आर्थिक अनिश्चितता है चुनौती

  • 27 अगस्त 2009
भारतीय रुपया

जितनी तेजी से विश्व अर्थव्यवस्था की स्थितियां बदल रही हैं, उनमें 2014 की तो दूर, 2011 की बात भी पक्के तौर पर नहीं कही जा सकती.

दो साल पहले यानी 2007 में कौन कह सकता था कि 2009 में यह सीन हो जाएगा. ऐसी सूरत में 2009-2014 की नीति या किसी भी दीर्घकालीन नीति के सफल होने की उम्मीद कम ही है.ऐसी सूरत में जो आँकड़े पाँच साल बाद के लिए तय किए गए हैं, उनका कुछ ख़ास मतलब नहीं है. इसलिए उन आंकड़ों का बात का कोई अर्थ नहीं है, जो पांच साल बाद के लिए तय किए गए हैं.

इसके अलावा इस आयात निर्यात नीति में ठोस समस्याओं के मुकाबले ज़ोरदार महत्वाकांक्षाएं है, जिनके पूरा होने की दारोमदार बड़ी हद ग्लोबल अर्थव्यवस्था पर है. आयात-निर्यात नीति में उम्मीद जतायी गई है कि 2011 तक निर्यात में 15 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होगी.

यह क़रीब 200 अरब डालर का होगा. यह इन आंकड़ों के सामने है कि अप्रैल से जून 2009 के दौरान निर्यात में 31 प्रतिशत की कमी आ चुकी है. पिछले दस महीनों से निर्यात में लगातार गिरावट आ रही है.

उम्मीद की जा रही है कि 2011 तक निर्यात में 15 प्रतिशत बढ़ोत्तरी हो जाएगी. वह भी तब, जबकि जिन बाजारों में भारतीय निर्यात केंद्रित है, उनके सुधरने की कोई उम्मीद निकट भविष्य में दिखाई नहीं देती.

यूँ आयात-निर्यात नीति में निर्यातकों के लिए आयकर की राहत मौजूद है. इसके अलावा इंश्योरेंस संबंधी क़दम भी इस नीति में हैं. पर इन क़दमों से समूची स्थिति में बदलाव आने की आशा नहीं है. पूरी स्थिति यह है कि भारत के परंपरागत बाज़ार समस्या में हैं, और नए बाज़ारों को तलाशने का काम शुरू नहीं हुआ है.

निर्यात के मोर्चे पर आंकड़े बताते हैं कि सॉफ्टवेयर निर्यात कुछ समय पहले तक भारत का सफलतम कारोबार रहा है. 1998 में कुल दो अरब डॉलर का निर्यात कारोबार था सॉफ्टवेयर का, 2005 में यह बढ़कर 18 अरब डॉलर हो गया और 2008 में यह बढ़कर क़रीब 50 अरब डॉलर हो गया.

चुनौतियाँ

पर 2008 की मंदी के बाद का सीन दूसरा है.

नई चुनौतियाँ ये हैं कि सिर्फ़ फॉर्चून 500 की बड़ी कंपनियों को ग्राहक बनाने के बजाय छोटे कारोबारों को ग्राहक बनाने की योजना पर काम ज़रूरी है. अमरीका और ब्रिटेन के अलावा जहाँ और भी है.

ख़ासतौर पर ब्राजील, रूस, जर्मनी, जापान में सॉफ्टवेयर कारोबार की अपार संभावनाएं हैं. पर यहाँ के लिए मूल समस्या यह रही है कि अमरीका और ब्रिटेन के साथ सॉफ्टवेयर कारोबार करने के लिए भाषा की समस्या नहीं रही है.

जबकि रूस जर्मनी और जापान के साथ सॉफ्टवेयर कारोबार करने के लिए भारतीय कंपनियों को अपनी सॉफ्टवेयर क्षमताएं बेहतर करने के साथ साथ इन देशों की भाषाओँ से जुड़ी क्षमताएं भी अर्जित करनी पड़ेंगी, यह काम आसान नहीं है.

पर सॉफ्टवेयर कारोबार में लंबी दूरी की सोच पर काम करना ज़रूरी है. इस मामले में आयात-निर्यात नीति कुछ रचनात्मक योगदान कर सकती है. पूरी नीति का फोकस अब नए बाजारों के विकास और संवर्धन पर होना चाहिए. पर ऐसे प्रयास इस नीति में दिखाई नहीं पड़ते.

नीति में एक अच्छी बात यह है कि छोटे उद्यमों को विश्व व्यापार संगठन संबंधी प्रावधानों के दुष्परिणामों से बचाने के लिए निदेशालय बनाने की बात कही गई है. इसका होना बहुत आवश्यक था.

छोटे उद्यम विश्व व्यापार संगठन संबंधी क़ानूनी मसले समझने में असमर्थ हैं. उन्हें इस संबंध में सरकारी समर्थन ज़रूरी है.

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