरी को पुलवामा हमले में मारे गए थे. बिहार की राजधानी पटना से तक़रीबन 30 किलोमीटर दूर तारेगना स्टेशन के पास तारेगना मठ है. इसी मठ में संजय कुमार सिन्हा का परिवार रहता है.

'ये पैसा-कौड़ी सब बेकार है'

संजय सिन्हा के घर के बाहर सड़क बनाने के लिए खुदाई का काम चल रहा है. परिवार वाले बताते हैं कि उनकी मौत के एक माह के भीतर ही सड़क निर्माण के शिलान्यास का पत्थर लग गया था लेकिन काम अब जाकर शुरू हुआ है. संजय के पिता महेन्द्र सिंह ख़ुद इस सड़क निर्माण की देख रेख कर रहे है.

घर के बाहर की दीवार पर संजय कुमार सिन्हा की तस्वीर और उनका जीवन परिचय लगा है. घर के अंदर भी हर कमरे, बरामदे और पूजा घर में देवी देवीताओं के साथ संजय की तस्वीर रखी है.

उनकी मौत के बाद परिवार को मिले दर्जनों स्मृति चिन्ह, मोमैंटों को परिवार ने क़रीने से सजा रखा है.

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संजय की 40 वर्षीय पत्नी बेबी देवी इन तस्वीरों को अपने आंचल से पोंछती हैं. उनकी आंखों से लगातार गिरते आंसू संजय सिन्हा की तस्वीरों को भिगो रहे हैं.

वो कहती हैं, "सरकार से जितना पैसा मिलना था, मिल गया. नौकरी मिल गयी. घर के बाहर सरकार सड़क बनवा रही है. ये सब से क्या होगा? पैसा तो आता-जाता रहता है लेकिन मेरा परिवार वापस थोड़े ना आएगा. ये पैसा-कौड़ी सब बेकार है."

बिटिया की शादी की चिंता

साल 2019 में संजय सिन्हा अपनी सास के श्राद्ध में शामिल होने के लिए कुछ दिनों के लिए लौटे थे. 7 फ़रवरी 2019 को उनको जम्मू वापस जाना था लेकिन वो 8 फ़रवरी की सुबह अपनी बड़ी बेटी रूबी कुमारी का रिश्ता देखने पटना शहर आए थे.

बेबी देवी बताती है, "जाते वक़्त उन्होंने कहा था कि पन्द्रह दिन बाद फिर वापस आकर रिश्ते की बात करेंगें. लेकिन वो वापस नहीं आए और जिस परिवार में वो शादी के लिए गए थे, उन्होंने दोबारा हमसे संपर्क नहीं किया. अब बिना गार्जियन (परिवार के मुखिया) के हमारे समाज में शादी कैसे तय होगी? गोतिया सबने पहले कहा था कि वो मदद करेंगें लेकिन अब तक तो किसी ने मदद नहीं की."

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ख़ुद इस दंपत्ति यानी संजय सिन्हा और बेबी देवी की पढ़ाई लिखाई सामान्य थी लेकिन उन्होंने दोनों बेटियों को साइंस में ग्रेजुएशन कराया और बेटे को मेडिकल की तैयारी के लिए कोटा भेजा है.

संजय सिन्हा के बारे में

संजय सिन्हा 176 बटालियन, केन्द्रीय पुलिस बल में हेड कॉन्सटेबल थे. तारेगना मठ में होमगार्ड महेन्द्र सिंह के यहां उनकी पैदाइश 24 जनवरी 1974 को हुई थी.

इस इलाक़े के बहुत सारे जवान फ़ौज या अर्धसैनिक बलों में भर्ती थे. युवा संजय को इन जवानों से प्रेरणा मिली और अगस्त 1993 में वो सीआरपीएफ़ में भर्ती हुए.

संजय के परिवार में उनके माता पिता, पत्नी और तीन बच्चे हैं. छोटी बेटी वंदना कुमारी को बिहार सरकार ने मसौढी अनुमंडल में क्लर्क की नौकरी मिली है. बेटा ओमप्रकाश दिल्ली में मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं. बड़ी बेटी रूबी कुमारी को सीआपीएफ़ ने नौकरी का प्रस्ताव दिया है. जिसे उन्होंने अब तक स्वीकार नहीं किया है.

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परिवार की देखभाल के लिए सीआरपीएफ़ की तरफ़ से नियुक्त हुए नोडल अफ़सर इंस्पेक्टर अनिल कुमार सिंह बताते है, "चूंकि वो ऑफिशियल जॉब में इंटरेस्टेड है इसलिए अभी उन्होंने इस प्रस्ताव को स्वीकारा नहीं है. लेकिन 38 साल की उम्र तक ये मौक़ा है कि वो कुछ पात्रताओं को पूरी कर नौकरी ज्वाइन कर सकती हैं. हमारी कोशिश है कि उनको सिविल जॉब का मौक़ा मिले."

आख़िरी बार देख भी ना सके

बीते साल 14 फ़रवरी 2019 को संजय सिन्हा और बेबी देवी की सुबह तक़रीबन 9 बजे बातचीत हुई.

शाम को ये परिवार किसी बर्थडे पार्टी में जाने के लिए तैयार हो रहा था जब उन्हें पहली बार ये ख़बर मिली कि पुलवामा में हमला हुआ.

संजय की बेटी रूबी की आंखों के नीचे लाल डोरे बन गए हैं. वो बताती हैं, "इस बार जब वो वापस जा रहे थे तो अचानक मुझे गले लगाकर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगे. हमारी बदक़िस्मती देखिए हमें उनका चेहरा आख़िरी बार देखने भी नहीं दिया गया."

"पापा का आंसुओं में डूबा चेहरा ही मेरी उनसे जुड़ी आख़िरी याद है."

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