सरकारों ने बढ़ाई खाद्य पदार्थों की क़ीमत

गेहूं
Image caption विकसित देशों की तुलना में विकासशील और ग़रीब देशों में अनाज की क़ीमतें बढ़ी हैं.

संयुक्त राष्ट्र का मानना है कि दुनिया भर में कई देशों की सरकारों के रवैए के कारण खाद्य संकट और अधिक गहरा गया है.

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन ( एफएओ) के एक अधिकारी का कहना है कि कुछ देशों ने खाद्य संकट के मद्देनज़र अनाज का भंडारण करना शुरु कर दिया और इसके कारण क़ीमतें बढ़ गईं.

पिछले साल खाद्य पदार्थों, ख़ासकर चावल और गेहूं की क़ीमतें बढ़ने के कारण मेक्सिको, मिस्र और इंडोनेशिया में दंगे हो गए थे. स्थिति यहां तक पहुंच गई कि इन देशों में राजनीतिक संकट पैदा हो गया था. भारत और विएतनाम में चावल की क़ीमतें दुगुनी हो गई और चावल का सबसे बड़े आयातकर्ता देश फिलीपींस ने चावल का भंडारण करना शुरु कर दिया.

एफएओ के बाज़ार एवं व्यवसाय के निदेशक अलेक्जेंडर सैरिस का कहना है कि इसके लिए सरकारें ही ज़िम्मेदार हैं क्योंकि इन सरकारों ने इस आशा के साथ भंडारण करना शुरु किया कि आने वाले दिनों में अनाज की कमी हो जाएगी. इसी कारण सभी सरकारों ने अनाज भरना शुरु कर दिया.

सैरिस का कहना है कि चावल के बाज़ार में अभी भी तनाव है और सरकारों को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए था.

बीबीसी सर्वे

Image caption पिछले साल दुनिया के कई देशों में अनाज की बढ़ती क़ीमतों के कारण हिंसा भी हुई थी.

पिछले साल अनाजों के दाम बढ़ने के बाद इस साल बीबीसी कोशिश कर रही है ये जानने कि पिछले एक साल में दुनिया भर में खाद्य पदार्थों की क़ीमतों में क्या बदलाव आया है.

बीबीसी ने दुनिया के अलग अलग देशों से जो आकड़े जुटाए हैं वो एक अलग ही तस्वीर पेश करते हैं. वाशिंगटन और ब्रसेल्स जैसे मंहगे और बड़े शहरों में अनाज की क़ीमतों में कमी आई है जबकि ग़रीब शहरों मसलन नैरोबी और ब्यूनोस आयरिश में अनाज की क़ीमतों में अभी भी बढ़ोतरी देखी जा रही है.

इसके लिए स्थानीय स्तर पर कई कारक ज़िम्मेदार बताए जाते हैं. ब्रसेल्स में जहां अच्छे मौसम के कारण फल और सब्ज़ियों की क़ीमतें कम हुई हैं वहीं सुपरमार्केट ने दूध की क़ीमतें बढ़ने नहीं दी. दूसरी तरफ़ अफ्रीकी शहर नैरोबी में ख़राब मौसम और सरकारी अधिकारियों एवं व्यापारियों की बीच मिलीभगत को अनाज के बढ़ते दामों से जोड़कर देखा जा रहा है.

बीबीसी के जुटाए आकड़ों के मुताबिक अभी भी कई देश खाद्य पदार्थों की बढ़ती क़ीमतों का संकट झेल रहे हैं.

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