वेदांत के विरोध की गूँज लंदन में

कोंध जनजाति के लोग
Image caption कोंध आदिवासियों ने लंदन में कंपनी के ऑफ़िस के बाहर प्रदर्शन किया

उड़ीसा में बॉक्साइट खनन की योजना बना रही कंपनी वेदांत रिसोर्सेज के ख़िलाफ़ स्थानीय आदिवासियों ने लंदन में प्रदर्शन किया है.

सोमवार को लंदन में कंपनी के दफ़्तर के बाहर बुकर पुरस्कार विजेता अरुंधति रॉय की अगुआई में उड़ीसा से आए आदिवासियों ने नारे लगाए और खनन योजना को रद्द करने की माँग की.

उस समय कंपनी की सालाना आम बैठक हो रही थी.

भारतीय अरबपति अनिल अग्रवाल की कंपनी वेदांत रिसोर्सेज को भारत सरकार ने उड़ीसा की नियामगिरी पहाड़ियों में बॉक्साइट के खनन का पट्टा दिया है.

लेकिन वहां रहने वाले डोंगरिया कोंध जनजाति के लोगों का कहना है कि इसी पहाड़ और जंगलों से उनकी आजीविका चलती है और वो इसकी पूजा करते आए हैं, इसलिए किसी कंपनी को वे यहां नहीं घुसने देंगे. इस जनजाति का मानना है कि उनके देवता नियाम राजा हैं जो इसी पहाड़ी पर रहते हैं.

दूसरी ओर पर्यावरणविद भी इस योजना का विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि बॉक्साइट योजना का सीधा असर यहां की आवोहवा पर पड़ेगा.

अंतरराष्ट्रीय संस्था एक्शन एड ने नियामगिरी पहाड़ियों से कुछ आदिवासियों को लंदन लाने में मदद की. इनमें से एक सीताराम कुलिसिका का कहना था, "अब भी मौका है. पिछले साल कंपनी ने वादा किया था कि बिना कोंध लोगों की अनुमति से खनन शुरु नहीं होगा. मैं कंपनी के सभी शेयरधारकों से अनुरोध करता हूं कि वे हमारी आजीविका और हमारे भगवान को बचा लें."

निवेश

कंपनी के ऑफ़िस के बाहर आदिवासियों की आवाज़ बुलंद करने पर्यावरणविद बिएंका जैगर, संगीतकार नितिश शाहनी और चर्च ऑफ़ इंग्लैंड के कई अनुयायी भी पहुँचे. ग़ौरतलब है कि वेदांत रिसोर्सेज में चर्च ऑफ़ इंग्लैंड का भी निवेश है.

बिएंका जैगर ने कुछ दिनों पहले ही चर्च ऑफ़ इंग्लैंड से उड़ीसा में निवेश की योजना बना रही इस कंपनी से अपना पैसा खींचने की अपील की थी.

Image caption स्टरलाइट ने एल्युमीनियम शोधन कारखाना तैयार कर लिया है.

वेदांत रिसोर्सेज की सहयोगी इकाई स्टरलाइट इंडस्ट्रीज है जो भारत में एल्युमीनियम बनाने का काम करती है.

दूसरी ओर कंपनी के चेयरमैन अनिल अग्रवाल का कहना था, "भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने हमे नियामगिरी में बॉक्साइट खनन की अनुमति दे दी है. हम इसी साल खनन शुरु कर देंगे."

पिछले साल आठ अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ वेदांत को ये अनुमति दी थी. कोर्ट ने कहा था कि वेदांत रिसोर्सेज को इलाक़े के विकास में योगदान करना होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा था कि वेदांत की भारतीय इकाई स्टरलाइट इंडस्ट्रीज़ को अपने मुनाफ़े का दस फ़ीसदी क्षेत्र के विकास पर खर्च करना होगा.

वेदांत की भारतीय सहायक कंपनी स्टरलाइट ने नियामगिरी के पास लांजीगंज में एक अरब डॉलर की पूंजी लगाकर बड़ा एल्युमीनियम शोधन संयंत्र तैयार कर लिया है.

यह स्थान नियमगिरि पहाड़ की तराई में ही क़रीब छह वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में स्थित है. कंपनी की योजना बॉक्साइट निकाल कर इसी संयंत्र में एल्युमीनियम बनाने की है.

नियामगिरि का महत्व

नियामगिरी पहाड़ियों में आज डोंगरिया कोंध जनजाति के सिर्फ़ 7,950 लोग बचे हैं.

डोंगरिया उड़ीसा के दूरस्थ हिस्से में स्थित नियमगिरि के जंगलों में सदियों से रह रहे हैं. वे फल एकत्र कर, ज्वार-बाजरा की खेती कर और जंगल के पौधों को शहरों-कस्बों में बेच कर अपना जीवन यापन करते हैं.

Image caption बिएंका ने चर्च ऑफ़ इंग्लैंड से वेदांत में निवेश नहीं करने की माँग की है.

गोलगोला से आधुनिक दुनिया अभी कोसों दूर है. वहाँ अभी न तो बिजली है, न स्कूल हैं, न टीवी है और न ही टेलीफ़ोन.

डोंगरिया कोंध के लिए काम करने वाले एक युवा कार्यकर्ता जीतू जकेस्किया ने कुछ दिनों पहले बीबीसी से कहा, "हम जंगल में मिलने वाली हर चीज़ जैसे फलों को बाज़ार ले जाते हैं. यह डोंगरिया कोंध लोगों के जीवन के स्त्रोत की तरह है."

वह इस जाति के उन कुछ लोगों में से एक हैं जिन्होंने औपचारिक शिक्षा ग्रहण की है और वह अब अपनी जनजाति के जीने के तरीक़े को सुरक्षित रखने के लिए लड़ रहे हैं.

उन्होंने कहा, "हम इन फलों को पाने के लिए कोई पैसा नहीं देते हैं. हमें यह मुफ़्त में मिलते हैं. यह हमारे लिए स्वर्ग के समान है."

डोंगरिया जीववादी होते हैं. उनके अनुसार हर पहाड़ किसी ख़ास देवता का निवास होता है.