क्यों आई आर्थिक मंदी?

फ़ाइल फ़ोटो
Image caption कौन है इसका ज़िम्मेदार

वर्तमान वैश्विक आर्थिक संकट का मूल कारण नई तकनीकों के अविष्कार में ठहराव है.

पिछले 200 वर्षों में स्टीम इंजन के बाद बिजली, हवाईजहाज़, टेलीफ़ोन आदि तमाम आविष्कार हुए हैं. इन आविष्कारों से विकसित देशों ने भारी लाभ कमाए हैं जैसे माइक्रोसाफ्ट कंपनी की आफिस डिवीजन ने गत वर्ष 14.3 अरब डॉलर की बिक्री पर 9.3 अरब डॉलर का लाभ कमाया है.

लाभ की यह 65 प्रतिशत दर अप्रत्याशित है। इसी तरह के लाभ जेट हवाईजहाज़, पर्सनल कंप्यूटर, जेनेटिक मॉडिफाइड बीज आदि से कमाए गए हैं.

इस लाभ के बल पर विकसित देशों ने अपने श्रमिकों को उंचे वेतन का भुगतान किया है। उदाहरण के तौर पर जनरल मोटर्स के अकुशल कर्मचारी का वर्तमान दैनिक वेतन लगभग 27,000 रूपया है.

जब तक जनरल मोटर्स के पास कार उत्पादन की विशेष तकनीक थी तब तक इन उंचे वेतन का भुगतान कर पाना संभव था और इस उंचे वेतन के बल पर विकसित देशों में विकासशील देशों से आए बासमती चावल जैसे उत्पाद की खरीद की जा रही थी.

आर्थिक विकास की कड़ी इस प्रकार थीः नई तकनीकों का आविष्कार - विकसित देशों द्वारा माल को महंगा बेचना - अग्रणी कम्पनियों को अभूतपूर्व लाभ - श्रमिकों को उंचे वेतन - सम्पूर्ण विश्व से आयातित माल की खपत.

पिछला प्रभावी तकनीकी आविष्कार नब्बे के दशक में इंटरनेट का हुआ था। 1998 के बाद पांच वर्षों मे अमरीकी अर्थव्यवस्था इस तकनीक के बल पर आगे बढ़ी थी.

2002 में इस तकनीक का प्रभाव क्षीण होने लगा ठीक वैसे ही जैसे समय क्रम में तालाब सूख जाता है। अमरीका पर ख़तरे के बादल मंडराने लगे। अमरीकी उद्योग बन्द होने लगे क्योंकि मैन्यूफ़ैक्चरिंग मुख्यतः चीन और पूर्वी एशिया को और सेवाएं भारत को स्थांतरित हो रही थी.

संकट की शुरूआत

एक तरह से यही वर्तमान संकट की शरूआत थी.

अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश और फ़ेडरल रिजर्व बैंक के अध्यक्ष ऐलन ग्रीनस्पैन ने आकलन किया कि यह मंदी अल्पकालीन रहेगी.

जिस तरह से 1996-1998 की मंदी इंटरनेट के आविष्कार के बाद टूट गयी थी उसी तरह कुछ नए आविष्कार सामने आएंगे और यह मंदी भी स्वतः ही टूट जाएगी.

इस सोच के आधार पर फ़ेडरल रिजर्व बैंक ने मकानों की खरीद के लिये कर्ज़ पर ब्याज दरों में भारी कटौती की.

अमरीकी नागरिकों को विश्वास दिलाया गया कि रोज़गार पर दबाव अल्पकालीन है। उन्हें मकानों के लिए कर्ज़ लेने के लिये प्रेरित किया गया.

Image caption मंदी का आकलन ग़लत निकला.

मकानों की खरीदारी तेज़ हुई, प्रॉपर्टी मार्केट में उछाल आया और 2006 तक अमरीकी अर्थव्यवस्था तेज़ गति से बढ़ती रही। लेकिन साथ ही साथ अमरीका की प्रतिस्पर्धा शक्ति का भी तीव्र गति से क्षय होता रहा.

जनरल मोटर्स का श्रमिक जो कार्य 27,000 रूपए में करता था वही कार्य चेन्नई में 500 रूपए में किया जाने लगा। ऐसा ही कॉल सेंटर जैसी सेवाओं में हुआ.

भारत में इन सेवाओं के सस्ते होने के कारण अमरीकी कंपनियों ने आउटसोर्सिंग का सहारा लिया.

अमरीकी श्रमिकों के रोज़गार कम होने लगे और वे मकानों के कर्ज़ चुकाने में पिछड़ने लगे.

बैंकों ने उनकी प्रापर्टी का अधिग्रहण किया। अधिग्रहीत प्रापर्टी को बैंकों ने बाजार में बेचने का प्रयास किया किन्तु खरीददार सामने नहीं आये। परिणामस्वरूप प्रापर्टी मार्केट टूट गया.

बैंक तुरंत अधर में आ गये। जिस प्रापर्टी पर बैंक ने पांच लाख डॉलर का कर्ज़ दे रखा था अधिग्रहण के बाद उसे दो लाख डॉलर में बेचना पड़ा.

इस घाटे की चपेट में सबसे पहले आए लेहमन ब्रदर्स, बीमा कम्पनी एआईजी और मेरिल लिंच. इसके बाद यह संकट गहराता ही गया क्योंकि अमरीकी श्रमिकों की आय कम होती गई.

वर्तमान संकट का मूल कारण वित्तीय क्षेत्र की मुनाफ़ाखोरी नहीं है। यह केवल निमित्त है.

यदि वित्तीय प्रशासन सख्त होता और प्रापर्टी लोन का प्रसार कम हुआ होता तो प्रापर्टी की खरीद से अर्थव्यवस्था में उछाल नहीं आता। तब मंदी तीन साल पहले ही दिखाई दे जाती.

जिस तरह कैंसर के मरीज़ को पैरासिटामॉल देने से तत्काल आराम पड़ जाता है लेकिन बाद में कष्ट बढ़ जाता है उसी तरह वेतन में कटौती के कटु सत्य को पीछे खिसकाने से 2008 से मंदी का झटका गहरा हुआ है.

वर्तमान मंदी का मूल कारण वित्तीय प्रशासन नहीं बल्कि अमरीकी प्रतिस्पर्धा शक्ति का अभाव है.

ग़लती किसकी

ग़लती राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और फ़ेडरल रिजर्व बैंक के अध्यक्ष ऐलन ग्रीनस्पैन द्वारा की गयी। ये नेता इस बात का आकलन नहीं कर पाये कि अमरीकी तकनीकी अगुवाई के दिन ढल गए हैं.

उन्हें चाहिए था कि वे अमरीकी नागरिकों को स्पष्ट बताते कि उंचे वेतन का समय समाप्त हो गया है.

माल की ढुलाई का खर्च कम होने और तकनीकों का वैश्विक प्रसार होने से अमरीका के पास ऐसे माल कम ही बचे हें जिन्हें उंचे मूल्यों पर बेच कर अमरीकी श्रमिकों को उंचे वेतन दिए जा सकें.

वैश्वीकरण का स्वाभाविक परिणाम है कि सभी देशों में माल का दाम बराबर हो जाता है। यह श्रम पर भी लागू होता है। अतः विकसित देशों में आय में कटौती अनिवार्य है.

तदानुसार विश्व की आय में कुछ गिरावट आएगी ही. गिरावट का यह चक्र तब ही ठहरेगा जब भारत और चीन की क्रय शक्ति बढ़ेगी.

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