नहीं होगा गेहूँ का निर्यात

गेहूँ
Image caption दस दिन पहले ही गेहूं के निर्यात की अनुमति दी गई थी

भारत सरकार ने महज दस दिनों के भीतर गेहूं के निर्यात की अनुमति देने वाला आदेश वापस ले लिया है.

मॉनसून से होने वाली बारिश में कमी आने की आशंका के मद्देनज़र ये फ़ैसला किया गया है ताकि अन्न भंडार सुरक्षित स्तर पर बना रहे और किसी भी परिस्थिति में घरेलू माँगों की पूर्ति हो सके.

विदेश व्यापार महानिदेशक ने सोमवार को जारी अधिसूचना में गेहूँ के निर्यात पर ताज़ा प्रतिबंध लगाया है. इसमें कहा गया है कि महानिदेशालय तीन जून के फ़ैसले को वापस ले रहा है जिसमें निर्यात में ढील दी गई थी.

इससे पहले अगले साल मार्च तक साढ़े छह लाख टन गेहूँ निर्यात करने की अनुमति दी गई थी. लेकिन ताज़ा अधिसूचना से ये स्पष्ट नहीं हैं कि यह लक्ष्य ही ख़त्म कर दिया गया है या कुछ समय बाद फिर से निर्यात की अनुमति मिल सकती है.

वर्ष 2007 में अनाज के दाम बढ़ने पर सरकार ने गेहूं के निर्यात पर रोक लगाई थी और दो वर्षों तक यह रोक जारी रही. लेकिन इस वर्ष की शुरुआत से ही निर्यात की अनुमति देने की मांग होने लगी जिसे दस दिनों पहले मान लिया गया था.

जून और जुलाई में अब तक देश के कई हिस्सों में कम बारिश हुई है जिसका असर ख़रीफ़ की फ़सल पर पड़ने की आशंका है. कम बारिश का सीधा असर धान की खेती पर पड़ सकता है.

धान की कटाई नवंबर- दिसंबर के महीने में होती है और उसी के बाद गेहूं की बुआई शुरु होती है. भारत में गेहूं और चावल आम परिवारों के भोजन का मुख्य आधार है.

ऐसे में अगर धान की खेती अच्छी नहीं हुई तो गेहूं का दाम बढ़ना तय हैं और इसी के मद्देनज़र इसके निर्यात पर रोक लगाई गई है.

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